भिखारीदास अलंकार-निरूपण - beggar's figure of speech

कवि आचार्य शिक्षण- परम्परा में अलंकार प्रकरण को पहली बार वर्गबद्ध कर नवीन निरूपण शैली निर्धारित करने का श्रेय आचार्य भिखारीदास को दिया जाता है। उनके ग्रन्थ 'काव्यनिर्णय' के अधिकांश भाग में अलंकारों का विस्तृत निरूपण किया गया है। इस ग्रन्थ के तीसरे उल्लास में अलंकारों का जहाँ चन्द्रालोक की शैली पर संक्षिप्त रूप से विवेचन है, वहीं आठवें से इक्कीसवें उल्लास में अलंकारों का विस्तृत निरूपण है। वैसे तो 'काव्यनिर्णय' के उन्नीसवें उल्लास का नाम 'गुणनिर्णय वर्णन है लेकिन इसके अन्तर्गत ही अनुप्रास आदि शब्दाला कारों का भी विवेचन किया गया है।


अवधारणा


ध्वनिवादी आचार्यों की भाँति आचार्य भिखारीदास ने 'भूषन हैं भूषन सकल' कहकर अलंकार को व्याख्यायित किया है।

उनके अनुसार जिस प्रकार शरीर के लिए हार आदि लौकिक अलंकार हैं, ठीक उसी प्रकार अनुप्रास, उपमा आदि अलंकार शब्दार्थ-रूप शरीर के बाह्य आभूषण मात्र हैं। 'काव्यनिर्णय' में उन्होंने लिखा है-


अनुप्रास उपमादि जे शब्दार्थालंकार । ऊपर तें भूषित करें, जैसे तन को हार ॥


उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि अलंकार सरस रचना के लिए अनिवार्य घटक नहीं है और इसके बिना भी रचना रसयुक्त हो सकती है-


अलंकार बिनहु र सहु है रसो अलंकृत छंडि ।


सुकवि वचन रचनान सो, देत दुहुंन को मंडि॥


- ( काव्यनिर्णय)


आचार्य मम्मट का अनुकरण करते हुए भिखारीदास ने व्यंग्य-विहीन रचना में अलंकार निर्वहन को चित्र अथवा अवर काव्य की संज्ञा प्रदान की है। हालाँकि, उन्होंने यह मत भी प्रकट किया है कि अलंकार कहीं वाच्य रहते हैं और कहीं व्यंग्य इस सन्दर्भ में 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं-


कहूं वचन कहूं व्यां में, परे अलंकृत जाइ।


शब्दालंकार व अर्थालंकार


आचार्य भिखारीदास ने अनुप्रास, लाटानुप्रास, वीप्सा, यमक, सिंहावलोकन, श्लेष,

विरोधाभास, मुद्रा, वक्रोक्ति और पुनरुक्तवदाभास को शब्दालंकार के रूप में निरूपित किया है। 'काव्यनिर्णय' के उन्नीसवें उल्लास में उन्होंने जहाँ अनुप्रास, लाटानुप्रास, वीप्सा, यमक और सिंहावलोकन अलंकार का विवेचन किया है, वहीं बीसवें उल्लास में श्लेष, विरोधाभास, मुद्रा, वक्रोक्ति और पुनरुक्तवदाभास का वर्णन है। इक्कीसवें उल्लास में 'चित्र' नामक शब्दालंकार का निरूपण हुआ है।


आचार्य भिखारीदास अनुप्रास, लाटानुप्रास, यमक, श्लेष वक्रोक्ति और पुनरुक्तवदाभास का आचार्य मम्मट-सम्मत स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।

लेकिन वीप्सा और सिंहावलोकन को उनकी नवीन उद्भावना माना जा सकता है। उल्लेखनीय है कि हिन्दी काव्य शिक्षण परम्परा में आचार्य भिखारीदास से पहले किसी प्रसिद्ध आचार्य ने इसका उल्लेख नहीं किया है।


वीप्सा अलंकार को उन्होंने लाटानुप्रास अलंकार से मिलता-जुलता स्वीकार किया हैं। उनके अनुसार हर्ष, शोक आदि भावों के अतिरेक के कारण जहाँ शब्दों की द्विरुक्ति होती है वहाँ वीप्सा अलंकार होता है, अन्यथा लाटानुप्रास अलंकार । इसके अतिरिक्त वीप्सा में आवृत्त शब्दों का अर्थ एक होता है, लेकिन लाटानुप्रास में अर्थ की एकता होते हुए भी अभिप्राय में भिन्नता होती है। 'काव्यनिर्णय' में उन्होंने लिखा हैं -


एक सब्द बहु बार जहं, हरषादिक तें होइ। ताकहं विप्सा कहत हैं, कवि कोविद सब कोइ ॥


एक शब्द बहुबार जहं, सो लाटानुप्रास । तात्पर्य तें होत है, और अर्थ प्रकास ॥


सिंहावलोकन अलंकार की चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि यह यमक से मिलता-जुलता अलंकार है । हिन्दी छन्दशास्त्र में वर्णित 'कुण्डलिया' की तरह सिंहावलोकन अलंकार में भी दूसरे चरण के अन्तिम शब्द अथवा शब्दों की अगले चरण के आदि में आवृत्ति होती है। कहना गलत न होगा कि कुण्डलिया के समान सिंहावलोकन भी हिन्दी साहित्य की देन है। 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं-


