आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काव्य रूप प्रबन्ध और मुक्तक - Acharya Ramchandra Shukla's poetic form, Prabandha and Muktak
शुक्ल जी ने प्रबन्ध काव्य और मुक्तक की परस्पर तुलना करते हुए प्रबन्ध काव्य को विस्तृत वनस्थली और मुक्तक को चुना हुआ गुलदस्ता कहा है।
उन्होंने बताया है कि मुक्तक में प्रबन्ध के समान रस कि ऐसी धारा नहीं रहती जिसमें पाठक मग्न हो कर अपने हृदय में स्थायी प्रभाव ग्रहण कर सके। मुक्तक में रस के कुछ छींटे ही पड़ते हैं जिससे पाठक के हृदय पर अस्थायी प्रभाव ही पड़ता है। जो कवि कल्पना की समाहार-शक्ति के साथ भाषा कि समास-शक्ति में निपुण होगा वही मुक्तक की रचना में सफल होगा। इसी दृष्टि से उन्होंने भक्तिकालीन मुक्तक काव्य की प्रशंसा की है। रीतिकालीन मुक्तक काव्य में बाहरी आडम्बरों की अधिकता के कारण हृदय पक्ष दबा हुआ रह गया,
रसात्मकता बाधित हुई, इसलिए शुक्ल जी उसकी आलोचना करते हैं। काव्य रूप की दृष्टि से प्रबन्ध काव्य में रसात्मकता की अधिक सम्भावना रहती है। शुक्ल जी रसात्मकता की दृष्टि से ही प्रबन्ध काव्य को मुक्तक से श्रेष्ठ मानते हैं। जिस प्रबन्ध काव्य में यह रसात्मकता उच्च कोटि की नहीं है वह प्रबन्ध काव्य भी शुक्ल जी की दृष्टि में श्रेष्ठ नहीं है। केशवदास की 'रामचन्द्रिका' को उन्होंने इसीलिए पसंद नहीं किया। 'भाव दशा' की दृष्टि से शुक्ल जी की मान्यता है कि महाकाव्य या खण्ड काव्य में 'स्थायी दशा' और मुक्तक काव्य में क्षणिक दशा देखी जाती है । प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य के अतिरिक्त 'गीति काव्य' के सम्बन्ध में शुक्ल जी का विचार है। कि जन-जीवन में चिरकाल से प्रचलित लोकगीत 'गीति काव्य' का मूल स्रोत हैं।
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