रस निरूपण का आधार - Basis of juice formulation
रस की सार्थकता एवं महत्ता को निरूपित करते हुए केशवदास 'रसिकप्रिया' में लिखते हैं-
मिल विभाव अनुभाव पुनि, संचारी सु अनूपा व्यंग करे थिर भाव जो, सोई रसु सुख रूप ॥
उनका उपर्युक्त विचार अभिनवगुप्त के विचारों से अभिप्रेरित प्रतीत होता है। रस के प्रति उनका सबल आग्रह व समादार भाव की अभिव्यक्ति निम्नलिखित पंक्तियों में सहज ही अनुभूत है- --
ज्यों बिन डीठ न शोभिये, लोचन लोल विशाल ।
त्यों ही केशव सकल कवि, बिन वाणी न रसाल ॥
केशवदास राधा-कृष्णपरक उदाहरणों की सहायता से शृंगार रस का प्रतिपादन करते हुए रस का निरूपण करते हैं। उन्होंने 'रसिकप्रिया' में लिखा है-
नवरस को भाव बहु, तिनके भिन्न विचार ।
सबको केशवदास हरि, नाइक है शृंगार ॥
आगे वे यह भी कहते हैं कि -
कहि केशव से बहु रसिक जन, नव रस में ब्रजराज नित।
'रसिकप्रिया' के कुल सोलह प्रकाशों में से चौदह प्रकाश शृंगार रस को ही समर्पित हैं। शृंगार रस के दो प्रमुख भेदों संयोग और वियोग का निरूपण करते हुए वे 'रसिकप्रिया' में वियोग के पूर्वानुराग, मान, करुण तथा प्रवास नामक भेदों में से प्रथम दो भेदों का सम्यक् तथा शेष दो का साधारण विवेचन प्रस्तुत करते हैं। शृंगार रस के प्रधान विषय नायक-नायिका भेद का भी 'रसिकप्रिया' के पूरे आठ प्रकाशों में वर्णन है। 'रसिकप्रिया' के चौदहवें प्रकाश में हास्य, करुण आदि शेष आठ रसों का विवेचन भी मिलता है। शृंगार रस के विवेचन में उन्होंने सर्वत्र राधा-कृष्ण को नायक-नायिका के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका मानना है कि सखी समाज की सार्थकता इसी में है कि वे राधा-कृष्ण की प्रेम सम्बन्धी बाधाओं का उन्मूलन करें-
राधा हरि बाधा हरण वर्णो सखी समाज ।
शृंगार रस विवेचन में वे आलम्बन के तौर पर राधा-कृष्ण को प्रस्तुत करते हैं। राधा-कृष्ण पर अधिक बल देने के लिए रसिक समाज से वे खुले मन से क्षमा याचना करने में भी तनिक संकोच नहीं करते हैं -
राधा राधा रमण के कहे यथाविधि हाव । ढिठाई केशवदास की क्षमियो कवि कविराय ॥
अभिव्यंजना की दृष्टि से रस निरूपण में कवि आचार्य केशवदास अपनी पुरानी परिपाटी के आग्रही प्रतीत होते हैं। काव्यशास्त्रियों की नजर में उनका रचनात्मक अवदान भले ही शिथिल रहा हो लेकिन इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि आचार्य केशवदास का आविर्भाव नहीं हुआ होता तो रीतिकालीन कवि अपने शिल्प-विधान को मूल्यवान् नहीं बना पाते।
नायक-नायिका भेद
नायक-नायिका भेद का प्रसंग शृंगार रस का आरम्भ से ही प्रधान विषय रहा है। स्त्री और पुरुष के पारस्परिक रति सम्बन्ध पर ही नायक-नायिका भेदों का विशाल भवन अवस्थित होता है। केशवदास के मतानुसार नायक के आठ गुण होते हैं। उन्होंने नायक के चार भेद अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्ट स्वीकार किए हैं। - 'रसिकप्रिया' में उन्होंने नायिका भेद का विस्तार से वर्णन किया है। नायिका-भेद के चार आधारों के वर्णन में उन्होंने जाति, कर्म, अवस्था व प्रकृति का प्रभावपूर्ण उल्लेख किया है। शृंगार निरूपण एवं उनके सूक्ष्म विवेचन के लिए नायिकाभेद आवश्यक था, इसलिए उन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्रियों की रीति पद्धति के अनुरूप ही नायिका के भेदों व उपभेदों का सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया है।
