काव्य की प्रयोजनीयता - application of poetry

मुक्तिबोध ने दो आधारों पर कविता की प्रयोजनीयता पर विचार किया है। एक आधार वह है जहाँ उन्होंने कविता की प्रयोजनीयता का विचार तात्कालिक सन्दर्भों से ऊपर उठते हुए व्यापक तथा गहरे स्तरों पर किया है। और दूसरा वह आधार है जहाँ इस विषय का विवेचन समाज तथा युग जीवन की वर्तमान स्थितियों के सन्दर्भ में हुआ है। पहले आधार पर कविता की प्रयोजनीयता मनुष्य की भौतिक ही नहीं, उसके आध्यात्मिक जीवन अर्थात् उसकी समग्रता को ध्यान में रखकर निर्देशित की गई प्रतीत होती है। मनुष्य केवल भौतिक दृष्टि से ही सुखी और संतुष्ट नहीं होना चाहता,

अपितु वह अपनी आध्यात्मिक और आत्मिक भूख को भी शान्त करना चाहता है और कविता एक ऐसा साधन है जो उसे इस आधार पर सुख और सन्तोष प्रदान करती है। साथ ही उसके आत्म विस्तार में सहायता प्रदान कर वह उसे मनुष्यत्व की ऊँची भूमि पर ले जाती हैं। इतना ही नहीं, वह मनुष्य और बीच संवाद कायम करते हुए अन्ततः उच्चस्तरीय आनन्द प्रदान करती है। मनुष्य के


मुक्तिबोध आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की इस मान्यता से सहमत हैं कि कविता भाव-व्यापार है। यह भाव या मन व्यक्ति का व्यक्तिबद्ध नहीं है।

व्यक्ति का भाव उसके सामाजिक सम्पर्क में आता है। मानव अकेला नहीं है, वह समाज में रहता है। उसका सम्पर्क समाज के अन्य लोगों से होता है। इस सम्पर्क के दौरान वह जगत का आभ्यन्तरीकरण करता है, जगत का यही आभ्यन्तरीकृत रूप काव्य का भाव बन जाता है। इस प्रकार जहाँ तक कविता की प्रयोजनीयता का सवाल है 'कला कला के लिए' और 'कला जीवन के लिए' जैसे परम्परागत विवाद में मुक्तिबोध 'कला जीवन के लिए पक्ष का समर्थन करते हैं। उनका यह चिन्तन हिन्दी समीक्षा की पूर्ववर्ती मान्यताओं का तिरस्कार नहीं करता। बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर प्रगतिवादी समीक्षा तक साहित्य चिन्तकों की ऐसी सुदीर्घ परम्परा रही है जिन्होंने कविता या साहित्य की प्रयोजनीयता मानवीय सुख-दुःख को प्रतिबिम्बित करने, सामाजिक हित के साथ जुड़े रहने और लोक की आकांक्षाओं को उसकी वाणी देने में स्वीकार की है।