आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और परवर्ती हिन्दी आलोचना - Acharya Ramchandra Shukla and later Hindi criticism
आचार्य शुक्ल की आलोचना में इतिहास-बोध और सामाजिक विवेक, भारतीय नैतिकता, पारम्परिक और आधुनिक साहित्य-चिन्तन तथा भारतीय और पाश्चात्य साहित्य सिद्धान्तों का समन्वय हुआ है। साहित्य में रीतिवाद और अन्धशास्त्रीयता का विरोध शुक्ल जी की आलोचना के प्रस्थान बिन्दु हैं। उनके मुख्य आलोचनात्मक सिद्धान्त और मानदण्ड भक्ति काव्य के विवेचन से उपलब्ध हुए हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना में साहित्य और साहित्यिक परम्परा का गहन अध्ययन, सूक्ष्म पर्यवेक्षण और मर्म को पहचानने वाली अन्तर्दृष्टि का सामंजस्य था। उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य साहित्य सिद्धान्तों के मंथन से हिन्दी की अपनी आलोचना शैली और आलोचनाशास्त्र विकसित किया।
शुक्ल युग के अन्य आलोचकों ने भी अपनी-अपनी मेघा और शक्ति से हिन्दी आलोचना के विकास में अपना योगदान दिया, लेकिन शुक्ल जी के चिन्तन की गहराई, अध्ययन की व्यापकता, जीवन-दृष्टि की ऊँचाई, विश्लेषण की मौलिकता और सिद्धान्त प्रतिपादन की व्यावहारिकता अतुलनीय थी।
शुक्लोत्तर युग में हिन्दी आलोचना का विकास कई रूपों और दिशाओं में हुआ और उसकी नयी-नयी प्रवृत्तियाँ सामने आई । आचार्य शुक्ल जब हिन्दी आलोचना को सुसंगत रूप प्रदान करते हुए अपनी मौलिक उद्भावनाएँ प्रस्तुत कर रहे थे,
उसी समय हिन्दी के काव्य पटल पर छायावाद रूपी व्यक्ति चेतस काव्यधारा का विकास हुआ। आचार्य शुक्ल ने इसकी अनेक प्रवृत्तियों की आलोचना की। छायावादी कवियों और छायावाद के प्रशंसक आलोचकों ने आचार्य शुक्ल के छायावाद विरोधी विचारों को अपने तर्कों से नकारते हुए उनसे अलग राह चुनी और छायावाद का समर्थन किया। लेकिन छायावाद के प्रति सहानुभूति के प्रश्न को छोड़कर अन्य दृष्टियों से आगे की अधिकांश आलोचना ने शुक्ल जी का व्यापक समर्थन किया, उन्हीं के मार्ग पर ही आगे बढ़ी और नये सन्दर्भों में उसी दृष्टि का विकास किया।
शुक्लोत्तर युग में कुछ पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तों और विचारधाराओं के आधार पर हिन्दी में नयी आलोचना प्रवृतियों का प्रादुर्भाव भी हुआ, जिनमें स्वच्छन्दतावाद, प्रभाववाद, मनोविश्लेषणवाद, अस्तित्ववाद, शैली विज्ञान, रूपवाद और नयी समीक्षा आदि प्रमुख हैं। प्रगतिवाद भी पाश्चात्य चिन्तन मार्क्सवाद से अनुप्राणित साहित्यधारा है, लेकिन इसके मुख्य आलोचकों ने भारतीय समाज और साहित्य- परम्परा को साथ लेकर हिन्दी साहित्य में सैद्धान्तिक और व्यावहारिक आलोचना को समृद्ध किया है। शुक्लोत्तर युग के लगभग सभी आलोचक आचार्य शुक्ल से प्रेरित हुए हैं और इन पर शुक्ल जी की आलोचना-दृष्टि का पर्याप्त प्रभाव देखा जा सकता है।
इन्होंने आचार्य शुक्ल के साहित्य-सिद्धान्तों, साहित्यिक मूल्यों और निष्कर्षो का विकास किया, उनमें युगानुरूप परिवर्तन किया और नयी रचनाशीलता के लिए उन्हें अधिक उपयोगी बनाया । शुक्ल जी से प्रेरित प्रभावित होकर भी अनेक विषयों पर ये आलोचक शुक्ल जी से असहमत हुए हैं और सैद्धान्तिक और व्यावहारिक आलोचना के क्षेत्र में इन्होंने अपनी अनेक मौलिक उद्भावनाएँ प्रस्तुत की हैं। साहित्य के जिन क्षेत्रों को शुक्ल जी ने छोड़ दिया था अथवा जो उनकी दृष्टि से ओझल रह गए थे, बाद के आलोचकों ने उन क्षेत्रों की विवेचना की और नयी दृष्टि के साथ नवीन साहित्य का विवेचन-मूल्यांकन किया ।
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