भिखारीदास : काव्य का लक्षण और स्वरूप - Bhikhari Das: Characteristics and Form of Poetry

आचार्य भिखारीदास ने प्रत्यक्ष तौर पर अपनी किसी भी रचना में काव्य का लक्षण प्रस्तुत नहीं किया है, तथापि 'काव्यनिर्णय' ग्रन्थ में निरूपित काव्यपुरुष रूपक के आधार पर उनकी काव्यस्वरूप विषयक धारणा स्पष्ट हो जाती है। रस को काव्य का अंग स्वीकार करते हुए उनकी स्थापना है कि काव्य में अलंकार आभूषणों की तरह है। गुण काव्य का सुन्दर रूप व वर्ण है, जबकि दोष उसे कुरूप बना देते हैं। इस आलोक में 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-


रस कविता को अंग, भूषन है भूषन सकल ।


गुण सरूप और रंग दूषन करे कुरूपता ॥


काव्यस्वरूप निरूपण


काव्यस्वरूप निरूपण में भिखारीदास काव्य के अंग व काव्य-भाषा का महत्त्व रेखांकित करते हैं। उन्होंने पदार्थ (शब्दशक्ति), मूल अलंकार रस, परांग, ध्वनि, गुणादि को काव्यांग मानते हुए कवि बनने के आकांक्षी व्यक्ति को काव्यांगों में कुशल व पारंगत होने का सुझाव दिया है। काव्यांग-कुशलता का महत्त्व सिद्ध करते हुए वे कहते हैं -


जानै पदारथ भूषन मूल, रसांग-परांगन्ह में मति छाकी । सो धुनि अर्थह वाक्यन्ह लै गुन सब्द अलंकृत सो रति पाकी ॥ चित्र कवित्त करै तुक जाने न दोषन्ह पंथ कहूं गति जाकी । उत्तम ताको कवित्त बनै करै करीति भारती यो अति ताकी ॥


- ( काव्यनिर्णय)


अपने लक्षण ग्रन्थों की रचना करते समय प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में आचार्य भिखारीदास के समक्ष काव्यभाषा के सम्बन्ध में तात्कालिक हिन्दी के ही लक्ष्य ग्रन्थों का आदर्श मौजूद है। यही वजह है कि तत्युगीन काव्य में ब्रजभाषा की महत्ता से वे अपरिचित नहीं हैं। उनका निम्नलिखित कथन ब्रजभाषा के देशव्यापी प्रभाव को इंगित करता है-


ब्रजभाषा हेतु ब्रजबास ही न अनुमानो । ऐसे ऐसे कविन्ह की बानिहू से जानिये ॥


(काव्यनिर्णय)


भिखारीदास ने काव्य में प्रयुक्त अन्य भाषाओं का उल्लेख भी किया है तथापि ब्रजभाषा के गुणगान में वे कवि आचार्य केशवदास का अनुमोदन करते प्रतीत होते हैं। उदाहरण प्रस्तुत है-


भाषा ब्रजभाषा रुचिर की सुकवि सब कोई। मिले संस्कृत पारसिह, पे अति प्रगट जु होइ ॥ ब्रज मागधी मिले अमर नाग जमन भाषनि । सहज पारसीहू मिले, षट् विधि कवित बखानि ।।


- ( काव्यनिर्णय)


काव्यहेतु निरूपण


आचार्य केशवदास का काव्यहेतु निरूपण 'काव्यप्रकाश' पर आधारित है। उन्होंने जन्मजात शक्ति, सुकवियों द्वारा काव्य रीति की शिक्षा और लोक की बातों को देखना तथा सुनना को काव्य हेतु माना है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि कोई एक हेतु अपने आप में समर्थ नहीं है,

क्योंकि ये तीनों सामूहिक रूप से ही काव्य- रचना के मूल कारण हैं। काव्यहेतु का व्यापक निरूपण करते हुए वे कहते हैं-


सक्ति कवित्त बनाइबे के जेहि, जन्म नक्षत्र में दीन्हि विधातें। काव्य की रीति सिखी सुकवीन्ह सों, देखी सुनी बहुलोक की बातें। दास है जामें इकत्र ये तीनी बनी कविता मनोरोचक तातें। एक बिना न चले रथ जैसे, धुरंधर सूत की चक्र निपातें ॥


काव्य प्रयोजन निरूपण


हिन्दी काव्यादर्शों को लक्ष्य कर उसे समर्थ रूप में निभाने की क्षमता के कारण आचार्य भिखारीदास का काव्य प्रयोजन निरूपण हिन्दी काव्यशास्त्र की एक अमूल्य निधि माना जाता है।

'काव्यनिर्णय' में काव्य प्रयोजन का सरल व प्रभावी निरूपण करते हुए उनका कथन है-


एक लहैं तप पुंजन के फल ज्यों तुलसी अरु सूर गोसाई । एक लहैं बहु सम्पत्ति केशव भूषण ज्यों बरवीर बड़ाई । एकन्ह को जस ही सो प्रयोजन है रसखानि रहीम की नाई। दास कवित्तह्न की चरचा बुद्धिवंतन को सुख दे सब ठाई ॥


प्रभु ज्यौं सिखवै वेद, मित्र मित्र ज्यों सतकथा। काव्य रसन्ह को भेद, सुख-सिखदानि तिया सु ज्यों ।।


इस प्रकार उन्होंने पाँच काव्य प्रयोजनों (तपःपुंज का फल, धर्मप्राप्ति, यश, सहृदयों को आनन्द प्राप्ति तथा सुखपूर्वक शिक्षा प्राप्ति) का उल्लेख किया है जहाँ वे प्रथम तीन काव्य प्रयोजनों का सम्बन्ध 'कवि' से जोड़ते हैं,


जबकि अन्तिम दो प्रयोजनों का सम्बन्ध 'बुद्धिवंतन' यानी सहृदयों के साथ मानते हैं। इस मायने में वे आचार्य मम्मट की समस्या को सुलझाने का प्रयास करते हैं।