कवि आचार्य शिक्षण- परम्परा और देव - Allegorical representation of Acharya Chintamani
रीतिकर्म और कविकर्म का समान महत्त्व है। रचनाकार की दृष्टि, काव्यांग विवेचन तथा निरूपण शैली के आधार पर उसकी अन्तः प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया जा सकता है। कवि आचार्य शिक्षण- परम्परा के प्रतिनिधि आचार्यों ने अपने ग्रन्थों का निर्माण सामान्य पाठकों के काव्यशास्त्रीय ज्ञानार्जन हेतु किया है। पूर्ववर्ती संस्कृत काव्यशास्त्रियों का अनुकरण करते हुए आचार्य देव ने प्राचीन स्थापनाओं को सुबोधगम्य एवं सरस शैली में प्रस्तुत किया है। काव्य स्वरूप और काव्यांगों के अनुशीलन में मूलतः रसवाद की स्थापना देखने को मिलती है।
व्यक्तित्व
उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कवि आचार्य देव का जन्म संवत् 1730 तथा मृत्यु संवत् 1846 वि. में हुई। वे इटावा के द्यौसरिया ब्राह्मण थे। कुछ विद्वान उनके पिता का नाम बिहारीलाल दुबे बताते हैं, जबकि कुछ बंशीधर । उल्लेखनीय है कि हितहरिवंश जी के बारह शिष्यों में से देव प्रमुख शिष्य माने जाते हैं। यही वजह हैं कि उनकी काव्य प्रवृत्ति में नैतिकता का अंश प्रायः उभर कर आता है। देव को स्थायी रूप से किसी एक राजा या बादशाह का सुदृढ़ आश्रय प्राप्त नहीं हुआ। वे अलग-अलग समय में कुछ अवधि के लिए आजम शाह, राजा सीताराम, कुशलसिंह भोगीलाल आदि राजाओं के आश्रय में रहे।
उन्होंने स्वयं किसी एक राजा के आश्रय में दीर्घ समय तक रहना पसंद नहीं किया। वस्तुतः देव की यायावरी प्रवृत्ति प्रायः उन्हें देशाटन के लिए प्रेरित करती रही। इसी कारण वे देश के अनेक जमींदार व क्षत्रिय कुलों के सम्पर्क में भी आए।
आचार्यत्व
आचार्य केशवदास के समान ही देव ने भी अपने कवि और आचार्य कर्म का अत्यन्त कुशलतापूर्वक निर्वहन किया है। उनके द्वारा रचित ग्रन्थों की कुल संख्या बहत्तर मानी जाती हैं, हालाँकि उपलब्ध ग्रन्थों की संख्या पन्द्रह ही है जिनमें भावविलास, अष्टयाम, भवानीविलास, सुन्दरी सिन्दूर, सुजान- विनोद, प्रेम तरंग, राग- रत्नाकर, कुशलविलास, देवचरित्र, देवशतक,
प्रेमचन्द्रिका, जाति-विलास, रस-विलास, काव्यरसायन, देवमाया प्रपंच और सुखसागर-तरंग आदि प्रसिद्ध कृतियाँ हैं स्वभाव से रसिक होने के कारण एक ओर जहाँ उनके काव्य में शृंगार का उच्छल प्रवाह बहता है, वहीं गहन अध्ययन-चिन्तन के कारण गम्भीर शृंगारिकता, रसिकता की तरलता तथा प्रेम की निष्ठा भी सहज ही अनुभूत है। संस्कृत और प्राकृतिक साहित्य का गम्भीर अध्ययन करने के कारण देव के चिन्तन में भावों की उदात्तता सहज ही विद्यमान है। गुण-दोष-निरूपण में देव सिद्धहस्त हैं। गुणों के लक्षणों की सुबोधता, सरलता, संक्षिप्तता तथा तदनुरूप उदाहरणों का समाहार देखते ही बनता है। सर्वाधिक उल्लेखनीय पहलू यह है कि वे अपने विचार को प्रभावपूर्ण शब्दों में सशक्त ढंग से अभिव्यक्त करते हैं।
काव्य स्वरूप निरूपण
आचार्य देव ने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'शब्द रसायन' में काव्य के स्वरूप का विस्तृत विवेचन किया है। काव्यपुरुष की विवेचना करते हुए शब्द रचना यानी छन्द को काव्य का तन, रस को जीव तथा अलंकार को शोभावर्द्धक धर्म स्वीकार किया है। अलंकार के सापेक्षिक रस का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए उन्होंने यह मत प्रकट किया है कि अलंकार के बिना तो काव्य रूपी शरीर जीवित रह सकता है, लेकिन रस यानी आत्मा के बिना वह नष्ट हो जाता है। उनकी उक्ति है-
अलंकार भूषण रस जीव छन्द तन भाख।
तन भूषण हू बिन जिये बिन जीव तन राख ॥
vपरम्परा सम्मत धारणा से अलग हटकर वे शब्द को जीव, अर्थ को मन तथा रसमय सौन्दर्य को काव्य का शरीर स्वीकार करते हैं। उनके विचार में छन्द और गति दो पैर के समान उसे संचरित व प्रवाहित करते हैं तथा अलंकार से उसमें गम्भीरता का समावेश होता है। इस सन्दर्भ में उनकी निम्नलिखित पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-
सब्द जीव तिहि अरथ मन, रसमय सुजस शरीर चलत बहै जुग छन्द गति, अलंकार गम्भीर ॥
उनकी यह धारणा भले ही परम्परा विरूद्ध प्रतीत होती है किन्तु नितान्त अशुद्ध नहीं कही जा सकती है। क्योंकि उनके दोनों विचारों में भिन्न दृष्टिकोण निहित हैं। अपने पहले विचार में जहाँ उन्होंने काव्य के आन्तरिक पक्ष को प्रकट किया गया है, वहीं दूसरे विचार में काव्य का बाह्य पक्ष उभरा है।
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