प्रयोगवाद की पृष्ठभूमि - background of experimentalism

चक्रव्यूह में फँसे अर्जुन की-सी स्थिति में जीने के लिए विवश मानव की व्यथा-कथा को साहित्यिक तीव्रता के साथ अनुभव करने लगे। स्थितियों में जकड़ा मनुष्य जीवन से हार चुका था किन्तु इस वास्तविकता को उसका अहं स्वीकार नहीं पा रहा था। अपने अस्तित्व को पा लेने की जद्द ओ जहद में फँसा मनुष्य मुक्ति की साँस लेने के लिए व्याकुल था किन्तु मुक्ति की मिथ्या संकल्पना में उसे मात्र प्रयोगजगत् ही एकमात्र सहारा था जहाँ मुक्ति की साँस ली जा सकती थी। अतः संकटग्रस्त मानव ने यथार्थ से मुख मोड़कर प्रयोगों का संसार अपना लिया।


भारत में भी नेहरू युग के आरम्भ के पश्चात् घटित देश-विभाजन, गाँधी हत्या जैसी घटनाएँ कवियों को विचलित कर रही थीं।

पश्चिम में पनपे अस्तित्ववाद, अन्तश्चेतनावाद, प्रतीकवाद, अतियथार्थवाद ने कवियों के विचलित मानस पर गहरा प्रभाव डाला। भारत में प्रयोगवाद के लिए अनुकूल भूमि तैयार होने लगी। एक बात तो निश्चित है कि जिस प्रकार प्रगतिवाद की पृष्ठभूमि मार्क्सवाद ने तैयार की, उसी प्रकार प्रयोगवाद की पृष्ठभूमि विविध पश्चिमी वादों ने तैयार की। निःसन्देह दो-दो विश्वयुद्धों ने मनुष्य में विचित्र सी उदासी और भय भर दिया था। युद्धों की विभिषिका का आतंक मनुष्य भूल नहीं पा रहा था। अस्तित्ववादी मनुष्य के जीवन को अवश, निरुपाय मानता है।

प्रयोगवाद द्वारा स्वीकृत लघुमानव की संकल्पना के मूल में मनुष्य की यह अवश तथा निरुपाय स्थिति अवश्य ही कार्यरत रही होगी । सार्त्र ने अपनी एक कहानी 'इंटीमेसी' में लिखा है- "बाद तुम्हें बहा ले जाती हैं। यही जीवन है। हम न समझते हैं, न निर्णय दे सकते हैं। केवल बह सकते हैं।"


सार्त्र का लेखन मनुष्य की दुर्बलताओं और विकृतियों का इतना तीव्र चित्रण करता है कि फ्रांसिसी समीक्षकों ने उनके साहित्य को 'कब्रिस्तान का साहित्य' कहा।

इसी बोझिल मानसिकता की विचारधारा से प्रयोगवाद अनुप्रेरित है । प्रयोगवाद किन-किन तत्त्वों से प्रेरित है, इसकी चर्चा करते समय जब-जब यूँ बोझिल मानसिक उद्वेलन में धकेलकर उदासी को अधोरेखित करते हुए उदाहरण सामने आते हैं, तब-तब प्रगतिवादी काव्य-दृष्टि और प्रयोगवादी काव्य-दृष्टि का अन्तर स्पष्ट होने लगता है।


एक ओर बाढ़ की-सी जीवनधारा में बहते जाने की मनुष्य की नियति की विवशता और दूसरी ओर इसकी पृष्ठभूमि में 'मनुष्य ही सर्वेसर्वा है,

मनुष्य से परे कोई शक्ति नहीं' कहकर मनुष्य की असीम शक्ति में विश्वास करने वाली प्रगतिवादी काव्य-दृष्टि को देखकर दोनों में स्थित अन्तर का अनुमान लगाना सहज सम्भव है। प्रगतिवाद ने जिन कई सारे कारणों के चलते ईश्वर, धर्म, भाग्य जैसी बातों को नकारा, उनमें से एक कारण यह भी रहा कि ईश्वर, धर्मादि बातें मनुष्य को अन्याश्रित बनाती हैं, कमजोर बनाती हैं। मनुष्य को कमजोर बनाने वाले हर तत्त्व का प्रगतिवादियों ने घोर विरोध किया और पश्चात् उभरे प्रयोगवाद ने मनुष्य की नियति और दुर्बलता से अपने लिए अन्न-जल पाया। अपनी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकों तथा इससे सम्बन्धित विविध शैलियों का आधार लेने वाले प्रतीकवाद ने प्रयोगवादी कवियों पर चिरप्रभाव छोड़ा।

बोदलेयर द्वारा प्रणीत प्रतीकवाद मानता है कि भिन्न-भिन्न अनुभूतियों को रूपायित करने के लिए नयी-नयी शैलियों का आलम्बन लेना पड़ता है । प्रतीकवाद के महत्त्वपूर्ण कवि मलार्मे ने यह भी कहा कि अनुभूत विषय बहुत बार अकथनीय एवं त्वरित होने के कारण उनकी यथावत अभिव्यक्ति सम्भव नहीं हो पाती। अतः उन्हें संकेतपूर्ण पद्धत्ति से ही अभिव्यक्त करना पड़ता है अर्थात् यह अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति नहीं बल्कि व्यंजना के निकट की चीज है। प्रतीकवादियों के लिए सूक्ष्मतिसूक्ष्म संवेदनाएँ, रहस्यपूर्ण संकेत ध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ ही काव्य के उपादान बने । यही सारे संकेत, व्यं जनाएँ, जटिलता, अस्पष्टता जैसे तत्त्व प्रयोगवादियों ने अपनाए ।


फ्रायड, एडलर और युग के अन्तश्चेतनावाद को भी प्रयोगवादियों ने बहुत हद तक स्वीकार किया। जीवन की कुण्ठाएँ, दमित वासनाएँ, विशृंखलित मनोदशा और नग्न यौन इच्छाओं की अभिव्यक्ति उनके वर्ण्य विषयों में शामिल हो गई।


बिम्बवाद, अतियथार्थवाद कुछ ऐसे ही पश्चिमी वाद हैं जिन्होंने प्रयोगवादियों को अत्यधिक प्रभावित किया। प्रयोगवादी इन पश्चिमी विचारों को स्वीकारने के लिए आकुल और अनुकूल थे।

भारतीय जनों को अपनी संत्रास का निवारण इन वादों में प्राप्त हुआ था । प्रयोगवादी काव्य-दृष्टि पश्चिम के विचारों से अत्यधिक मात्रा में प्रभावित रही। अस्तित्ववाद के अन्तर्गत जिस बेचैनी का उल्लेख है वह बेचैनी प्रयोगवादियों को आत्मपरिचित- सी लगी । मुक्तिबोध अपने भीतर की जिस गुप्त अशान्ति की बात करते हैं, उसकी अभिव्यक्ति लगभग हर प्रयोगवादी कवि ने की। जीवन की जटिलताओं ने उलझी हुई संवेदनाओं को जन्म दिया जिनकी अभिव्यक्ति प्रयोगवादियों ने बढ़-चढ़कर की। प्रचलित भाषा को अपर्याप्त जानकर अपनी भाषा के निर्माण पर बल दिया पश्चिमी वादों का हुबहू अवतरण प्रयोगवाद में देख सकते हैं ।