भिखारीदास ध्वनि - निरूपण - beggar slave sound representation
हिन्दी कवि आचार्य शिक्षण-परम्परा में आचार्य भिखारीदास का ध्वनि निरूपण अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट और सारगर्भित माना जाता है। अपनी महत्त्वपूर्ण कृति 'काव्यनिर्णय' के छठे उल्लास में उन्होंने 'ध्वनिभेद-वर्णन' किया है। इस प्रकरण में उन्होंने आधार-ग्रन्थ के रूप में 'काव्यप्रकाश' का सहारा लिया है।
ध्वनि के भेद, उपभेद व उनके लक्षणों के अतिरिक्त कतिपय उदाहरणों के उल्लेख में भी आचार्य मम्मट
का प्रभाव देखा जा सकता है। उदाहरणार्थ-
सुनिसुनि प्रीतम आलसी, धूर्त सूम धनवंत । नवल बाल हिय मैं हरष, बाढ़त जात अनन्त ॥
प्रमुख भेदोपभेद
भिखारीदास के अनुसार वाच्य अर्थ की अपेक्षा व्यंग्य अर्थ में चमत्कार का आधिक्य ही ध्वनि काव्य है। गुणीभूत-व्यंग्य व चित्रकाव्य की तुलना में उन्होंने ध्वनि काव्य को उत्तम काव्य स्वीकार किया है। इस आलोक में 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
वाच्य अर्थ तें व्यंग्य में चमत्कार अधिकार ।
ध्वनि ताही को कहत हैं उत्तम काव्य विचार |
भिखारीदास ने आचार्य मम्मट-सम्मत ध्वनि के प्रमुख दो भेदों (अविवक्षित वाच्य और विवक्षित वाच्य ) की सुन्दर विवेचना प्रस्तुत की है।
हालाँकि, आचार्य मम्मट प्रवर्तित 'विवक्षितान्यपर-वाच्य' को उन्होंने विवक्षित वाच्य की संज्ञा प्रदान की है।
भिखारीदास के मतानुसार जहाँ वाच्य अर्थ के अभीष्ट न रहने पर व्यंग्यार्थ की प्रतीति पहली ध्वनि कहलाती है, वहीं वाच्य अर्थ के अभीष्ट रहते हुए व्यंग्य अर्थ की प्रतीति को दूसरी ध्वनि कहते हैं । यहाँ उल्लेखनीय है कि आधुनिक काव्य समीक्षकों के मतानुसार आचार्य भिखारीदास दूसरी ध्वनि के स्वरूप को पूरी तरह से अभिव्यक्त नहीं कर पाए हैं। ध्वनि-भेद निरूपण के आलोक में 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं-
वकता की इच्छा नहीं, वचनहिं को जु सुभाउ । व्यंग कदै तिहि वाच्य को अविवक्षित ठहराउ ।
वहे विवक्षित वाच्य ध्वनि चाहि करे कवि जाहि ॥
ध्वनि का भेदोपभेद करते हुए आचार्य भिखारीदास अविवक्षितावाच्य ध्वनि के दो भेद मानते हैं- - अर्थान्तर-संक्रमित- वाच्य और अत्यन्त तिरस्कृत- वाच्य । इस प्रकरण में आचार्य मम्मट का अनुसरण करने के बावजूद उन्होंने केवल अर्थान्तर-संक्रमित वाच्य ध्वनि को ही लक्षणामूलक गूढ़-व्यंग्य से समन्वित होने का संकेत किया है। वाच्य अर्थ के अन्य अर्थ में संक्रमण का वे कोई उल्लेख नहीं करते हैं। इस प्रकरण में 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-
अर्थ ऐस ही बनत जहं, नहीं व्यंग की चाह ।
व्यंग विकारि तउ करे, चमत्कार कवि नाह ॥ अर्थान्तरसंक्रमित सो वाच्य जुव्यंग अतूल। गूढ़ व्यंग यामे सही, होत लक्षना मूल ॥
भिखारीदास विवेचित अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य ध्वनि शैली प्रकरण शिथिल होते हुए भी महत्त्वपूर्ण है।
