आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और नया साहित्य - Acharya Ramchandra Shukla and new literature
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की मान्यताओं का विरोध छायावादी कवियों के साथ पण्डित शान्तिप्रिय द्विवेदी ने भी किया था, लेकिन उनके पास ऐसा काव्य-विवेक और तर्क शक्ति नहीं थी जो शुक्ल जी की मान्यताओं को निरस्त कर सके । शुक्ल जी ने अपने अथक प्रयासों से हिन्दी आलोचना को जिस तरह व्यवस्थित किया था एवं उसे जो प्रौढ़ता प्रदान की थी, उससे उनका आलोचकीय व्यक्तित्व बहुत समृद्ध और विराट् हो चुका था। उनसे टकराना बहुत कठिन कार्य था । आलोचना के स्तर पर उनसे सीधे-सीधे टकराने का साहस सर्वप्रथम आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने किया। उन्होंने शुक्ल जी की आलोचना की अनेक त्रुटियों की ओर संकेत किया।
रहस्यवाद को कनकौआ कहे जाने जैसी आचार्य शुक्ल की मान्यताओं को चुनौती देते हुए सन् 1931 में अपने निबन्ध 'श्री रामचन्द्र शुक्ल में उन्होंने लिखा कि "स्थूल व्यवहारवाद को निस्सीम बतलाकर और रहस्यवाद की कनकौए से तुलना कर विद्वान शुक्ल जी ने नवीन कविता के साथ अन्याय किया है।"
नये साहित्य के मूल्यांकन की दृष्टि से आचार्य शुक्ल की तुलना में उनके बाद के आलोचकों को वाजपेयी जी ने अधिक सजग और योग्य माना है।
"शुक्ल जी की अपेक्षा नयी समीक्षा में ऐतिहासिक और सामाजिक प्रेरणा शक्तियों, शैली-भेदों और कला - स्वरूपों की परख अधिक व्यापक और मार्मिक है, इसमें सन्देह नहीं। शुक्ल जी की नैतिक और बौद्धिक दृष्टि की अपेक्षा नये समीक्षकों की सौन्दर्य अनुभूति और कला -प्रधान दृष्टि एक निश्चित प्रगति है।" (- 'आधुनिक साहित्य) अपने लेखन में अनेक बार वाजपेयी जी ने आचार्य शुक्ल की महानता को स्वीकार करते हुए भी उनसे अपनी समीक्षा-दृष्टि के भेद का संकेत किया है। उनका विचार है कि शुक्ल जी ने काव्य के उदात्त स्वरूप को प्रबन्ध-काव्य में सीमित कर दिया और लोकादर्श को एक सामान्य नैतिक आधार देकर बहुत रूढ़ बना दिया है।
इसलिए उनकी आलोचना में विविधता का अभाव है और नवीन काव्य को वे सहानुभूति के साथ नहीं देख सके ।
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना दृष्टि के निर्माण में छायावादी काव्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। शुक्ल जी के सिद्धान्तों और प्रतिमानों की कमियों का सैद्धान्तिक स्तर पर प्रतिवाद करते हुए उन्होंने निष्कर्ष दिया कि "स्पष्ट है कि काव्य के ऊपर नीति का स्थूल शासन शुक्ल जी नहीं छोड़ सके और भारतीय काव्य- शास्त्रियों के रस तत्त्व की ऊँचाई को नहीं छू सके।" (- 'हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी')
नये साहित्य के प्रति शुक्ल जी की उपेक्षा-दृष्टि से नाराज होकर उनके आलोचकीय प्रतिमानों को वाजपेयी जी ने नये साहित्य के मूल्यांकनकी दृष्टि से अपर्याप्त माना है।
शुक्ल जी के काव्य-विवेचन की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा है कि "शुक्ल जी की सारी विचारणा द्विवेदी युग की व्यक्तिगत, भावात्मक और आदर्शोन्मुख नीतिमत्ता पर स्थित है। समाजशास्त्र, संस्कृति और मनोविज्ञान की वस्तून्मुखी मीमांसा उन्होंने नहीं की। प्रवृत्ति- विषयक उनकी धारणा भारतीय धार्मिक धारणा की अपेक्षा पाश्चात्य अधिक है। उनका काव्य-विवेचन भी प्रबन्ध- कथानक और जीवन-सौन्दर्य के व्यक्त रूपों का आग्रह करने के कारण सर्वांगीण और तटस्थ नहीं कहा सकता। नवीन युग की सामाजिक और सांस्कृतिक जटिलताओं का विवेचन और उनसे होकर बहने वाली काव्यधारा का आकलन हम शुक्ल जी में नहीं पाते।" (- 'हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी') आचार्य शुक्ल के जीवन काल में, जब उनका आलोचकीय व्यक्तित्व पूर्ण निखार पर था, आचार्य द्विवेदी ने उनसे असहमत होकर आलोचना को नयी दिशा की ओर मोड़ने का प्रयास किया। यह स्वच्छन्दतावादी आलोचना के विकास की दिशा थी।
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