भिखारीदास नायक-नायिका भेद निरूपण - Bhikhari Das hero-heroine distinction
भिखारीदास नायक-नायिका भेद निरूपण - Bhikhari Das hero-heroine distinction
आचार्य भिखारीदास विरचित 'शृंगारनिर्णय' ग्रन्थ में कुल 328 छन्द हैं जिनमें 225 छन्दों में केवल नायक-नायिका भेद का निरूपण है। हालाँकि, 'रससारांश' के प्रथम अर्द्ध भाग में भी नायक-नायिका भेद-निरूपण का उल्लेख मिलता है। नायक-नायिका भेद निरूपण में भिखारीदास ने मुख्यतः आचार्य भानु मिश्रकृत 'रसमंजरी' का आश्रय लिया है। कहीं-कहीं प्रसंगानुसार वे आचार्य विश्वनाथ और धनंजय का भी अनुकरण करते हैं।
नायक-नायिका लक्षण
नायक-नायिका लक्षण निरूपण काव्यशास्त्रियों का प्रिय विषय रहा है। इस सन्दर्भ में भिखारीदास पर आचार्य विश्वनाथ और आचार्य धनंजय का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है।
नायक का लक्षण स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा है कि वह छवि, गुण, ज्ञान, धन और यौवनयुक्त, सजीला, रसीला तथा दान, दया आदि गुणों में लवलीन होता है, जबकि नायिका सुन्दरी, सुमति, शोभा, कान्ति व दीप्ति से युक्त तरुणी होती है-
छवि में गुन में स्थान में, धन में धुरि धुरीन । नायक सज में रसनि में, दान दया लौ लीन ॥
- (रससारांश)
तरुन सुधर सुन्दर सुचित, नायक सुहृद बखानि ।
- (शृंगारनिर्णय)
सुन्दरता बरनत तरुणि सुमति नायका सोइ । शोभा कान्ति सुदीप्ति जुत, बरनत है सब कोइ ॥
- (रससारांश)
नायक-नायिका भेद
अपनी महत्त्वपूर्ण कृति 'शृंगारनिर्णय' में आचार्य भिखारीदास ने नायक के दो भेदों (पति और उपपति) का उल्लेख किया है । तदुपरान्त उन्हें अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्ट रूपों के साथ सम्बद्ध करते हुए उनके चार-चार उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वैसे तो आलोच्य प्रकरण में कवि आचार्य भिखारीदास आचार्य भानु मिश्र के ग्रन्थ का अनुसरण करते हैं, बावजूद इसके उनकी निजी विशिष्टताएँ उल्लेखनीय हैं। उदाहरणतया आचार्य भानु मिश्र अनुकूलादि चार भेद केवल पति के स्वीकार करते हैं,
जबकि आचार्य भिखारीदास मानव स्वभाव की एकता का समर्थन करते हुए अनुकूलादि भेदों को उपपति के साथ भी सम्बद्ध किया है। इसी प्रकार आचार्य भानु मिश्र प्रवर्तित नायक के 'वैशिक' नामक तृतीय प्रमुख भेद का 'शृंगारनिर्णय' में कहीं भी उल्लेख नहीं है, लेकिन 'रससारांश' में इसका निरूपण उल्लेखनीय है। अस्तु, नायक भेदों को आचार्य भिखारीदास निम्नलिखित रूप में निरूपित करते हैं-
निज ब्याही तिय को रसिक, पति ताकों पहिचान। आशिक और तियान को, उपपति ताको जान ॥
निज तिय सों पर तियन सों, अरु गणका सो प्रीति ।
पति उपपति बैसिक त्रिविध, नायक कहे सुरीति ॥
- (शृंगारनिर्णय)
- (रससारांश)
इक नारी सों प्रेम जिहि सो अनुकूल विचार ॥
बहू नारिन को रसिक पै सब पै प्रीति समान ।
