आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का तुलसी की आलोचना - Acharya Ramchandra Shukla's criticism of Tulsi

'तुलसी ग्रन्थावली' की भूमिका के रूप में लिखी गई 'गोस्वामी तुलसीदास' उनकी पहली आलोचना- पुस्तक है । तुलसी हिन्दी के एक प्रतिष्ठित और लोकप्रिय कवि थे। शुक्ल जी ने तुलसी के काव्य का विवेचन करके उसकी महानता को प्रकट किया और उन कारणों को रेखांकित किया जिनके कारण यह काव्य आधुनिक युग में भी इतना लोकप्रिय है। शुक्ल जी ने तुलसी की युग-सन्दर्भों में व्याख्या करते हुए उसके काव्य का महत्व और मूल्य हिन्दी जगत् के सामने रखा। तुलसी की आलोचना में ही उन्होंने अपना 'लोकधर्म' की अवधारणा विकसित की।

तुलसी की आलोचना में शुक्ल जी ने तुलसीकाव्य के अन्तरण और बहिरण पक्षों का विश्लेषण करते हुए तुलसी की भक्ति-पद्धति, प्रकृति और स्वभाव, लोक-धर्म, धर्म और जातीयता का समन्वय, मंगलाषा, लोक-नीति और मर्यादावाद, शील, साधना और भक्ति तथा ज्ञान का युग सापेक्ष मूल्यांकन किया। साथ ही तुलसी की काव्य-पद्धति, उक्ति वैचित्र्य, भाषा आदि के विश्लेषण द्वारा तुलसी के कला पक्ष का उद्घाटन किया। उन्होंने तुलसी को लोक-धर्म का सच्चा व्याख्याता बताते हुए तुलसी की भक्ति को हृदयता से प्रेरित माना "भगवान का जो प्रतीक तुलसीदास ने लोक के सम्मुख रखा है भक्ति का जो प्रकृत आलम्बन उन्होंने खड़ा किया है, उसमें सौन्दर्य,

शक्ति और शील, तीनों विभूतियों की पराकाष्ठा है। सगुणोपासना के ये तीन सोपान हैं जिन पर हृदय क्रमशः टिकता हुआ उच्चता की ओर बढ़ता है।" (- 'गोस्वामी तुलसीदास) शुक्ल जी के अनुसार तुलसी की भक्ति की विशेषता यह है कि उसमें जीवन के सभी पक्षों का समन्वय है। वह धर्म और ज्ञान दोनों की रसानुभूति कराने वाली है, चित्ताग्रता के लिए आवश्यक योग भी उसमें मिला हुआ है । उन्होंने भक्ति की चरम सीमा पर पहुँचकर भी उसका लोक पक्ष नहीं छोड़ा। लोकसंग्रह का भाव उनकी भक्ति का एक अंग था। व्यक्तिगत साधना के साथ ही उसमें लोकधर्म की उज्ज्वल छटा पाई जाती है।


शुक्ल जी ने तुलसी को जीवन की प्रत्येक स्थिति के मर्मस्पर्शी अंश का साक्षात्कार कर उन्हें काव्य में प्रस्तुत करने वाला कवि कहा है। शुक्ल जी ने चित्त को द्रवित करने वाले प्रसंगों का विवेचन बड़े मनोयोग से किया है। उन्होंने लिखा है कि "रामकथा के भीतर ये स्थल अत्यन्त मर्मस्पर्शी है राम का अयोध्या-त्याग और पथिक के रूप में वन गमन, चित्रकूट में राम और भरत का मिलन, शबरी का आतिथ्य, लक्ष्मण को शक्ति लगने पर राम का विलाप, भरत की प्रतीक्षा।" (- 'गोस्वामी तुलसीदास) इनमें में भी शुक्ल जी राम के वन गमन को सर्वाधिक मार्मिक प्रसंग मानते हैं- “एक सुन्दर राजकुमार के छोटे भाई और स्त्री को लेकर घर से निकलने और वन-वन फिरने से अधिक मर्मस्पर्शी दृश्य क्या हो सकता है ?"

(- 'गोस्वामी तुलसीदास') 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में शुक्ल जी तुलसी के काव्य की विशेषताएँ बताते हुए लिखते हैं कि "उनकी साहित्य मर्मज्ञता, भावुकता और गम्भीरता के सम्बन्ध में इतना और जान लेना भी आवश्यक है कि उन्होंने रचना नैपुण्य का भद्दा प्रदर्शन कहीं नहीं किया है और न शब्द चमत्कार आदि के खेलवाड़ों में वे फँसे हैं। अलंकारों की योजना उन्होंने ऐसे मार्मिक ढंग से की है कि वे सर्वत्र भावों या तथ्यों की व्यंजना को प्रस्फुटित करते हुए पाए जाते हैं, अपनी अलग चमक-दमक दिखाते हुए नहीं। कहीं-कहीं लम्बे-लम्बे सांगरूपक बाँधने में अवश्य उन्होंने एक भद्दी परम्परा का अनुसरण किया है। 'दोहावली' के कुछ दोहों के अतिरिक्त और सर्वत्र भाषा का प्रयोग उन्होंने भावों और विचारों को स्पष्ट रूप में रखने के लिए किया है कारीगरी दिखाने के लिए नहीं ।" तुलसी की भाषा के सम्बन्ध में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यह एक कवि हिन्दी को प्रौढ़ भाषा सिद्ध करने के लिए काफी है।