इस निरूपण में लक्षणामूलत्व की चर्चा तो गई है, लेकिन गूढ़-व्यंग्य की नहीं। हालाँकि, वाच्य के 'परिपूर्ण त्याग' के उल्लेख से यह लक्षणा स्वीकार्य प्रतीत होता है। अवलोकनार्थ 'काव्यनिर्णय' की पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-
है अत्यंत तिरस्कृती निपट, तजे ध्वनि होय । समय लक्ष तें पाइये, मुख्य अर्थ को गोय ॥
विवक्षितान्यपर वाच्य ध्वनि का दूसरा नाम अभिधामूला ध्वनि है। असंलक्ष्य-क्रम-व्यंग्य और संलक्ष्य क्रम-व्यंग्य इसके दो भेद हैं। रस, भाव आदि को असंलक्ष्यक्रम-व्यंग्य का पर्याय माना गया है। भिखारीदास ने ध्वनि-भेद को 'रसव्यंग्य' की संज्ञा प्रदान की है। 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-
असंलक्ष्यक्रम जहं, रस पूरनता चारु ।
लखि न परे क्रम जेहि द्रवै सज्जन चित्त उदारु ॥
रस भावन के भेद को, गनना गनी न जाइ। एक नाम सब को कह्यो, रसै व्यंग ठहराइ ॥
आचार्य भिखारीदास अन्वयव्यतिरेक-सम्बन्ध पर आधारित संलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि के तीन उपभेदों- शब्द- शक्त्युद्भव, अर्थ- शक्त्युद्भव और शब्दार्थ- शक्त्युद्भव का विवेचन करते हैं।
उनके अनुसार कविप्रौढोक्ति ध्वनि कवि कल्पना और कवि परम्परा पर आधारित है। इस प्रसंग में उन्होंने कुछेक कवियों का उल्लेख भी किया है, यथा -
जग कहनावति तें जु कछु कवि कहनावति भिन्न । तेहि प्रौढोक्ति कहै सदा, जिन्ह की बुद्धि अखिन्न ।
पदगत, वाक्यगत और प्रबन्धगत भेद
ध्वनि के पदगत रूपों की विवेचना करते हुए आचार्य भिखारीदास शब्द- शक्त्युद्भव के अतिरिक्त बाकी स्वसम्मत तेरह भेदों के पदगत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वैसे तो आचार्य मम्मट ने अर्थ- शक्त्युद्भव तथा असंलक्ष्यक्रम व्यंग्यको प्रबन्धगत स्वीकार किया है,
लेकिन कवि आचार्य भिखारीदास ने इस ओर केवल संकेत किया है। उनके विवेचन से यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि ध्वनि के किन भेदों को प्रबन्धगत मानना वांछित है। आलोच्य सन्दर्भ में 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं, यथा -
एकहि शब्द प्रकाश में उभयशक्ति न लखाइ । अस सुनि होत प्रबन्ध ध्वनि, कथा प्रसंगहि पाइ ॥
स्वयंलक्षित व्यंग्य
भिखारीदास स्वयंलक्षित व्याय नामक ध्वनि भेद को पद (शब्द), वाक्य, पदांश और वर्णगत रूप में स्वीकृत करते हैं। हालांकि,
पूर्ववर्ती संस्कृत काव्यशास्त्रियों ने भी स्वयंलक्षित व्यंग्य नामक ध्वनि की ओर संकेत नहीं किया है। इस सन्दर्भ में कवि आचार्य भिखारीदास ने स्वयं लक्षित व्यग्य वहाँ स्वीकार किया है जहाँ अत्यन्त उपयुक्त और अनुपम बात की जाय। ध्वनि भेदों की गणना में उन्होंने इस ध्वनि को पाँच प्रकारों शब्द (पद), गत, वाक्यगत, पदांशगत, रचनागत और वर्णगत में निरूपित किया है। स्वयं लक्षित-व्यंग्य के आलोक में 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं-
वाही कहे बनै जु विधि, वा सम दूजो नाहिं । ताहि स्वयं लच्छित कहे, व्यंग्य समुझि मनमाहिं ॥
शब्द, वाक्य, पद पदहु को एकदेस पद बर्न । होत स्वयं लक्षित महं समुझे सज्जन कर्न ॥
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