आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का सूरदास की आलोचना - Acharya Ramchandra Shukla's criticism of Surdas

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'भ्रमरगीत सार' की भूमिका में सूरदास पर विस्तृत आलोचना लिखने का इरादा प्रकट किया था। उनकी पुस्तक 'सूरदास' (1943) का प्रकाशन उनकी मृत्यु के बाद ही हो सका। शुक्ल जी सूरदास को मुख्यतः शृंगार और वात्सल्य का कवि मानते हैं। उनके अनुसार सूर साहित्य का मूल भाव करुणा न होकर प्रेम है। वे सूर को हिन्दी साहित्य में शृंगार का पूर्ण रूप में रसराजत्व दिखाने वाला कवि मानते हैं। शृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों के चित्रण में सूरदास को भारी सफलता मिली है। शुक्ल जी सूर के संयोग चित्रण के बारे में लिखते हैं कि "सूर का संयोगवर्णन एक क्षणिक घटना नहीं है, प्रेमसंगीतमय जीवन की एक गहरी चलती धारा है, जिसमें अवगाहन करनेवाले को दिव्य माधुर्य के अतिरिक्त और कहीं कुछ नहीं दिखाई पड़ता । " सूर को वे प्रेम नाम की मनोवृत्ति का पूर्ण ज्ञाता कहते हैं। प्रेम का भी हास-क्रीडामय स्वरूप सूर को प्रिय है।


शुक्ल जी ने सूरदास की सहृदयता और भावुकता के साथ-साथ उनकी चातुरता और वाग्विदग्धता को भी उनके काव्य का मुख्य गुण माना है। सूरदास के मूल्यांकन में यत्र-तत्र शुक्ल जी तुलसीदास से उनकी तुलना के आधार पर निष्कर्ष देते हैं। सूर काव्य के गीतों का विवेचन करते हुए वे कहते हैं कि रामचरित का गान करने वाले गायकों में तुलसी सर्वश्रेष्ठ हैं और कृष्णचरित्र गाने वालों में सूर शृंगार और वात्सल्य के भावों की अभिव्यक्ति में सूरदास के कौशल और अधिकार की प्रशंसा करते हुए शुक्लजी कहते हैं कि "यद्यपि तुलसी के समान सूर का काव्यक्षेत्र इतना व्यापक नहीं कि उसमें जीवन कि भिन्न दशाओं का समावेश हो पर जिस परिमित पुण्यभूमि में उनकी वाणी ने संचरण किया उसका कोई कोना अछूता नहीं। शृंगार और वात्सल्य के क्षेत्र में जहाँ तक इनकी दृष्टि पहुँची वहाँ तक और किसी कवि की नहीं। गोस्वामी तुलसीदास ने गीतावली में बाललीला को इनकी देखादेखी बहुत अधिक विस्तार दिया सही, पर उसमें बालसुलभ भावों और चेष्टाओं की वह प्रचुरता नहीं आई, उसमें रूप वर्णन की ही प्रचुरता रही।" (- 'हिन्दी साहित्य का इतिहास')


बाह्य सृष्टि से सूर ने अपने काव्य के लिए सीमित रूपों और क्रिया व्यापारों को चुना है। शुक्ल जी इसका कारण बताते हुए कहते हैं कि सूरदास का काव्यरूप गीति काव्य है जिनकी विषयवस्तु व्यापक जीवन न होकर चुने हुए दृश्य या प्रसंग ही हो सकते हैं। दूसरे, लोक-संघर्ष से उत्पन्न विविध व्यापारों का वर्णन करना सूर का उद्देश्य ही नहीं था, क्योंकि मूल रूप से वे बाल-वृत्ति और यौवन-वृत्ति के विविध रूपों के उद्गाता हैं। इसलिए जो वस्तु- गाम्भीर्य तुलसी के प्रबन्ध काव्य में है वह सूर के गीति काव्य में नहीं। मौखिक गीतों को शुक्ल जी जनता की भाषा और भावों व्यंजना की सुदीर्घ परम्परा मानते हैं। सूरसागर को उन्होंने इस परम्परागत मौखिक परम्परा का विकास माना है।