द्विवेदीयुगीन आलोचना की पृष्ठभूमि - Background of Dwivedi era criticism
भारतेन्दु-युग की सामाजिक-राजनैतिक चेतना और साहित्यिक चिन्तन का प्रवाह सन् 1900 ई. तक माना जाता है । 1885 ई. में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की मृत्यु के बाद भी साहित्य और आलोचना में पुनर्जागरणकालीन प्रवृत्तियाँ प्रकट हो रही थीं। 1900 ई. के आस-पास देश के सामाजिक-राजनैतिक परिवेश में परिवर्तन के संकेत मिलने लगे थे, राष्ट्रीयता की चेतना और स्वराज्य प्राप्ति की भावना जन-जीवन में व्याप्त हो रही थी। सन् 1900 ई. में 'सरस्वती' पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। साहित्य जगत् में 'सरस्वती' पत्रिका नवीन साहित्यिक प्रवृत्तियों की वाहक बन कर आई ।
अतः 'सरस्वती' के प्रकाशन वर्ष को भारतेन्दु-युग की समाप्ति का सूचक माना जा सकता है । सन् 1903 ई. में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादक नियुक्त हुए। उन्होंने इसमें प्रकाशित विभिन्न विधाओं की रचनाओं को भाषा और व्याकरण की दृष्टि से सम्पादित और नियमित किया । इसके माध्यम से कई कवि और लेखक प्रकाश में आए। हिन्दी के पाठकों को भारतीय साहित्य और संस्कृति के साथ-साथ विदेशी साहित्य का परिचय इसी पत्रिका ने करवाया।
सन् 1920 में द्विवेदी जी ने 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादक का पद छोड़ दिया। इस पूरे दौर में आचार्य द्विवेदी हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास का नेतृत्व करते रहे ।
भारतेन्दु-युग में सन् 1893 में हिन्दी भाषा के विकास के लिए 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' की स्थापना हो चुकी थी। द्विवेदी युग में सभा ने प्राचीन साहित्य के अनुसंधान के साथ-साथ हिन्दी भाषा का व्याकरण तैयार करने, हिन्दी शब्द-कोश का निर्माण करने तथा हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन को प्रेरित करने जैसे कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए। सभा ने सन् 1896 में अपनी 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का प्रकाशन आरम्भ किया, जिसके प्रथम सम्पादक वेणीप्रसाद थे। इस पत्रिका में नये-पुराने साहित्य पर विचार-विमर्श के साथ-साथ सभा की सूचनाएँ प्रकाशित होती थीं।
हिन्दी आलोचना के विकास में 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' और 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है। आगे चलकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे आलोचकों ने 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' की गतिविधियों के अन्तर्गत ही अपने साहित्येतिहास और आलोचना सम्बन्धी ग्रन्थों का लेखन-प्रकाशन किया। सन् 1902 में जयपुर से चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' ने 'समालोचक' नाम से आलोचना के एक पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया। कम अवधि तक प्रकाशित होकर भी इस पत्र ने हिन्दी आलोचना के स्तर को ऊंचा उठाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। साहित्य जगत् के इसी परिदृश्य में द्विवेदी युग का आरम्भ हुआ।
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