आचार्य चिन्तामणि का अलंकार-निरूपण - Allegorical representation of Acharya Chintamani
चिन्तामणि ने 'कविकुलकल्पतरु' के द्वितीय और तृतीय प्रकरण में अलंकार निरूपण किया है। इस प्रकरण में उन्होंने कुल 357 छन्दों का प्रयोग किया है। अलंकारों के लक्षण जहाँ दोहा तथा सोरठा छन्द में प्रस्तुत हैं, वहीं उदाहरण दोहा, सोरठा, कवित्त व सवैया छन्द में मिलते हैं। इस प्रकरण में गद्य का प्रयोग केवल दो बार हुआ है जिसमें अप्रस्तुतप्रशंसा और संकर के उदाहरणों का समन्वयन दिखाया गया है। अलंकार प्रकरण के लिए उन्होंने आचार्य विद्यानाथ और मम्मट के अतिरिक्त आचार्य विश्वनाथ और अप्पयदीक्षित के ग्रन्थों का सहारा लिया है। शब्दालंकारों के अन्त में तथा उत्प्रेक्षा और पर्यायोक्ति के प्रसंग में चिन्तामणि आचार्य विद्यानाथ का उल्लेख करते हैं। उत्प्रेक्षा,
अतिशयोक्ति, समासोक्ति, विरोध और परिसंख्या के निरूपण में उन्होंने आचार्य मम्मट का अनुकरण किया है। उत्प्रेक्षा अलंकार के प्रसंग में वे 'कुवलयानन्द' ग्रन्थ का भी उल्लेख करते हैं।
अवधारणा
अलंकार आरम्भ से ही काव्यानुशीलन का एक मुख्य विषय रहा है। अलंकार विषयक अवधारणा के विषय में चिन्तामणि के विचार मम्मट आदि नव्याचायों के अनुरूप हैं। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित बिन्दु द्रष्टव्य हैं-न i)
चिन्तामणि के अनुसार अनुप्रास, उपमादि अलंकारों का धर्म शब्दार्थ रूप काव्य-शरीर को ठीक उसी तरह अलंकृत करना है जिस तरह लौकिक अलंकार मानव शरीर को सुशोभित करते हैं -
सब्द अर्थ तनु वर्णिये जीवित रस जिये जानि । अलंकार हारादि ते उपमादिक मन मानि ॥ अलंकार ज्यों पुरुष को हारादिक मन आनि । प्रासोपम आदिक कवित्त अलंकार ज्यों जानि ॥
(ii) उनके अनुसार अलंकारविहीन चित्रकाव्य अधम काव्य है -
सब्द चित्र इत्त ए सबै अधम कवित्त पहिचानी ।
जेते हैं ध्वनि-हीन ते अर्थ चित्र सो मानि ॥
(iii) उनके मतानुसार अलंकार का प्रधान उद्देश्य शब्दार्थ रूप शरीर का अलंकरण मात्र है। (iv) उन्होंने अलंकार के दो भेद किए हैं शब्दालंकार और अर्थालंकार। उभयालंकार का उल्लेख उन्होंने नहीं किया है। 'कविकुलकल्पतरु' में अलंकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-
वक्रोक्ति अनुप्रास पुनि कहि लाटानुप्रास । जमक स्लेषो चित्र पुनि पुनरुक्तवदाभास ॥ सात शब्दालंकार ये तिन में शब्द जो होइ। ताहीं ते पर्जाय पद दैन न भासै कोइ ॥
(v) अलंकारों की सूची व क्रमबन्धन हेतु उन्होंने आचार्य विद्यानाथ का अनुकरण किया है जबकि अलंकारों के स्वरूप और भेदोपभेद के लिए आचार्य मम्मट का ।
भेदों का आधार
अलंकारों के भेदोपभेद के लिए चिन्तामणि पर मम्मट के अतिरिक्त विद्यानाथ, विश्वनाथ और अप्पयदीक्षित का प्रभाव भी देखा जा सकता है। विभिन्न अलंकारों के भेदोपभेदों के सम्बन्ध में चिन्तामणि पर विभिन्न आचार्यों का प्रभाव इस प्रकार देखा जा सकता है-
(i) रूपक (विश्वनाथ), परिसंख्या (मम्मट और विश्वनाथ), उत्प्रेक्षा (विद्यानाथ व अप्पयदीक्षित), उल्लेख (विश्वनाथ व विद्यानाथ) और समासोक्ति (विद्यानाथ)
(ii) मालोपमा, अतिशयोक्ति, विरोध, सम, प्रथम, निदर्शना, आक्षेप, अप्रस्तुतप्रशंसा, प्रतीप, उदात्त,
अर्थान्तरन्यास और संकर अलंकारों के भेदोपभेद (मम्मट)
