आचार्य चिन्तामणि नायक-नायिका भेद निरूपण - Acharya Chintamani hero-heroine distinction representation

नायक-नायिका भेद निरूपण में आचार्य चिन्तामणि ने 'रसमंजरी' का आश्रय लिया है और अपने ग्रन्थ 'कविकुलकल्पतरु' में आलोच्य विषय का प्रभावपूर्ण निरूपण किया है। 'कविकुलकल्पतरु' के पंचम प्रकरण के तीन भाग हैं। दूसरे भाग में ध्वनि के एक भेद 'असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य' के प्रसंग में विभाव के अन्तर्गत उन्होंने नायक- नायिका भेद का विस्तृत विवेचन किया है।


नायक-नायिका स्वरूप


आचार्य चिन्तामणि ने नायक-नायिका स्वरूप निरूपण में रीतिकालीन परम्पराओं का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया है। वैसे तो इस प्रकरण में उन्होंने भानु मिश्र कृत 'रसमंजरी' को आधारग्रन्थ के रूप में अपनाया है किन्तु कहीं-कहीं 'दशकरूपक' और 'साहित्यदर्पण' का प्रभाव भी देखा जा सकता है।

नायक-नायिका स्वरूप विवेचन में संक्षेप प्रियता का परिचय देते हुए उन्होंने जहाँ नायक को धर्म, धन और विक्रम से परिपूर्ण स्वीकार किया है, वहीं नायिका को कला-प्रवीण, विलासिनी और सुन्दरता की खान माना है-


सकल धरम जुत नियुत धन विक्रम पूरो होई । ताको नायक कहते है कवि पण्डित सब कोई ॥


आलम्बन शृंगार की तिय नायका बखान । कलान प्रवीन विलासिनी सुन्दरता की खानि ॥


नायक भेद


आचार्य विश्वनाथ और आचार्य धनंजय के अनुरूप आचार्य चिन्तामणि ने नायक के चार भेद धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीरप्रशान्त स्वीकार किए हैं।

साथ ही वे नायक के चार अन्य प्रकारों अनुकूल, दक्षिण, धृष्ट और शठ की चर्चा भी करते हैं। वस्तुतः पहले प्रकार के भेदों का आधार नाटकादिक कथावस्तु है, जबकि दूसरे प्रकार का आधार शृंगार रस प्रतीत होता है। कवि आचार्य चिन्तामणि ने धीरोदात्त को महासत्व, गम्भीर, क्रियासिद्ध और आत्मश्लाघाहीन माना है। धीरोद्धत को वे प्रबल गर्व और मत्सर से युक्त चण्ड, मायावी और आत्मश्लाघी मानते हैं। धीरललित सुन्दर अतिमनोहर, कलासक्त, निश्चित और मृदु स्वभाव का होता है। जबकि धीरशान्त को उन्होंने विप्र, गोविन्द आदि का सखा, धर्म-ज्ञान-निष्ठा तथा इन्द्रिय-विषय- विरत स्वीकार किया है।


चिन्तामणि की दृष्टि में सर्वश्रेष्ठ नायक धीरशान्त है। धीरशान्त के अतिरिक्त बाकी तीनों नायकों का स्वरूप आचार्य धनंजय-सम्मत हैं। धीरशान्त के स्वरूपाख्यान में उन्होंने कुछ और गुणों को शामिल किया है। इस विषय में 'कविकुलकल्पतरू' में वे लिखते हैं-


विप्र सखा गोविन्द को धर्मज्ञान निविष्ठ इन्द्रिय विषयन ते विरत सो प्रधान अति शिष्ट ।


शृंगार रस आधारित नायकों के स्वरूपाख्यान में उन्होंने एक स्वकीया में रत नायक को अनुकूल कहा है। बहु नारियों में समान रूप से रत रहने वाले नायक को दक्षिण माना है। अपराध के प्रकट होने पर भी जो भयरहित हो, वह घृष्टनायक कहलाता है।

शठ नायक वह है जो बाहर से नायिका को प्रीति दिखाते हुए भी गूढ रूप से उसका अपकार करने वाला होता है। शठ के स्वरूप विवेचन में वे 'दशकरूपक' का सहारा लेते हैं जबकि बाकी तीनों का स्वरूप विवेचन 'साहित्यदर्पण' के अनुरूप है।


नायिका के भेदोपभेद


आचार्य चिन्तामणि ने नायिका के भेदोपभेद का विवेचन जाति, धर्म, अवस्था तथा गुण के आधार पर किया है। जाति के आधार पर उन्होंने नायिका के तीन प्रकारों दिव्या, अदिव्या और दिव्यादिव्या की चर्चा की है। हालाँकि संस्कृत काव्यशास्त्रियों विशेषकर भरत मुनि ने केवल दिव्या नायिका का उल्लेख किया है।