चरन अन्त अरु आदि के जमक कुंडलित होय ।


सिंह- बिलोकन है वह, मुक्तक पद ग्रस सोइ ॥


आचार्य अण्प्यदीक्षित ने मुद्रा अलंकार को अर्थालंकार से अभिहित किया है लेकिन भिखारीदास इस प्रकरण में उनका अनुकरण करते हुए भी मुद्रा अलंकार को शब्दालंकारों की श्रेणी में स्थापित करते हुए प्रतीत होते हैं। उनके अनुसार इसका अस्तित्व शब्दार्थ की बजाय शब्द के ही छल यानी चमत्कारपूर्ण प्रयोग पर निर्भर करता है। उदाहरण प्रस्तुत है-


औरो अर्थ कबित को, सब्दो छल व्यवहारु । झलके नामक नाम-गम मुद्रा कहत सुचारु ॥


श्लेष अलंकार में अलग-अलग अर्थों के निहितार्थ आचार्य भिखारीदास स्वाभाविक शंका उपस्थित करते हुए उसका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं।

उनका मानना है कि श्लेष अलंकार में श्लिष्ट पदों के कारण विभिन्न पक्षों में शाब्दिक समता के होते हुए भी वास्तविक समता नहीं होती। इस आलोक में 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-


सन्देहालंकार इत भूलि न आनो चित्त । को श्लेष दृढ़ करन को नहि समता थल मित्त ॥


चित्र अलंकार का सर्वप्रथम प्रयोग आचार्य दण्डी ने किया है। भिखारीदास चित्र अलंकार के चार भेद (प्रश्नोत्तर, पाठान्तर, वाणी का चित्र और लेखनी- चित्र) स्वीकार करते हुए अपने पूर्ववर्ती आचार्यों की भाँति चित्र अलंकार को सदोष नहीं मानते हैं-


दास सुकवि बानी कथे, चित्र कवित्तन्ह मां हि । चमत्कार हीनार्थ को हहां दोष कछु नाहि ॥


- ( काव्यनिर्णय)


अर्थालंकार निरूपण में भिखारीदास ने आचार्य रुद्रट अथवा आचार्य रुय्यक का अनुकरण न करते हुए एकवर्गीय अलंकारों के वर्ग का नाम मूलप्रवृत्तिसूचक न रखकर प्रमुख अलंकारों के नाम पर रखा है। उदाहरणार्थ उन्होंने उपमा, अनन्वय, प्रतीप आदि अलंकारों के वर्ग को 'सादृश्यमूलक' अलंकार न कहकर 'उपमादि' कहा है। हालाँकि, इस निरूपण को परवर्ती आचार्यों ने तर्कसम्मत नहीं माना है।


अर्थालंकार निरूपण में कवि आचार्य भिखारीदास ने कुल छियानवे अलंकारों को ग्यारह वर्गों (उपमा वर्ग, उत्प्रेक्षा वर्ग, व्यतिरेक वर्ग, अतिशयोक्ति वर्ग, विरुद्ध वर्ग,

सम वर्ग, सूक्ष्म वर्ग, स्वाभावोक्ति वर्ग और यथासंख्य वर्ग) में विभाजित किया है। 'विस्तृत अलंकार निरूपण' के प्रारम्भ में ही उन्होंने यह संकल्प व्यक्त किया है कि वे अलंकार-प्रकरण का भेदोपभेद सहित विस्तृत निरूपण प्रस्तुत करने जा रहे हैं-


अलंकार रचना बहुरि, करौं सहित विस्तार। एक एक पर होत जहं, भेद अनेक प्रकार ॥


- ( काव्यनिर्णय)


अर्थालंकारों के भेदोपभेद के लिए भिखारीदास ने आचार्य अप्पयदीक्षित के अतिरिक्त आचार्य मम्मट और आचार्य विश्वनाथ के ग्रन्थों का आधार ग्रहण किया है। यथा उपमा, मालोपमा, व्यतिरेक, विरोध, समुच्चय, परिसंख्या और प्रश्नोत्तर (उत्तर) नामक सात अलंकारों के भेदों के लिए वे आचार्य मम्मट के आभारी हैं।

समासोक्ति अलंकार के एक भेद श्लेष पर समासोक्ति के लिए उन्होंने आचार्य विश्वनाथ के प्रति आभार प्रकट किया है। साथ ही अर्थालंकारों के स्रोत निरूपण में वे आचार्य अप्पयदीक्षित के 'कुवलयानन्द' का सर्वाधिक अनुकरण करते प्रतीत होते हैं।


सारांशतः कतिपय त्रुटियों के बावजूद आचार्य भिखारीदास के अलंकार निरूपण की पहली विशेषता जहाँ शास्त्रीय चर्चा को सरल रूप में प्रस्तुत करना है, वहीं संक्षेपप्रियता उनके इस प्रकरण की दूसरी विशिष्टता मानी जा सकती है। अलंकार निरूपण में नवीनता और मौलिकता का समावेश उनके विवेचन को प्रभावपूर्ण बनाता है।