आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का छायावाद की आलोचना - Acharya Ramchandra Shukla's criticism of shadowism
आचार्य शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में लिखा है 'छायावाद' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में - समझना चाहिए। एक तो रहस्यवाद के अर्थ में जहाँ उसका सम्बन्ध काव्यवस्तु से होता है अर्थात् जहाँ कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यन्त चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है।... 'छायावाद' शब्द का दूसरा प्रयोग काव्यशैली या पद्धतिविशेष के व्यापक अर्थ में है । ... हिन्दी में 'छायावाद' शब्द का जो व्यापक अर्थ में रहस्यवादी रचनाओं के अतिरिक्त और प्रकार की रचनाओं के सम्बन्ध - में भी ग्रहण हुआ वह इस प्रतीक शैली के अर्थ में छायावाद का सामान्यतः अर्थ हुआ प्रस्तुत के स्थान पर - उसकी व्यंजना करने वाली छाया के रूप में अप्रस्तुत का कथन।"
शुक्ल जी ने हिन्दी के छायावादी कवियों में केवल महादेवी वर्मा को छायावाद का मूल अर्थ अर्थात् रहस्यवाद को लेकर चलने वाली कवयित्री बताया है। प्रसाद, पंत और निराला आदि को प्रतीक पद्धति या चित्रभाषा शैली की दृष्टि से ही छायावादी कवि माना है। बाद के आलोचकों ने शुक्ल जी द्वारा छायावाद को उपर्युक्त दो अर्थों तक सीमित करने को अनुचित बताया है।
डॉ. रामविलास शर्मा ने छायावाद को हिन्दी साहित्य की रोमांटिक और रीतिकालीन परम्परा की विरोधी धारा बताते हुए रहस्यवाद को उसका एक कमज़ोर पक्ष कहा है।
जब छायावाद की ऐसी कविताएँ शुक्ल जी के ध्यान में आई जिनमें रहस्यवाद नहीं दिखा तो उन्होंने छायावाद की उदार व्याख्या करने के स्थान पर उन रचनाओं को छायावाद से बाहर की चीज़ मान लिया। छायावादी कवियों का अलग-अलग मूल्यांकनकरते समय शुक्ल जी ने उनकी कविताओं की विशेषताएँ भी बताई हैं। जहाँ-जहाँ रहस्यवाद से ऊपर उठकर काव्य-रचना की है, शुक्ल जी ने उसकी सराहना की है।
निराला की बहुमुखी काव्यदृष्टि का संकेत करते हुए उन्होंने 'तुलसीदास' कविता में तुलसी के 'मानस-विकास का बड़ा ही दिव्य और विशाल रंगीन चित्र' खींचने को रेखांकित किया है तथा उनकी शैली को अन्य कवियों से अलग बताया है। शुक्ल जी ने प्रसाद की उन कविताओं के प्रति सन्तोष प्रकट किया है। जिनमें रहस्यवाद कम है या नहीं है। उन्होंने पंत की रहस्यभावना को साम्प्रदायिकता से मुक्त और स्वाभाविक कहा है और उनके प्रकृति चित्रण को भी पसंद किया है। छायावाद के मूल्यांकनमें शुक्ल जी ने इस बात पर हर्ष व्यक्त किया है कि अब कई कवि जीवन और जगत् के अधिक मार्मिक पक्षों की ओर बढ़ रहे हैं और उनमें अपनी रचनाओं को सुव्यवस्थित और अर्थगर्भित रूप देने की रुचि भी बढ़ रही है।
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