हिन्दी आलोचना की पृष्ठभूमि - Background of Hindi criticism

आधुनिक हिन्दी आलोचना के उद्भव से पूर्व हिन्दी में संस्कृत के काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों की परम्परा में हिन्दी के काव्यशास्त्र की रचना के प्रयास हो चुके थे। रीतिकालीन लक्षण-ग्रन्थों की रचना संस्कृत काव्यशास्त्र के नियमों के अनुसार हुई है। केशवदास, चिन्तामणि, मतिराम, भिखारीदास, कुलपति मिश्र आदि आचार्य-कवियों ने अनेक लक्षण-ग्रन्थों की रचना की। इनमें रस, छन्द, अलंकार, रीति और नायिका भेद सम्बन्धी सिद्धान्तों को उदाहरण देकर प्रस्तुत किया गया। वस्तुतः रीतिकाल के आचार्य लक्षणकार थे जो संस्कृत की परम्परा में काव्यशास्त्रीय विवेचन करते हुए उदाहरण देने के लिए कविता करते थे।

सिद्धान्त और काव्य के मिले हुए स्वरूप में रीतिकालीन साहित्यशास्त्रीय विवेचन में न तो कविता की गम्भीर समीक्षा हो पाई और न ही नये काव्य-सिद्धान्तों का प्रतिपादन । रीतिकाल में संस्कृत की सूत्र -शैली रूपी गुण-दोष व्यक्त करने वाली व्याहारिक आलोचना ही मिलती है। जैसे, बिहारी के दोहों के सम्बन्ध में कहा गया कि -


सतसइया के दोहरे ज्यों नाविक के तीर । देखन में छोटे लगें, घाव करे गम्भीर ॥


इस प्रकार की उक्तियों में सूक्ष्म विश्लेषण और गम्भीर मूल्यांकन का अभाव है। अतः रीतिकालीन काव्यशास्त्रीय विवेचन को समालोचना या आलोचना नहीं कहा जा सकता। हिन्दी आलोचना का उद्भव भारतेन्दु-युग की घटना है।