बीट कविता : तात्पर्य एवं स्वरूप - Beat Poetry: Meaning and Form
एलेन गिन्सबर्ग का भारत में आगमन हुआ और देखते ही देखते भारत के साहित्यकारों, विचारकों को उसने असाधारण रूप से प्रभावित किया। गिन्सबर्ग ने लिखा है- "कलकत्ता के कुछ उत्साही युवा कवियों ने मुझसे प्रेरणा पाकर एक गुट बनाया है 'भूखी पीढ़ी' ।" हिन्दी में 'बीट' पीढ़ी का सर्वप्रथम उल्लेख निरन्तर अमेरिका आते-जाते प्रभाकर माचवे ने किया। अर्थात् इस बात को लेकर भी काफी मत-मतान्तर देखे जा सकते हैं। सन् 1962 में भारत आये गिन्सबर्ग को एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण उन्नति कर चुके अमेरिका से आये गिन्सबर्ग दो-दो विश्वयुद्धों की त्रासदी सह चुके लोगों की मानसिकता से न केवल परिचित थे बल्कि भुक्तभोगी भी थे। विज्ञान की तरक्की,
उसका मानव पर पड़ा असर और इस व्याकुल मानसिकता से त्रस्त भारत आये बेचैन लोगों और उनके विचारों को लेकर कैलाश बाजपेयी ने कहा है "लगता है जैसे दुनियाभर में वर्तमान का लतमर्दन किया जा रहा है। कला, राजनीति, चिन्तन सब पर एक विचित्र प्रकार की ऐठन फैल रही है। सब अवाक् होकर एक द्विमुखी नाटक देख रहे हैं। एक ओर हैं लाल रक्षक - भयंकर क्रूर और हर प्रकार की मानवीय संवेदना एवं प्रतिक्रिया से कटे पूर्ण निरंकुश, सपाट और उद्धत । दूसरी ओर हिप्पी, विभक्त, मनस्क और उल्थे सन्दर्भ में गाँधी और बुद्ध को पुकारते, अन्तर्मुखी यात्रा के बहाने 'मारिजुआना' और एल. एस. डी. के स्फार में यौन स्वच्छन्दता का आनन्द लेते।
जिनकी सांस्कृतिक गतिविधियों से चौकन्ना होकर राज्य को दो हजार से अधिक मनोचिकित्साग्रह खोलने पड़े हैं...."12 वाजपेयीजी जिसका संकेत देते हैं उस हिप्पी संस्कृति ने भारत में मुंबई दिल्ली, गोवा, बनारस, कलकत्ता जैसे स्थानों पर अपना डेरा जमा लिया। इन हिप्पियों की सोच का सम्पूर्ण परिपाक 'बीट' संकल्पना में देखा जा सकता है। बांग्ला के माध्यम से हिन्दी कविता में इस प्रवृत्ति ने दस्तक दी। राजकमल चौधरी, मलय राय चौधरी, सुविमल वसाक, सुभाष घोष, समीर चौधरी आदि रचनाकारों ने बीट प्रवृत्ति का स्वीकार किया। राजकमल चौधरी, प्रभाकर माचवे, रमेश बक्षी जैसे हिन्दी रचनाकारों ने 'कृति', 'अभिव्यक्ति' शीर्षक पत्रिकाओं के माध्यम से इसे हिन्दी में पहुँचाया। ये कवि नग्नता और यौन सम्बन्धों के खुलेपन को बेहिचक स्वीकारते हैं। अभिजात्य संस्कारों के प्रति क्रोध और विद्रोही भाव इन कवियों में कूट-कूटकर भरा है-
गिरगिट छिप जाता है
ट्रेपस्टी के पीछे नीले फूलदान में एक कद्दावर औरतें अस्पताल जाती हैं। पेटेंट नुस्खों के साथ-साथ एक चूहा खरीद लाती हैं 3
और सत्रह हजार तीन सौ पचपन दवाओं के
अ-कविता पर दृष्टिगोचर होता बीटनिकों का प्रभाव विस्तार पा गया। पश्चात् अ-कविता ही नहीं, प्रत्येक क्षुध मानसिकता को बीट पीढ़ी के विचार आकर्षित करने लगे। राजकमल चौधरी तो गिन्सबर्ग से इस कदर प्रभावित हैं कि उनके 'मुक्ति प्रसंग' में गिन्सबर्ग और उनके अनुयायी मलयराय चौधरी दोनों विद्यमान हैं-
जिसे बेड़ील टुकड़ों में बाँटकर अलग-अलग चाहते हैं
भोग करना बनिए सौदागर
इस दुनिया की सबसे नंगी सबसे मजबूत औरतका नाम है वियतनाम उत्तर वियतनाम और दक्षिण वियतनाम / उत्तर कोरिया और
दक्षिण कोरिया
पूर्वी जर्मनी और पश्चिमी जर्मनी
सफेद अफ्रिका और काला अफ्रिका पाकिस्तान और हिन्दुस्तान और मलयराय चौधरी का हिन्दुस्तान