धार्मिक परम्परा के अनुसार इन नायिकाओं के रूप चित्रण के सम्बन्ध में चिन्तामणि की अवधारणा है कि दिव्या नायिकाओं का रूप चित्रण नख से आरम्भ करके, अदिव्या नायिकाओं का रूप चित्रण शिखा से प्रारम्भ करके और दिव्यादिव्या नायिकाओं का रूप चित्रण इच्छानुसार नख अथवा शिखा से प्रारम्भ करना चाहिए। अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'कविकुलकल्पतरु' में उनकी स्थापना है-


नख ते दिव्य तिया वरन, सिख ते विबुध अदिव्य । नख ते सिख ते वर्नियै जो तिय दिव्यादिव्य |


धर्म के अनुसार नायिका भेदोपभेद में चिन्तामणि आचार्य भानु मिश्र का अनुकरण करते हैं। धर्म के अनुसार वे नायिका के तीन भेद स्वकीया, परकीया और वेश्या स्वीकार करते हैं।

स्वकीया नायिका का विवेचन करते हुए चिन्तामणि ने कहा है कि ऐसी नायिका शील, शुद्धता और लाज से परिपूर्ण केवल अपने ही पति में प्रीतिवंत होती है-


जो अपने ही पुरुष में प्रीतिवंत निरधारि । कहत स्वकीया नायका सज्जन सुकवि विचार ॥ सील सुधाई लाज जुत गुरजन सुकवि विचारि । प्रीतम के चित्त वृत्ति सो कही स्वकीया नारि ॥


इसी अनुक्रम में उन्होंने स्वकीया नायिका के तीन भेदों मुग्धा, मध्या और प्रौढ़ा को स्वीकार किया है। मुग्धा बाल्यावस्था और युवावस्था के सन्धिस्थल पर अवस्थित नायिका है।

मुग्धा नायिका लज्जा और मदन के समान भावों से परिपूर्ण होती है। पतिमात्र विषयक केलिकलाचातुरता और मदन के वशीभूत होकर लज्जायुक्तता कवि आचार्य चिन्तामणि के मत में प्रौढ़ा नायिका के लक्षण हैं। स्वकीया नारी के तीनों भेदों के निरूपण सम्बन्धी स्थापनाएँ ध्यातव्य हैं-


जाके जीवन अंकुरिन सो मुग्धा वर नारि । दुहू वयक्रम संधि मै तो क्यसंधि निहारि ॥


- (मुग्धा)


जातिय के हिय होतु है लाज मनोज समान। ताको मध्या कहत है सिगरे सुकवि सुजान ॥


- (मध्या)


केलि कला में चतुर अति प्रीतम सो अति प्रीति । लाजत जै है मदन बस प्रौढ़ा की यह रीति ॥


- (प्रौढा)


परपुरुष के साथ प्रेम करने वाली नायिका को परकीया कहते हैं। आचार्य भानु मिश्र का अनुसरण करते हुए आचार्य चिन्तामणि परकीया नायिका के दो भेद मानते हैं ऊढा तथा अनूढा । इसी विवेचन क्रम में वे आगे अनूढा परकीया के छह भेद सुरतगोपना, चतुरा, कुलटा, लक्षिता, अनुशयना और मुदिता स्वीकार करते हैं।


वैसे तो आचार्य चिन्तामणि ने पृथक् से सामान्य नायिका यानी वेश्या की चर्चा नहीं की है तथापि अवस्था के अनुसार आठ प्रकार की वक्ष्यमाण नायिकाओं के प्रसंग में उन्होंने आचार्य भानु मिश्र के अनुसरण में वेश्या के भी आठ उदाहरण अवश्य दिए हैं। अवस्था के अनुसार आचार्य चिन्तामणि सामान्य नायिका यानी वेश्या के आठ भेद स्वाधीनप्रिया, वासकसज्जा, विरहोत्कण्ठिता, विप्रलभता, खण्डिता, कलहान्तरिता, प्रोषितपतिका और - अभिसारिका मानते हैं।


गुण के आधार पर नायिकाओं का भेद करते हुए उन्होंने उत्तमा, मध्यमा और अधमा नायिका की चर्चा की है। हित अथवा अहित करने वाले नायक का सदा हित करने वाली नायिका उत्तमा कहलाती है। हित और अहित के ही अनुरूप व्यवहार करने वाली नायिका मध्यमा मानी जाती है। लेकिन हितकारी नायक का भी सदा अहित करने वाली नायिका को अधमा कहा गया है। वस्तुतः गुण के आधार पर भी नायिकाओं के भेद निरूपण में आचार्य चिन्तामणि आचार्य भानु मिश्र का ही अनुसरण करते प्रतीत होते हैं।


कुल मिलाकर आचार्य चिन्तामणि हिन्दी के प्रथम आचार्य हैं जिन्होंने नायक-नायिका भेद प्रसंग को आचार्य विश्वनाथ के अनुरूप रस- प्रकरण के अन्तर्गत विवेचन किया है। यह तत्युगीन युग प्रभाव ही माना जाएगा कि उन्होंने जहाँ एक ओर मम्मट के समान रस प्रसंग को ध्वनि-प्रकरण के अन्तर्गत निरूपित किया है, वहीं दूसरी ओर वे उनके विपरीत नायक-नायिका भेद की उपेक्षा नहीं कर पाते हैं।