शुक्ल युग के मुख्य आलोचक आचार्यरामचन्द्र शुक्ल - Acharya Ramchandra Shukla, the main critic of the Shukla era
हिन्दी आलोचना की अब तक की यात्रा में जहाँ आधुनिकता और नवीन ज्ञान-विज्ञान के आलोक में साहित्य को देखने-समझने के प्रयास हुए थे, वहीं साहित्य के सामाजिक सन्दर्भों और उसकी उपयोगिता पर भी आलोचकों ने विचार किया था, परन्तु साहित्य-समीक्षा कृति के गुण-दोष प्रदर्शन और तुलनात्मक अध्ययन से आगे नहीं बढ़ पाई थी । कृति की विशेषताओं को उद्घाटित कर उसके सामाजिक और साहित्यिक महत्त्व का प्रतिपादन करने वाली सच्ची आलोचना अब तक सामने नहीं आ पाई थी। यह कार्य हिन्दी आलोचना में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के आने पर ही हो सका।
उच्च शिक्षा के लिए स्तरीय ग्रन्थों के निर्माण और साहित्य के अनुसंधान- अनुशीलन की दृष्टि से काशी नागरी प्रचारिणी सभा' के मुख्य संस्थापक तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष के रूप में बाबू श्यामसुन्दर दास ने ऐतिहासिक कार्य किया और आलोचना के विकास के लिए सुविधाएँ और संसाधन उपलब्ध करवाए। कुछ स्वतन्त्र आलोचनात्मक लेखों एवं अनुवादों के प्रकाशन के अनन्तर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल नागरी प्रचारिणी सभा की योजनाओं के अन्तर्गत ही साहित्येतिहास लेखन और आलोचना में प्रवृत्त हुए तथा अपनी प्रतिभा से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया ।
आचार्य शुक्ल ने भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग की आलोचना-परम्परा को विकसित और समृद्ध करते हुए 'कवि की अन्तर्वृत्ति का सूक्ष्म व्यवच्छेद' करने वाली आलोचना की आधारशिला रखी। उन्होंने सूर, तुलसी और जायसी आदि कवियों के मूल्यांकन द्वारा आलोचना के नये और आधुनिक मान-मूल्य प्रस्तुत किए। आचार्य शुक्ल ने साहित्य को जीवन-सन्दर्भों में समझने और परखने की नयी दृष्टि दी जिसे अपनाकर इस युग के अन्य आलोचकों ने भी रचना के गुण-दोष विवेचन से आगे बढ़कर कवियों की विशेषताओं और अन्तर्वृत्तियों की छानबीन की ओर ध्यान देना शुरू किया।
आचार्य शुक्ल ने भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्र के गहन अध्ययन- मनन के उपरान्त अपने काव्य निकष विकसित किए थे। अपने लेखन में सैद्धान्तिक और व्यावहारिक आलोचना का समन्वय करते हुए हिन्दी आलोचना को आधुनिक और प्रगतिशील पथ पर आगे बढ़ाया। उन्होंने मध्यकालीन और छायावादी कवियों का गम्भीर मूल्यांकन करके जहाँ एक ओर व्यावहारिक आलोचना का आदर्श प्रस्तुत किया, वहीं दूसरी ओर 'रस मीमांसा' और 'चिन्तामणि' जैसे ग्रन्थों के माध्यम से सैद्धान्तिक आलोचना की नयी पीठिका रची।
हिन्दी आलोचना में आचार्य शुक्ल के पदार्पण से उस युग की साहित्यिक रुचि में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ । रीतिकालीन काव्य-संस्कारों को विस्थापित करते हुए भक्ति साहित्य जन-रुचि और आलोचना के केन्द्र में आ गया । आचार्य शुक्ल ने सम्पूर्ण साहित्यिक परम्परा का पुनर्गठन करके यह दिखाया कि हिन्दी जगत् की साहित्यिक रुचि को भ्रष्ट करने में रीतिग्रन्थों का मुख्य योगदान है तथा रीति कवियों की संकुचित काव्य-दृष्टि का कारण भी ये रीतिग्रन्थ हैं।
आचार्य शुक्ल ने गहन अध्ययन और पैनी दृष्टि से जीवन, साहित्य और भाव जगत् का पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित किया और इसी प्रक्रिया में उन्होंने आलोचना के अपने मानदण्ड विकसित किए।
अपने अध्ययन से अर्जित सिद्धान्तों का उपयोग अपनी व्यावहारिक आलोचना में उन्होंने बहुत कुशलतापूर्वक किया है। सिद्धान्त और व्यवहार की यह एकता उनकी आलोचना दृष्टि की मुख्य विशेषताओं में से एक है।
आचार्य शुक्ल लोकवादी आलोचक हैं। उनके अनुसार मनुष्य लोकबद्ध प्राणी हैं, काव्य लोकबद्ध है, यहाँ तक कि मनुष्य का अपनी सत्ता का ज्ञान तक लोकबद्ध है। उन्होंने हिन्दी साहित्य में लोकमंगल की प्रतिष्ठा की। लोकमंगल, लोकधर्म आदि मानदण्डों के आधार पर ही वे साहित्य की गुणवत्ता का निर्णय करते हैं।
आचार्य शुक्ल का लोकधर्म मनुष्य के सामाजिक जीवन यथार्थ और व्यावहारिक आचार-विचार पर आधारित है। उनके लोकमंगल और लोकधर्म में समाज की सुव्यवस्था और रक्षा का भाव अन्तर्निहित है। साहित्य को जीवन सन्दर्भों में देखते हुए साहित्य और समाज के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करना आचार्य शुक्ल की आलोचना-पद्धति की मुख्य विशेषताएँ हैं। अपनी आलोचना में सामाजिक सन्दर्भ को महत्त्व देते हुए भी वे कवि के व्यक्तित्व और मनःस्थिति को अपने चिन्तन में शामिल रखते हैं। 1
आचार्य शुक्ल ने लोकहृदय में लीन होने की दशा को रस दशा कहा है। उन्होंने रस को अलौकिक या अतीन्द्रिय न मानकर उसे विशुद्ध लौकिक और मानवीय धरातल पर प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने रसानुभूति और जीवनानुभूति में अभिन्न सम्बन्धों का उद्घाटन किया तथा रस को उपभोग और आस्वाद से ऊँचा उठाकर मनुष्यत्व के उच्चतम शिखर तक ले जाने वाली प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया। यहीं हृदय की मुक्तावस्था है जिसमें रस व्यक्तिबद्ध न रहकर लोकबद्ध हो जाता है। इस प्रकार आचार्य शुक्ल का रसवाद उनकी लोकमंगल की अवधारणा से जुड़ जाता है।
आचार्य शुक्ल ने भारतीय और पाश्चात्य सभी प्रकार के विचारों, मतों और सिद्धान्तों को अपने विवेक की कसौटी पर परखकर ही उन्हें अपनी समीक्षा में स्थान दिया है। उन्होंने हिन्दी आलोचना के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों रूपों को अपनी प्रतिभा, सूक्ष्म विवेचन तथा गम्भीर मूल्यांकन के माध्यम से नयी ऊँचाई प्रदान की और आगे की आलोचना का मार्ग प्रशस्त किया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के आलोचना-कर्म के बारे में आप इस पाठ्यचर्या के खण्ड 2 की इकाई 1 में विस्तार से पढ़ेंगे।
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