भिखारीदास गुण-निरूपण - beggar slave characterization
अपने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'काव्यनिर्णय' के उन्नीसवें उल्लास में आचार्य भिखारीदास ने गुण का विवेचन किया है। इसी उल्लास में वे अनुप्रास आदि पाँच अलंकारों की चर्चा भी करते हैं। ध्यातव्य है कि उन्होंने एक ओर गुणाभूषण स्वीकार किया है, वहीं दूसरी ओर अनुप्रास को गुण का भूषण माना है। यहाँ गुण से उनका अभिप्राय शब्दगत गुण प्रतीत होता है न कि रसगत गुण, क्योंकि किसी रसविहीन रचना में शब्दादिगत गुणों की स्वीकृति अपने-अपने नियत वर्णों की आवृत्ति पर आधारित है तथा वर्णावृत्ति को ही अनुप्रास कहते हैं । 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-
रस के भूषित करन तें, गुन बरने सुखदानि ।
गुन भूषन अनुमानिके, अनुप्रास उर जानि ॥
हालाँकि, उनकी यह अवधारणा आशयपूर्ण होने के बावजूद पूर्णरूपेण त्रुटिरहित नहीं कही जा सकती है। नव्य आचार्यों ने न तो गुणको रस का भूषण माना है और नही अनुप्रास को गुण का भूषण स्वीकार किया है।
गुण-विषयक अवधारणा
गुण के विषय में कवि आचार्य भिखारीदास दो प्रकार की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकरण में उन्होंने एक ओर जहाँ आचार्य मम्मट का अनुकरण किया है वहीं दूसरी ओर अपनी मौलिकता का भी परिचय दिया है। आचार्य मम्मट के अनुरूप उन्होंने यह मत प्रकट किया है कि जिस प्रकार शूरता आदि गुण आत्माके धर्म हैं,
उसी प्रकार माधुर्य आदि गुण रस के धर्म हैं। वस्तुतः गुण रस के उत्कर्षक हैं और इनकी स्थिति काव्य में अनिवार्य रूप से रहती है। इनका वास्तविक रूप अंगी (रस) के ही धर्म बनने में निहित है। जिस प्रकार शूर भी लघुकाय किसी व्यक्ति को 'कायर' और कायर भी महाकाय किसी व्यक्ति को 'शूर' कह दिया जाता है; उसी प्रकार गुण-व्यंजक वर्ण योजना के द्वारा रस का निर्धारण कर लिया जाता है। चूँकि विपरीत वर्ण योजना रचना को वर्ण प्रतिकूलता दोष से दूषित कर देती है इसलिए काव्य में किसी विपरीत वर्ण योजना का संयोजन समुचित व तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता है। इस आलोक में 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं-
ज्यों जीवात्मा में रहै, धर्म सूरता आदि । त्यों रस ही में होत गुन, बरनै गर्ने सबादि ॥
रस ही के उत्कर्ष को अचल स्थिति गुन होय। अंगी धरम सुरूपता, अंगधरम नहिं कोय ॥
कहु लखि लघु कायर कहै, सूर बड़ो लखि अंग । रस हि लाज त्यों गुन बिना, अरि सो सुभग न संग ॥
आलोच्य प्रकरण में आचार्य भिखारीदास ने परम्परा से हटकर कुछ मौलिक स्थापनाएँ भी की हैं। उनके विचार में रस काव्य का अंग है। हालांकि, संस्कृत के किसी भी आचार्य ने रस को काव्य का अंग नहीं माना है । 'काव्यनिर्णय' में अपने मत को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है-
रस कविता को अंग, भूषन है भूषन सकल ।
गुन सरूप औ अंग, दूपन करे सुरूपता ॥
