आलोचना का क्षेत्र - area of criticism
जब हम किसी कविता, कहानी, उपन्यास आदि साहित्यिक रचना का अध्ययन करें और कोई हमसे पूछे कि वह रचना हमें कैसी लगी, तो हम इस प्रश्न का कोई न कोई उत्तर अवश्य देते हैं। हमारा उत्तर जो भी हो, हम एक तरह से साहित्यिक आलोचना की परिधि पर खड़े होते हैं। यदि हमसे अपने उत्तर का कारण पूछा जाए और हम किसी न किसी तर्क से उत्तर का कारण बताते हैं तब हम साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे होते हैं। अन्य शब्दों में, पढ़ी गई किसी रचना के बारे में अपनी समझ की व्याख्या या स्पष्टीकरण ही साहित्यिक आलोचना है,
भले ही वह बहुत व्यवस्थित या तार्किक न हो। यह साहित्यिक आलोचना का आरम्भिक और अपरिपक्व रूप है जो रचना के प्रति हमारी पहली प्रतिक्रिया के रूप में अभिव्यक्त होता है। यदि यह अधिक व्यवस्थित, अधिक सुसंगत और परिष्कृत हो तथा ज्ञान के अन्य अनुशासनों से किसी न किसी रूप में अपनी सम्बद्धता दर्शाता हो तो यही आलोचना 'साहित्यिक आलोचना' बन जाती है। साहित्यिक आलोचना को सामाजिक रूप से उपयोगी व्यवहार की तरह भी देखा जाता है जिसमें विशेषज्ञों द्वारा उच्चतम मानदण्डों के आधार पर साहित्यिक रचनाशीलता की गुणवत्ता बनाए रखने का कार्य किया जाता है।
साहित्यिक आलोचना मूल रूप में साहित्यिक रचनाओं और साहित्यिक विषयों के बारे में तर्कसंगत विवेचन है। इस पद का प्रयोग साहित्य सम्बन्धी किसी भी विचारविमर्श के लिए किया जा सकता है, आवश्यक नहीं कि किसी विशेष रचना का ही विवेचन हो। अधिक संकुचित अर्थ में यह पद कृति की व्याख्या और उसके साहित्यिक स्तर का निर्णय करने वाली 'व्यावहारिक आलोचना' को दर्शाता है। इस दृष्टि से आलोचना को सौन्दर्यशास्त्र से अलग माना जाता है, साथ ही विवेचन के दौरान विचार के लिए आने वाले अन्य विषयों, जैसे ऐतिहासिक ज्ञान,
साहित्य-सृजन के स्रोत और प्रेरणा तथा विश्लेषण की विधियों आदि, से भी इसे अलग किया जाता है। आलोचना को 'पाण्डित्य' या 'विद्वता' से भी अलग माना जाता है। लेकिन गहराई से विचार करने पर हम पाते हैं कि ये सभी भेद कृत्रिम हैं।
व्यावहारिक स्तर पर कृति विशेष को केन्द्र में रखकर किया जाने वाला विवेचन भी बाह्य ज्ञान के बिना सम्भव नहीं होता है। अनेक महत्त्वपूर्ण आलोचनाओं में रचना का विश्लेषण और साहित्य के स्वरूप तथा उसके मूल्यांकन के सिद्धान्तों की चर्चा साथ-साथ होती है। साहित्य-विमर्श और समझ के सभी चरण आलोचना के अन्तर्गत आते हैं। इतना ज़रूर है कि आलोचना में मुख्य ध्यान साहित्यिक रचनाओं के मूल्यांकन पर होता है और इसमें साहित्य-संसार में रचनाकारों के योगदान की परख भी होती है।
साहित्यिक आलोचना मूलरूप से दो मुख्य मान्यताओं पर आधारित होती है। एक तो यह कि साहित्य एक पहचानने योग्य वस्तु है जिसे न केवल गैर साहित्यिक वस्तुओं से अलग किया जा सकता है बल्कि उसे निम्नस्तरीय साहित्य से भी अलग करके पहचाना जा सकता है। और दूसरे, यह कि साहित्यिक मूल्यों को इस तरह परिभाषित किया जाए कि उनके आधार पर सभी आलोचक अच्छे और ख़राब साहित्य का भेद आसानी से कर सकें । इसीलिए आलोचना की प्रत्येक प्रभावशाली धारा अपने अलग प्रतिमान प्रस्तुत करती है और उन पर साहित्यिक कृतियों की परख करती है। जाहिर है कि उनके प्रतिमानों पर खरा उतरने वाला साहित्य ही श्रेष्ठ साहित्य माना जाता है और उस साहित्य की विशेषताएँ आदर्श रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। यही कारण हैं कि आलोचना के नये-नये रूपों के साथ साहित्यिक रचनाओं का महत्त्व कम या ज्यादा हो जाता है। कुछ ही रचनाएँ ऐसी होती हैं जो विभिन्न आलोचना पद्धतियों में अपनी श्रेष्ठता बनाए रखती हैं।
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