पूंजीवाद का विरोध - anti capitalism

अंग्रेजी शासन व्यवस्था के साथ जो सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था आयी, उसे पूँजीवाद कहा गया। इसमें धन का वर्चस्व होता है। पूँजीवाद का साम्राज्यवाद से गठबन्धन हो गया। लेनिन ने कहा है- "साम्राज्यवाद पूँजीवाद की ही एक विकसित अमानुषिक व्यवस्था का नाम है।" इस साम्राज्यवादी पूँजीवाद का विस्तार तलवार के बल पर होता है। पुराना मनुष्य भाव के सहारे जीता था, वह कब न मर गया। अब जो आदमी है, वह पैसे का गुलाम है। 'नीलकुसुम' में कवि लिखता है -


वह मनुष्य मर गया,


शेष जो है लक्ष्मी का नया जार है।


गीत उसे क्या जो कुबेरपद पाने का उम्मीदवार है।


कवि का विश्वास है कि सामाजिक क्रान्ति होगी और कवि को भरोसा है कि पूँजीपतियों की सम्पदा जल्द ही छीन जाएगी। 'बोधिसत्व' में कवि कहता है-


उसी तरह ये नोट तुम्हारे


पापी उड़ जाने वाले हैं, तप भी मारा गया, माल भी और लोग पाने वाले हैं।


यह आने वाले समाज की समतामूलकता की झाँकी है। कवि धन की सभ्यता का विरोध करता है-


धन पिशाच की विजय,


धर्म की पवन ज्योति अदृश्य हुई।


इसी 'बोधिसत्व' कविता में कवि सम्पदा की नैतिकता और शील का विरोध करते हुए कहता है-


शबरी के जूठे बेरों से आज राम को प्रेम नहीं, मेवा छोड़ शाक खाने का आज पुरातन नेम नहीं ।


पैसे के शील के विरोध में ही विवेकानन्द ने 'दरिद्र नारायण' की कल्पना की थी इसमें नारायण की परिभाषा है। जल में जो रहता है, वह नारायण है।

यह जल है गरीब के अश्रु । इसी में बसने से 'नारायण' नाम की सार्थकता सिद्ध होती है। पूँजीपति मनुष्य का वध करने वाले दानव हैं। 'बोधिसत्व' कविता पूँजीवाद के विरोध का भावशास्त्र है।



दिनकर उग्र विचारों के राष्ट्रीय कवि हैं। उनका मानना है कि आर्थिक विपन्नता उपनिवेशवाद और सामन्तवाद के गठबन्धन से और अधिक भयानक हुई है। दिनकर को न केवल राजनैतिक पराधीनता का एहसास हुआ, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता के लोप होने का बोध भी हुआ। उनके विरोधी मन की वास्तविक रचना स्वाधीनता संग्राम के बीच हुई। उनकी कविताओं में आवेगमयी राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना मिलती है।