सफेद अमरिका और काला अमरिका
जॉन्सन का अमरिका और इलेन गिन्सबर्ग का अमरिका
इंदिरा गाँधी का हिन्दुस्तान
इस दुनिया की प्रत्येक मजबूत औरत नंगी और दो टुकड़ों में बँटी हुई।
यह औरत मेरी माँ और मेरी बीवी मेरा देश / और मेरी ज़िंदगी"
केवल राजकमल चौधरी ही गिन्सबर्ग से प्रभावित नहीं थे। सन् 1963 में शमशेर बहादुर सिंह ने 'कल्पना' में गिन्सबर्ग को लेकर पाँच कविताएँ लिखीं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा- "कवियों के मध्य कोई सीमारेखा नहीं होती। यदि होती है तो गंगा की रेत, मियामी उद्यान, कश्मीर, निस्, जेनेवा नियाग्रा, रायो, सितारों, पहाड़ों, बहारों-त्यौहारों, एक जाम, चाय, चिलम, कॉफ़ी, धूम्रपान, सागर-लहर और फाख्ताओं के सिवाय कोई सीमारेखा नहीं ।" उपर्युक्त कथन से गिन्सबर्ग के हिन्दी कविता पर पड़े सर्वव्यापी प्रभाव को आँका जा सकता है। इस 'बीट जनरेशन' ने भी हिन्दी कविता में यत्किंचित श्रीवृद्धि नहीं की क्योंकि इसमें भी केवल नारी देह का अंग प्रत्यंग वर्णन,
कुण्ठा, आत्महत्या, सेक्स चिन्ता के अलावा कुछ भी नहीं था। अमेरिका के बीटनिकों ने जो जिया उसे हिन्दी ने (बांग्ला के माध्यम से) चितारा और जीवन में उतारा। इन बीटनिकों ने समलैंगिकता, घृणास्पद उच्छृंखलता, अतिवादी फैशन, काम- बुभुक्षा को आध्यात्मिक तलाश का चोगा पहनाया। इस सन्दर्भ में विमल पाण्डे लिखते हैं- "हिन्दी की बीट कविता कुत्साप्रधान कविता है। वह उतनी ही भौंडी है जितनी किसी को सीधे गाली देना। बीट कवियों का भी जीवन दर्शन नहीं है। बीट कविता में पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को सैद्धान्तिक समर्थन देने की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चेष्टा की गई है। इसमें गाँजा एवं चरस पीना, मन में छिपी सेक्सुअलिटी खोज निकालने वाली नशीली दवाओं का उपयोग यौन विकृतियों की भौंड़ी आलोचना की गई है।"
स्वयं जगदीश गुप्त इस विषय में अपनी बेबाक राय देते हैं- "क्षुधा और काम को नितान्त अमर्यादित रूप में ग्रहण करना आधुनिक जीवन के गहन सांस्कृतिक संकट का परिचायक भले ही हो उसका विश्वसनीय निदान नहीं है, क्योंकि इनके वेग के द्वारा मानवीय सहानुभूति बहुधा कुचल दी जाती है और मनुष्य कंकाल के सदृश्य खोखला दिखाई देने लगता है।" 16
बी पीढ़ी की कविताएँ मात्र सेक्स तक सिमटकर रह गई। भारतीय मिट्टी में वह कभी एकाकार प्रतीत ही नहीं हुई।
इस कविता का मूल्यांकन करता हुआ डॉ. बैद्यनाथ सिंहल का कथन पूर्ण रूप से सत्य प्रतीत होता है - "मूल्यदृष्टि बीट कवियों के पास तो बिल्कुल नहीं है। जिस प्रकार बीट लोग काम से बचकर ऐश उड़ाना चाहते हैं, इसी प्रकार ये कविता से बचकर कवि होने का नाम कमाना चाहते हैं। यदि बीट लोग अन्तर्राष्ट्रीय तस्कर हैं, तो बीट कवि उनकी पासपोर्ट कहे जा सकते हैं। " 17.
बीट कविता अपने मूल अवतार में कई बार अचूक सामाजिक, राजनैतिक सन्दर्भ के साथ उभरी है, कई राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों का स्पर्श करती दिखाई देती है किन्तु इन सकारात्मक प्रवृत्तियों के मजबूत होने के पहले ही बीट कविता मारीजुआना, सेक्स, आध्यात्मिकता की खोल और कई सारी दुर्भाग्यपूर्ण असंगतियों में फँस गई और देखते ही देखते सारा बीट आन्दोलन ही थोथा, भौंडा, अश्लील और सारहीन सिद्ध हुआ ।
वार्तालाप में शामिल हों