भिखारीदास : शब्दशक्ति निरूपण - Bhikhari Das: Vocabulary Representation

कवि आचार्य भिखारीदास द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण रीतिग्रन्थ 'काव्यनिर्णय' के द्वितीय उल्लास 'पदार्थ निर्णय' में शब्दशक्ति का निरूपण है। इसके अन्तर्गत कुल 69 पद्य हैं। हालाँकि, आलोच्य प्रकरण में उन्होंने अपने पूर्ववर्ती ग्रन्थ 'काव्यप्रकाश' का आधारग्रन्थ के रूप में अनुसरण किया है।


पद और शब्दशक्ति


आचार्य मम्मट का अनुकरण करते हुए भिखारीदास तीन प्रकार के पदों (वाचक, लाक्षणिक और व्यंजक) का उल्लेख करते हैं। 'काव्यनिर्णय' में उन्होंने लिखा है-


पद वाचक अरु लाच्छनिक व्यंजक तीनि विधान ।


वाचक शब्द, वाच्य अर्थ और अभिधा शक्ति का स्वरूप निरूपण करते हुए उन्होंने वाचक शब्द के चार भेद (जाति, यदृच्छा, गुण और क्रिया) स्वीकार किए हैं। वाचक शब्द से जो अर्थ निकलता है, उसे वाच्यार्थ कहते हैं। अभिधा शक्ति प्रसंग-सम्बद्ध होकर अनेकार्थक शब्द में से किसी एक अर्थ का ज्ञान कराती है। वाचक शब्द, वाच्य अर्थ और अभिधा शक्ति का स्वरूप निर्धारण कवि आचार्य भिखारीदास ने इस प्रकार किया है.


जाति यदिच्छा गुन किया, नाम जु चारि प्रमान । सब की संज्ञा जाति गनि, वाचक कहें सुजान ॥ जाति नाम जदुनाथ अरु, कान्ह जदिच्छा धारि ।


गुन तें कहिये स्याम अरु क्रिया नाम कंसारि ॥


(वाचक)


ऐसे शब्दन्ह सौं फुरे, संकेतित जो अर्थ । ताको वाच्यारथ कहें, सज्जन सुमति समर्थ ॥


- ( वाच्यार्थी)


अनेकार्थहू सब्द में, एक अर्थ की व्यक्ति । तेहि वाच्यारथ को कहैं, सज्जन अभिधा शक्ति ॥


जामैं अभिधा सक्ति करि, अर्थ न दूजो कोइ । वहै काव्य कीन्हें बनै, नातौ मिश्रित होइ ॥


- (अभिधा शक्ति)


अभिधा शक्ति का सम्बन्ध एकार्थक और अनेकार्थक दोनों प्रकार के शब्दों के साथ होता है, लेकिन आचार्य भिखारीदास अभिधा का स्वरूप निर्धारण करते समय अभिधामूला शाब्दी व्यंजना का स्वरूप निर्धारित करने लगते हैं जो कि स्पष्ट नहीं है। इसी सन्दर्भ में उन्होंने चौदह नियन्त्रित कारणों के उदाहरणों का भी उल्लेख किया है। लक्षणा शक्ति के सन्दर्भ में वे तीन तत्त्वों (मुख्यार्थ का बाध, मुख्यार्थ से सम्बन्ध तथा रूढिगतता अथवा प्रयोजनगतता) में से एक तत्त्व यानी 'अन्य अर्थ का मुख्यार्थ के साथ सम्बन्ध' का निरूपण नहीं करते हैं। हालाँकि, वक्ष्यमाण उदाहरणों का उल्लेख करते समय यह तत्त्व उनका अभीष्ट प्रतीत होता है। 'काव्यनिर्णय' की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-


मुख्य अर्थ के बाघ तें, शब्द लाच्छनिक होत । रूढ़ि और प्रयोजनवती, द्वै लक्षना उदोत ॥


'वाचक लच्छक भाजन रूप हैं व्यंजक को जल मानत ज्ञानी' कहते हुए भिखारीदास अभिधा और लक्षणा शब्द शक्तियों की तुलना में व्यंजना शक्ति की महत्ता सिद्ध करते हैं। व्यंजना शब्दशक्ति के लक्षणों का विवेचन करते हुए उन्होंने लिखा है-


सूधो अर्थ जुवचन को, तेहि तजे और बैन । समुझि पर तेहि कहत है, सक्ति व्यंजना ऐन ॥


- ( काव्यनिर्णय)


भेदोपभेद


भिखारीदास आचार्य मम्मट सम्मत लक्षणा के सात भेदों का विवेचन करते हैं।

हालाँकि, उन्होंने शुद्धा प्रयोजनवती के गणना प्रकार में थोड़ा विभेद भी किया है। उदाहरणतया सारोपा और साध्यवसाना की गणना उन्होंने एक साथ की है -


उपादान इक जानिये दूजि लच्छित ठान । तीजी सारोपा कहें, चौथी साध्यवसान ॥


-(काव्यनिर्णय)


लक्षण-भेदों के उदाहरणों में उन्होंने कहीं तो आचार्य मम्मट का अनुसरण किया है तो कहीं वे रीतिकालीन वातावरण के अनुरूप स्वतन्त्र उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं।

उपादान लक्षणा, लक्षित लक्षणा, सारोपा गौणी लक्षणा और साध्यवसाना गौणी लक्षणा के उदाहरण में उन्होंने आचार्य मम्मट का अनुकरण किया है, जबकि रूढ़ा लक्षणा, साध्यवसाना लक्षणा और उपादान लक्षणा में वे मौलिक उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं।


आचार्य भिखारीदास के अनुसार व्यंजना के दो भेद हैं- शाब्दी व आर्थी शाब्दी व्यंजना के भी दो भेद हैं। • अभिधामूला और लक्षणामूला।

इसी प्रकार लक्षणामूला व्यंजना के दो प्रकार हैं- गूढ़ व्यंग्या और अगूढ़ - व्यंग्या आर्थी व्यंजना के अनेक भेदों की ओर संकेत करते हुए उन्होंने लिखा है-


इन के मिलें मिले किये, भेद अनन्त लखाई।


- ( काव्यनिर्णय)


सारांशतः कहा जा सकता है कि शब्दशक्ति निरूपण में पूर्ववर्ती आचार्यों का अनुकरण करने के साथ- साथ भिखारीदास ने अपनी मौलिक चिन्तन चातुरी का भी परिचय दिया है। विशेषकर अभिधा व लक्षणा की तुलना में व्यंजना शब्दशक्ति का महत्त्व प्रदर्शन उनके मौलिक चिन्तन का प्रमाण है।