कला नियमों की स्वायत्तता - autonomy of art rules

मुक्तिबोध ने आलोचक के दायित्व को आपद्धर्म न मानकर धर्म के रूप में व्याख्यायित किया है। एक अत्यन्त सजग आत्मचेता साहित्यकार की तरह वे कला नियमों की स्वायतत्ता का विवेचन करते हैं। काव्य के मूल्यांकन के सन्दर्भ में उन्होंने जिस बात पर सर्वाधिक बल दिया है, वह है- 'कविता की सामाजिक सन्दर्भता' । लेकिन सामाजिक दृष्टि से कला अथवा काव्य का मूल्यांकन करते समय ऐसा नहीं होना चाहिए कि कला अथवा कविता की अपनी अन्तः प्रकृति की उपेक्षा हो जाय और केवल सामाजिक प्रतिमान ही सर्वस्व बनकर रह जाय । इसलिए मुक्तिबोध बार-बार इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करते हैं कि कविता या कला का मूल्यांकन करते समय उसकी अन्तः प्रकृति को समझना और उसे ध्यान में रखना आवश्यक है।

प्रो० नामवर सिंह ने भी स्वीकार किया है कि "साहित्य के इतिहास में भौतिकवाद का प्रयोग करते समय, ऐतिहासिक भौतिकवाद की पहली चेतावनी यह है कि विज्ञान, दर्शन, संगीत, चित्रकला आदि की भाँति साहित्य अथवा कला के भी अपने नियम हैं, इसलिए उन नियमों की जानकारी पहले होनी चाहिए।" प्रो. नामवर सिंह के उक्त कथन का वैशिष्ट्य यह है कि उन्होंने जहाँ समाज की चर्चा की है और कविता की जड़ों का उसमें होना स्वीकार किया है, इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि कविता के कुछ अपने स्वायत्त नियम भी होते हैं और जिनकी जानकारी भी समीक्षक को होनी चाहिए बिना इस जानकारी के इन नियमों को कविता के मूल्यांकन का आधार बना मात्र सामाजिक प्रतिमानों को लागू करना एक प्रकार की एकांगिता होगी। मुक्तिबोध भी इस प्रकार की एकांगिता का विरोध करते हैं।

ऐसे समीक्षक जो केवल साहित्य या कविता के सौन्दर्यात्मक मनोवैज्ञानिक पक्ष को ही महत्त्व देते हैं, उसके सामाजिक और समाजशास्त्रीय पक्ष को निरर्थक मानते हैं, मुक्तिबोध की दृष्टि में वे सम्पूर्ण मानव सत्ता के अपराधी हैं। उनका कहना है कि "जो लोग साहित्य के केवल सौन्दर्यात्मक मनोवैज्ञानिक पक्ष को परम मानकर चलते हैं, वे समूची मानव सत्ता के प्रति दिलचस्पी न रख सकने के अपराधी तो हैं ही, साहित्य के मूलभूत तत्त्व, उनके मानवीय अभिप्राय तथा मानव विकास में उनके ऐतिहासिक योगदान अर्थात् दूसरे शब्दों में साहित्य का स्वरूप विश्लेषण तथा मूल्यांकन न कर पाने के भी अपराधी हैं।"


मुक्तिबोध ऐसे लोगों की भी आलोचना करते हैं जो साहित्य के ऐतिहासिक अथवा समाजशास्त्रीय विवेचन में ही आलोचना की सार्थकता महसूस करते हैं और उसके सौन्दर्यात्मक मनोवैज्ञानिक पक्ष की अवहेलना करते हैं। इस विषय में उनका कथन है- "साहित्य का अध्ययन एक प्रकार से मानव सत्ता का अध्ययन है, अतएव जो केवल ऊपरी तौर पर साहित्य का ऐतिहासिक विहंगावलोकन अथवा समाजशास्त्रीय निरीक्षण कर चुकने में ही अपनी इति कर्त्तव्यता समझते हैं,

वे भी एकपक्षीय अतिरेक करते हैं।" वस्तुतः कला अथवा साहित्य की स्वायत्तता के निहितार्थ आवश्यकता तो इस बात की है कि आलोचना में ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय तथा मनोवैज्ञानिक सौन्दर्यात्मक विवेचन की सम्पूर्ण एकात्मकता बनी रहे। इस प्रकार मुक्तिबोध ने अपनी समीक्षा में कविता या कला की अन्तः प्रकृति अथवा उनके स्वायत्त तन्त्र की विशद् विवेचना प्रस्तुत की है और जोर देकर इस बात को कहा है कि कविता या कला रचना के जो विशिष्ट नियम हैं, उनके प्रति उपेक्षा कदापि नहीं होनी चाहिए। लेकिन साथ ही वे यह भी कहना नहीं भूलते कि कविता या कला की स्वायत्त तन्त्र व बुनावट जीवन सापेक्ष होना जरूरी है न कि जीवन निरपेक्ष ।