बचन क्रिया में अति चतुर दक्षिण लक्षण जान ॥ निज सुख चतुराई करे, शठता विरचै आन । व्यभिचारी कपटी महा नायक शठ पहचान ॥
लाजरू गारी मार की, छोड़ दई सब त्राश देख्यौ दोष न मानई, नायक धृष्ट प्रकाश ॥
- (शृंगारनिर्णय)
आचार्य भानु मिश्र के समान भिखारीदास भी मानी, चतुर और प्रोषित नायकों का उल्लेख करते हैं। इसी प्रकरण में वे चतुर नायक के दो भेदों (वचन- चतुर और क्रिया-चतुर) का निरूपण करते हैं। हालाँकि आचार्य भानु मिश्र की तरह उन्होंने 'मानी' और 'चतुर' नायक को 'शठ' के अन्तर्गत मानने का संकेत नहीं किया है। वैसे कालान्तर में उन्होंने दयिता-निष्ठ उपकारापकार के आधार पर आचार्य भानु मिश्र सम्मत नायक के तीन भेदों (उत्तम, मध्यम और अधम) की चर्चा अवश्य की है।
नायिका भेद निरूपण के आलोक में आचार्य भिखारीदास ने नायिका के धर्म के आधार पर परम्परागत तीन भेदों (स्वकीया, परकीया और गणिका) को स्वीकार किया है। गुण के आधार पर नायिका भेद निरूपण करते हुए उन्होंने यह विचार प्रकट किया है कि जहाँ अधमा नायिका अपराध के बिना भी मान कर बैठती है, वहीं मध्यमा नायिका अपराधी पति से मध्यम रूप से मान करती है, जबकि उत्तमा नायिका तो मान करती ही नहीं। इस आलोक में 'शृंगारनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं - -
उत्तम मानविहीन है, लघु मध्यम मधि मान । बिना अपराध ही करती हैं, अधम नारि गुरु मान ॥
अवस्था के आधार पर नायिका भेद का विवेचन करते हुए उन्होंने नायिका के प्रसिद्ध स्वाधीनपतिका आदि आठ भेदों के अतिरिक्त दो अन्य भेदों (प्रवत्स्यत्पतिका और आगमपतिका) का उल्लेख किया है । स्वाधीनपतिका, वासकसज्जा और अभिसारिका नायिका को उन्होंने संयोग शृंगार के अन्तर्गत स्थापित किया है, जबकि शेष पाँच नायिकाओं को वे वियोग शृंगार के अन्तर्गत शामिल करते हैं। इस प्रकरण में उन पर आचार्य रूपगोस्वामी का प्रभाव स्पष्टतया परिलक्षित होता है। यद्यपि अवस्था के आधार पर नायिका के कुल दस भेद स्वीकार करते हुए भी उन्होंने केवल आठ अवस्थाओं का ही विवेचन किया है। 'रससारांश' में उन्होंने लिखा है-
आठ अवस्था भेद ते, दश विधि वरणी नारी।
कामशास्त्र के आधार पर नायिका के प्रसिद्ध चार भेदों (पद्मिनी, चित्रिणी, शंखिनी और हस्तिनी) का भी भिखारीदास संक्षेप में निरूपण करते हैं। वैसे नायिका भेद के इस कामशास्त्रीय आधार को उन्होंने समादर की दृष्टि से कभी नहीं देखा है। 'रससारांश' में उन्होंने लिखा है-
इन्हें सुभ्र शोभामई काव्य के बीच कहुं नहीं वरनिबो चित्त दीजै । कहै संखिनी हस्तिनी नाम जो है सो तो ग्राम्य नारीन ही मैं गनीजै ॥
समवेततः भिखारीदास विवेचित नायक-नायिका भेद-निरूपण पूर्णरूपेण त्रुटि रहित नहीं होते हुए भी उपादेय है। भेदापभेद की अधिकता, उसका व्यवस्थापूर्ण निर्वहन, मौलिक उद्भावनाएँ तथा उदाहरणों की सरसता आदि विशिष्टताएँ इस प्रकरण को ग्राह्य, सरस व सुबोध बनाए हुए हैं।
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