गुणविषयक अवधारणा में आचार्य भिखारीदास अपनी पूर्ववर्ती परम्परा से स्वतन्त्र होकर कहीं-न-कहीं स्थायीभाव और गुण दोनों का आश्रय हृदय को मानते प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि उन्होंने शौर्य आदि गुणों की भाँति दस गुणों का भी निवासस्थल हृदय को स्वीकार किया है-
ज्यों सतजन हिय ते नहीं, सूरतादि गुन जाय । त्यों विदग्ध हिय में रहैं, दस गुन सहज स्वभाव ॥
- (काव्यनिर्णय)
अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय देते हुए वे 'ज्यों जीवात्मा में रहे, धर्म सूरता आदि कहकर स्वयं गुणों का सम्बन्ध आत्मा से भी स्थापित करते हैं।
गुणों की संख्या दशगुण स्वरूप और उसकी अस्वीकृति तथा तीन गुण
आचार्य भिखारीदास नव्याचार्यों की तरह तीन गुण स्वीकार करते हैं। ध्यातव्य है कि इस प्रकरण में उन्होंने आचार्य मम्मट की भाँति आचार्य वामन सम्मत दस गुणों को नहीं माना है। 'काव्यनिर्णय' में माधुर्यादि दस गुणों का स्वरूप निरूपण उन्होंने इस प्रकार किया है-
अनुस्वार जुत वर्ण जत, सबै वर्ग अटवर्ग। अक्षर जामें मृदुपरै, सो माधुर्य निसर्ग ॥
- (माधुर्य)
उद्धत अक्षर जहं पर, स क टवर्ग मिलि जाय।
ताहि ओज गुण कहत हैं, जे प्रवीन कविराय ॥
- (ओज)
मन रोचक अक्षर पर, सोहै सिथिल सरीर । गुन प्रसाद जल-सूक्ति ज्यों, प्रकटै अर्थ गम्भीर ॥
- (प्रसाद)
प्राचीनन की रीति सों भिन्न रीति ठहराइ ।
समता गुन ताको कहे पै दूषनन्ह बराड़ ।
- (समता)
रुचिर रुचिर बातें करे, अर्थ न प्रकट गूढ ग्राम्या रहित सो कांति गुन समुझे सुमति न मूढ़ ॥
- (कान्ति)
जो अन्य बल पठित है, समुझि परै चतुरैन । औरन को लागे कठिन गुन उदारता जैन ॥
- (उदारता )
जासु अर्थ अति ही प्रगट नहिं समास अधिकाउ । अर्थव्यक्त गुण बात ज्यों, बोलै सहज सुभाउ ॥
- (अर्थव्यक्ति)
बर तरुनी के बैन सुनि, चीनी चकित सुभाइ । दुखित दाख मिसिरी मुरी, सुधा रही सकुचाई ॥
- (समाधि)
बहु सब्दन को एक कौ, कीजै जहाँ समास । ता अधिकाई श्लेष गुन गुन मध्यम लघु दास ॥
- (श्लेष)
एक सबद बहु बार जहं परै रुचिरता अर्थ । पुनरुक्ती प्रकाश गुन, बरनै बुद्धि समर्थ ॥
- (पुनरुक्तिप्रकाश)
दशगुण स्वरूप निरूपण में आचार्य भिखारीदास ने अक्षर गुण, वाक्य गुण, अर्थ गुण तथा दोषाभाव गुण के आधार पर दस गुणों का एक मौलिक व नवीन वर्गीकरण प्रस्तुत करने का उल्लेखनीय प्रयास किया है-
अक्षर गुण माधुर्य, ओज,
प्रसाद श्लेष, पुनरुक्तिप्रकाश
वाक्य गुण
अर्थ गुण दोषाभाव गुण :
अर्थव्यक्ति, समाधि
समता, कान्ति, उदारता
समवेततः गुण- प्रकरण में कवि आचार्य भिखारीदास अपने पूर्ववर्ती दशगुण अवधारणा को स्वीकार न करते हुए तीन गुणों की मौलिक संकल्पना प्रस्तुत करते हैं जहाँ उन्होंने गुणों का अन्तर्भाव तीन गुणों के अन्तर्गत किया है-
माधुर्य गुण ओज गुण
मध्य समासगत श्लेष, समता और कान्ति गुरु समासगत श्लेष, समाधि और उदारता
प्रसाद गुण
अर्थव्यक्ति
वार्तालाप में शामिल हों