(iii) व्यतिरेक के बारह भेद आचार्य मम्मट के अनुरूप है। हालांकि चिन्तामणि ने उन भेदों के नामों का उल्लेख स्पष्टतया नहीं किया है।
(iv) उपमा के पूर्णा और लुप्ता नामक दो भेदों का स्वरूप आचार्य मम्मट के अनुकूल है, जबकि इस अलंकार के श्रौती- आर्थी भेदों का स्वरूप आचार्य विश्वनाथ के अनुरूप है।
अलंकारों के लक्षण
अलंकार-प्रकरण में चिन्तामणि ने आचार्य मम्मट, आचार्य विश्वनाथ और आचार्य अप्पयदीक्षित का आधार ग्रहण कर अपनी संग्राहक क्षमता का परिचय दिया है।
कहना सही होगा कि चिन्तामणि द्वारा मम्मटादि नव्याचार्यो प्रतिपादित अलंकारों का मूल्यांकन और उन्हीं की शैली में उनका स्वरूपाख्यान हिन्दी काव्यशास्त्र के इतिहास की पहली महत्त्वपूर्ण घटना मानी जा सकती है। इस सम्बन्ध में चिन्तामणि का अवदान निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत परिगणित किया जा सकता है-
(1) आचार्य चिन्तामणि सभी शब्दालंकारों में स्वरूप निर्धारण तथा उनके भेदों के लिए आचार्य मम्मट का अनुसरण करते हैं। फिर भी उनकी प्रस्तुति में यथासम्भव सरलता एवं सुबोधगम्यता देखी जा सकती है। उदाहरणार्थ, शब्दश्लेष के लक्षण प्रस्तुत हैं-
भिन्ने पदन में एक सों जहाँ अर्थ आभास ।
(ii) आचार्य मम्मट का अनुसरण करते हुए उन्होंने अनुप्रास के दो भेद किए हैं पहला, छेकानुप्रास और दूसरा, वृत्यनुप्रास। हालाँकि, उनके द्वारा प्रस्तुत छेकानुप्रास का स्वरूप सीमित है। क्योंकि इस अलंकार के लिए यह आवश्यक नहीं है कि केवल ललित अक्षरों की ही आवृत्ति की जाए। इसके अन्तर्गत मधुर और कठोर दोनों प्रकार के वर्णों की आवृत्ति की जा सकती है। ही रखा
(iii) अर्थालंकार के स्वरूप निर्धारण में अलंकारों का क्रम उन्होंने आचार्य विद्यानाथ के अनुरूप है जबकि अलंकारों के लक्षण वे आचार्य मम्मट के अनुसार निरूपित करते हैं।
(iv) रूपक, समासोक्ति, दीपक और पर्यायोक्ति अलंकारों के दो-दो लक्षण प्रस्तुतीकरण में चिन्तामणि ने पहला लक्षण मम्मट के अनुसार और दूसरा विद्यानाथ के अनुसार प्रस्तुत किया है।
(v) आचार्य चिन्तामणि ने विभावना का लक्षण आचार्य विद्यानाथ के अनुसार निर्दिष्ट किया है जबकि विशेषोक्ति निरूपण में वे आचार्य मम्मट का अनुसरण करते हैं।
(vi) 'सार' अलंकार में परावधि के उत्कर्ष में चमत्कार निहित है लेकिन चिन्तामणि ने परावधि की चर्चा नहीं की है।
(vii) दीपक और तुल्योगिता अलंकारों में औपम्य का गम्यहोना अनिवार्य है । चिन्तामणि दीपक अलंकार के प्रसंग में तो इस अनिवार्यता को निर्दिष्ट करते हैं लेकिन तुल्योगिता अलंकार के प्रसंग में वे मौन हैं।
(viii) आचार्य चिन्तामणि के अनुसार अतिशयोक्ति अलंकार केवल कविप्रौढोक्ति पर आश्रित नहीं है। उन्होंने लिखा है -
प्रौढ़ उक्ति जो कविन की अतिशयोक्ति है सोई।
रीति-निरूपण
चिन्तामणि ने आचार्य मम्मट का अनुकरण करते हुए अनुप्रास नामक शब्दालंकार के अन्तर्गत रीतियों का निरूपण किया है। उन्होंने 'काव्यपुरुष रूपक' के अन्तर्गत रीति को मानव स्वभाव के समान सुनिर्दिष्ट किया है। 'कविकुलकल्पतरु' में अभिव्यक्त रीति-निरूपण सम्बन्धी उनके विचार इस प्रकार हैं-
वैदर्भी पंचाल जो गौडी धरम नवीन ।
रीति कहत कोउ उन्हें वृतिजे हैं ए तीन ॥
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