साठोत्तरी हिन्दी कविता की पृष्ठभूमि - background of sixty hindi poem
हिन्दी कविता में उपर्युक्त स्थितियों का वर्णन करने के लिए कवियों ने स्वयं को बाध्य पाया । इन परिस्थितियों के कारण संत्रस्त हो चुके कवियों ने अपनी भावनाओं को लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त किया । साठोत्तरी कविता में ये भावनाएँ अत्यधिक बलवती होकर उभर आयीं। इस समय तक आते-आते कवियों के मन से अनुकूल बदलाव की आस क्षीण हो गई थी और आस का स्थान आक्रोश ने ले लिया था। व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए मार्क्सवादी जनवाद और अस्तित्ववादी व्यक्तिवाद अत्यन्त सक्रिय रहे। अपने बाह्यावरण में परस्पर विरोधी प्रतीत होने वालीं ये विचारधाराएँ पूँजीवादी शोषणमूलक व्यवस्था के विरोध में समान रूप से मुखर हुई।
प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नयी कविता जैसी पूर्ववर्ती कविता की विचारभूमि मार्क्सवादी और अस्तित्ववाद ही रही। इनसे उपजी सामाजिकता एवं व्यक्तिवादिता की अभिव्यक्ति कविता में की गई थी। विशेषतः नयी कविता ने अत्यन्त संतुलित पद्धत्ति से देश में व्याप्त अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, शोषण, विषमता, मूल्यहीनता आदि विद्रूपताओं पर कड़े प्रहार किए थे। ऐसी स्थिति में साठोत्तरी कविता के निर्माण के कारणों की पड़ताल आवश्यक लगती है। पूर्ववर्ती कविता की सक्षमता को अपर्याप्त जानकर ही कवियों ने नये नामकरण और नये दृष्टिकोण को अपनाते हुए साठोत्तरी कविता को जन्म दिया। बल्कि यूँ कहिए कि प्रत्येक समय की सक्षम कविता अपनी पूर्ववर्ती कविता की अपर्याप्तता को भापकर, उसमें निहित कमियों की पूर्ति के लिए कटिबद्ध होकर ही अवतरित होती है।
नयी कविता निःसन्देह अपनी शक्तिभर सामाजिक कुरूपताओं पर व्यंग्य, कटाक्ष, प्रहार कर रही थी लेकिन इस बात को कदापि भूलना नहीं चाहिए कि नयी कविता में अस्तित्ववादी व्यक्तिवाद अत्यन्त प्रबल रूप में कार्यरत था । अस्तित्वाद की विविध भंगिमाएँ खालीपन, हतबलता, असमर्थता, मृत्युबोध नयी कविता पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हावी हैं। साठोत्तरी कवियों (और जनसामान्य) की यही मानसिकता थी कि इस असहायता, रिक्तता, मृत्युबोध जैसी हताशाजनक बातों की अपेक्षा अब आक्रामकता को अपनाया जाए। मात्र व्यंग्य- कटाक्ष करने की अपेक्षा खड़ी व स्पष्ट भाषा तथा भाव के साथ अब सक्रिय एवं संघर्षात्मक तेवर अपनाये जाएँ।
इस प्रकार के संघर्षात्मक तेवर अपनाना अस्तित्ववादी व्यक्तिवाद के लिए सम्भव नहीं था क्योंकि वह उसकी मूल प्रकृति के अनुरूप नहीं। इसके लिए जिस जनवादी समझ से लैस होना आवश्यक था, वह समझ साठोत्तरी कवियों के पास थी। पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध आवाज बुलंद करना, पूँजीवादी व्यवस्था के प्रत्येक षड्यन्त्र को बेनकाब करना और सामाजिक व्यवस्था में सुधार नहीं बल्कि आमूलचूल परिवर्तन करना साठोत्तरी कविता का लक्ष्य था । इसी लक्ष्य से प्रेरित होकर शोषण विरोधी संवेदनाओं को अलग-अलग तेवरों के साथ अभिव्यक्त किया गया । सामाजिक-राजनैतिक विसंगतियाँ, कुर्सीवाद, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार जितना बढ़ने लगा उतना ही क्रोध और आक्रोश साठोत्तरी कवियों के मन में फूटने लगा। क्रोधातिशयता ने विद्रोह को जन्म दिया और विद्रोह की ओर उन्मुख साठोत्तरी कवि-पीढ़ी ने अस्वीकृति, व्यंग्य,
सपाटबयानी, क्रोध में लिपटी भाषा, सेक्स सम्बन्धी शब्दादि का प्रयोगातिरेक जैसी विशेषताओं को अपनाकर अपने भावों को अभिव्यक्त करना आरम्भ किया।
साठोत्तर समय विविध काव्यान्दोलनों का समय रहा है। डॉ. जगदीश गुप्त ने अपने व्यंग्यात्मक लेख 'किसिम-किसिम की कविता' में चालीस से अधिक आन्दोलनों का उल्लेख किया है। आन्दोलनों की एक बाढ़- सी इस समय में आयी । वस्तुतः इस कालखण्ड में कई युवा कवि काव्य के क्षेत्र में दाखिल हुए। इस समय अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। अधिकांश काव्यान्दोलन इन्हीं युवा कवियों और पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा छेड़े गए।
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