आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काव्य रूप प्रबन्ध और मुक्तक - Acharya Ramchandra Shukla's poetic form, Prabandha and Muktak

आचार्य शुक्ल जीवन की समग्रता के आलोचक हैं। इसलिए काव्य में उन्हें मुक्तक से अधिक प्रबन्ध काव्य पसंद है क्योंकि "प्रबन्ध काव्य में मानव जीवन का पूर्ण दृश्य होता है। उसमें घटनाओं की सम्बद्ध शृंखला और स्वाभाविक क्रम के ठीक-ठीक निर्वाह के साथ हृदय को स्पर्श करने वाले उसे नाना भाव का रसात्मक अनुभव कराने वाले प्रसंगों का समावेश होना चाहिए।" (- 'जायसी ग्रन्थावली', वक्तव्य) इतना ही नहीं, - प्रबन्ध काव्यों की इतिवृत्तात्मकता को लेकर भी शुक्ल जी सचेत हैं और उनमें रसात्मक प्रसंगों के सन्निवेश तथा घटनाओं या वृत्तों के सम्बन्ध-निर्वाह को आवश्यक मानते हैं।
शुक्ल जी के अनुसार एक सफल प्रबन्धकार की कसौटी यह है कि वह किसी आख्यान में जीवन की प्रत्येक स्थिति के अधिकतम मर्मस्पर्शी स्थलों की पहचान करे और श्रोता या पाठक के सम्मुख अपनी शब्दशक्ति द्वारा उन्हें प्रकट करे। प्रबन्ध काव्य की तुलना में मुक्तक जीवन की व्यापकता के स्थान पर किसी खण्ड विशेष को ही चुनता है इसलिए उसमें जीवन की विविधता और विभिन्न भावों का चित्रण नहीं होता है।

शुक्ल जी ने प्रबन्ध काव्य और मुक्तक की परस्पर तुलना करते हुए प्रबन्ध काव्य को विस्तृत वनस्थली और मुक्तक को चुना हुआ गुलदस्ता कहा है।

उन्होंने बताया है कि मुक्तक में प्रबन्ध के समान रस कि ऐसी धारा नहीं रहती जिसमें पाठक मग्न हो कर अपने हृदय में स्थायी प्रभाव ग्रहण कर सके। मुक्तक में रस के कुछ छींटे ही पड़ते हैं जिससे पाठक के हृदय पर अस्थायी प्रभाव ही पड़ता है। जो कवि कल्पना की समाहार-शक्ति के साथ भाषा कि समास-शक्ति में निपुण होगा वही मुक्तक की रचना में सफल होगा। इसी दृष्टि से उन्होंने भक्तिकालीन मुक्तक काव्य की प्रशंसा की है। रीतिकालीन मुक्तक काव्य में बाहरी आडम्बरों की अधिकता के कारण हृदय पक्ष दबा हुआ रह गया,

रसात्मकता बाधित हुई, इसलिए शुक्ल जी उसकी आलोचना करते हैं। काव्य रूप की दृष्टि से प्रबन्ध काव्य में रसात्मकता की अधिक सम्भावना रहती है। शुक्ल जी रसात्मकता की दृष्टि से ही प्रबन्ध काव्य को मुक्तक से श्रेष्ठ मानते हैं। जिस प्रबन्ध काव्य में यह रसात्मकता उच्च कोटि की नहीं है वह प्रबन्ध काव्य भी शुक्ल जी की दृष्टि में श्रेष्ठ नहीं है। केशवदास की 'रामचन्द्रिका' को उन्होंने इसीलिए पसंद नहीं किया। 'भाव दशा' की दृष्टि से शुक्ल जी की मान्यता है कि महाकाव्य या खण्ड काव्य में 'स्थायी दशा' और मुक्तक काव्य में क्षणिक दशा देखी जाती है । प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य के अतिरिक्त 'गीति काव्य' के सम्बन्ध में शुक्ल जी का विचार है। कि जन-जीवन में चिरकाल से प्रचलित लोकगीत 'गीति काव्य' का मूल स्रोत हैं।