आचार्य चिन्तामणि रस - विवेचन - Acharya Chintamani Ras - Explanation

आचार्य चिन्तामणि विरचित 'कविकुलकल्पतरु' में कुल आठ प्रकरण हैं। पंचम प्रकरण में तीन भाग हैं। पंचम प्रकरण के दूसरे भाग से ध्वनि निरूपण प्रारम्भ हो जाता है। इसी भाग से चिन्तामणि असंलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि के अन्तर्गत मम्मट सम्मत रस का विवेचन आरम्भ कर देते हैं। तदुपरान्त उनके द्वारा आचार्य विश्वनाथ- सम्मत शृंगार रस के अन्तर्गत नायक-नायिका भेद का निरूपण हुआ है। 'कविकुलकल्पतरु' में कुल 936 छन्द हैं। जिसमें से 530 छन्दों में उन्होंने रस का निरूपण किया है। रस निरूपण में चिन्तामणि ने 'प्रतापरुद्रयशोभूषण' (विद्यानाथ) और 'साहित्यदर्पण' (विश्वनाथ) के अतिरिक्त 'दशरूपक' (धनंजय) तथा 'काव्यप्रकाश' (मम्मट) जैसे महत्त्वपूर्ण आधारग्रन्थों का भरपूर उपयोग किया है।


रस की अभिव्यक्ति


रस की अभिव्यक्ति के निरूपण में आचार्य चिन्तामणि के विचार आचार्य मम्मट और 'काव्यप्रकाश' में निरूपित अभिनवगुप्त की मान्यताओं से अभिप्रेरित हैं। उनके विचार उल्लेखनीय हैं-


(1) आचार्य चिन्तामणि के अनुसार लोक में रत्यादि स्थायीभावों के जो कारण, कार्य और सहकारीकारण होते. हैं, काव्यनाटक में वे विभावन, अनुभावन और संचारण व्यापारों द्वारा अलौकिक विभावादि शब्दों से जाने जाते हैं-


रत्यादिक हेतु जो काज और सहकारि । जग में तेई कहत है, आन नाम निरधारि ॥ विभावनादिक अलौकिक व्यापारानि सुमित्त । से विभाव अनुभाव अरु संचारी धरि चित्त ॥


(ii) सामाजिक के हृदय में वासना रूप से स्थित रत्यादि स्थायीभाव उक्त विभाव आदि के संयोग से अभिव्यक्त होने पर रस संज्ञा से अभिहित होता है। इस मत की संपुष्टि करते हुए वे कहते हैं-


थाई सामाजिक हिय वसत वासना रूप । व्यक्त विभावादिकनि मिलि रस है मिलत अनूप ॥ सब जन साधारन त्रिविध व्यापारन सो तीन । सहृदय हिय चिर भाव को व्यंजन धरम नवीन (iii) विभावादि के संयोग में विभावादि का क्रम होता हुआ भी अतित्वरता के परिणामस्वरूप लक्षित नहीं होता है। अपने इस मत की संपुष्टि करते हुए वे कहते हैं-


कछुक यथाक्रम अधिक यह तीनहु को क्रम होइ। व्यंजन को न लख्यौ पर तो अलक्ष्य क्रम होई ॥


(iv) आचार्य चिन्तामणि की प्रबल धारणा है कि यद्यपि रत्यादी स्थायीभाव रामादि नियत प्रमाता से सम्बन्ध रखते हैं तथापि व्यंजना वृत्ति के द्वारा साधारणीकरण के बल से वे अपरिमित प्रमाता (सार्वकालिक और सार्वदेशिक सामान्य व्यक्तियों) से सम्बद्ध हो जाते हैं. -


साधारन व्यापार बल सब साधारन होइ ।


नियत प्रमातहि मै यदपि तदपि अपरमित होइ ॥


(v) आनन्ददायक और उल्लासकारी रस का भोक्ता कोई सुकृत सहृदय ही होता है। आचार्य चिन्तामणि इस दृष्टि को प्रभावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करते हैं-


महानन्द उल्लास वह सुकृत सेवत कोइ ।


सज्जन सुखद जु ग्रन्थ में रस निरूपना सोई ॥