छन्द निरूपण
आचार्य केशवदास छन्दों के विशिष्ट ज्ञाता स्वीकार किए जाते हैं। 'छन्दमाला' में उन्होंने मात्रिक और वर्णिक दोनों ही प्रकार के छन्दों का विवेचन प्रस्तुत किया है। 'छन्दमाला' में उन्होंने कतिपय नवीन छन्दों का निर्माण भी किया है । छन्द-विवेचन में उनके द्वारा में कई नयी तकनीकी व प्रयोगवत परीक्षण भी किए गए हैं। 'रामचन्द्रिका' इसका सशक्त उदाहरण है।
दोष-निरूपण
भारतीय काव्यशास्त्र ने 'दोष' को हेय कहा गया है। अनौचित्य को काव्यशास्त्रीय परम्परा में दोष का । प्रमुख आधार माना गया है,
इसलिए काव्य के लक्षणार्थ 'दोष राहित्य' को अनिवार्य माना गया है। केशवदास ने भी पूर्ववर्ती काव्यशास्त्रीय परम्परा का अनुपालन करते हुए 'कविप्रिया' में अठारह दोष का तथा 'रसिकप्रिया' में पाँच दोषों का उल्लेख किया है।
'कविप्रिया' में निरूपित प्रथम पाँच दोष अन्ध, बधिर, पंगु, नग्न और मृतक आचार्य केशवदास की - काल्पनिक उपज प्रतीत होते हैं। उनके मतानुसार परम्परागत कवि समय से विरुद्धता का नाम 'अन्ध' है । आपततः विरोध उत्पादक शब्दों को उन्होंने 'बधिर' कहा है। छन्दशास्त्र से विपरीत रचना 'पंशु' जबकि अलंकार रहित रचना 'नम्न' है। निरर्थक रचना को केशवदास 'मृतक' मानते हैं। दोषों की गणना से पूर्व उनका यह कथन उल्लेखनीय है -
राजतरंच न दोष युक्त कविता वनिता मित्र ।
कहना गलत न होगा कि उन्होंने कविता वनिता के रूपक निर्वाह के लिए ही 'अन्ध' आदि दोषों का नामकरण किया है। हालाँकि, उनका यह दोष-निरूपण कोई नवीन मौलिक उद्भावना नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर 'अन्ध' मम्मट सम्मत 'प्रसिद्धि-विरूद्ध' माना जा सकता है। 'बधिर' के उदाहरण में जहाँ एक ओर मम्मट सम्मत 'असमर्थ' दोष की छाया की प्रतीति है, वहीं दूसरी ओर 'पंगु' दोष परम्परागत 'हतवृत्तता' है। 'नग्न' दोष भामह आदि अलंकारवादी आचार्यों द्वारा स्वीकृत है। हालाँकि, 'अनलंकृती पुनः क्वापि मानने वाले आचार्य इससे सहमत नहीं हैं। वैसे काव्य समीक्षकों का एक वर्ग यह भी मानने में कतई संकोच नहीं करता कि 'मृतक' दोष की सत्ता ही काव्य में सम्भव नहीं है।
'कविप्रिया' में वर्णित अन्य तेरह दोषों में अधिकांश दोष निरूपण करते हुए कवि आचार्य केशवदास ने 'दण्डी के 'काव्यादर्श' को आधार-ग्रन्थ के रूप में अपनाया है। 'रसिकप्रिया' में उन्होंने पाँच रस-विरोधी दोषों (प्रत्यनीक, नीरस, विरस, दुःसन्धान और पात्रादुष्ट) का विवेचन प्रस्तुत किया है। उदाहरण के तौर पर परस्पर विरोधी रसों के सन्निवेश को उन्होंने 'प्रत्यनीक' दोष माना है। वैसे आचार्य मम्मट 'प्रत्यनीक' दोष को 'प्रतिकूलविभावादिग्रह' की संज्ञा प्रदान करते हैं। 'विरस' भी उक्त दोष का ही एक प्रभाग माना जा सकता है। 'नीरस' और 'दुःसन्धान' नामक दोष मम्मट की दृष्टि में 'रसाभास' प्रतीत होते हैं, जबकि 'पात्रादृष्ट' को मम्मट- सम्मत 'अपुष्टार्थता' से सम्बन्धित किया जा सकता है।
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