भिखारीदास दोष-निरूपण - Bhikharidas fault-finding
काव्यशास्त्रीय परम्परा में सदोष काव्य की सर्वत्र निन्दा की गई है। आचार्य भिखारीदास द्वारा रचित 'काव्यनिर्णय' के अन्तिम तीन उल्लासों (तेइसवें से पच्चीसवें उल्लास तक) में दोषों का विवेचन ध्यातव्य है जहाँ सम्बन्धित कुल 142 पद्य हैं। वैसे तो दोषों के नाम, वर्गीकरण, परिभाषा और दोष परिहार में उन्होंने प्रमुखतया 'काव्यप्रकाश' को आधार बनाया है लेकिन कहीं-कहीं वे आचार्य मम्मट सम्मत सुबोध उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं।
दोष विषयक अवधारणा
आचार्य भिखारीदास ने 'दूषन करै कुरूपता' कहकर दोष को कुरूपता जनक स्वीकार किया है।
साथ ही उन्होंने 'तेहि तजि कविताई करें, सज्जन सुमति जोई की स्थापना कर दोष को त्याज्य माना है। इस प्रकार दोष के सम्बन्ध में उन्होंने न तो पूर्ववर्ती आचार्य मम्मट के समान 'रसापकर्षत्व' की ओर संकेत किया है और न ही रस दोषों को अपेक्षाकृत प्रमुख दोष स्वीकार किया है।
दोषों के प्रकार
आचार्य मम्मट का अनुकरण करते हुए आचार्य भिखारीदास ने दोषों को मुख्यतः चार भागों (शब्दगत, वाक्यगत, अर्थगत और रसगत) में विभाजित किया है। उनके अनुसार शब्दगत,
वाक्यगत, अर्थगत और रसगत दोषों की संख्या क्रमशः 16, 17, 22 तथा 12 है। इस प्रकार उन्होंने कुल 67 प्रकार के दोषों का निरूपण किया है। हालाँकि, उन्होंने इनमें से पाँच दोष (अविमृष्टाविधेयांश, विसन्धि, दुक्रमत्व, पुनः दीप्ति और अवसर पर प्रथन) को छोड़कर अन्य 62 प्रकार के दोषों का ही विवेचन किया है।
4.4.08.3. दोषों का स्वरूप एवं दोष परिहार
दोषों के स्वरूप निर्धारण में भिखारीदास आचार्य मम्मट का अनुकरण करते हैं।
उनकी पद्यबद्ध परिभाषाएँ कहीं अधिक स्पष्ट और सुबोध हैं तो कहीं अधिक अस्पष्ट दोषों के स्वरूप निरूपण सम्बन्धी उनकी स्थापनाओं को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया जा सकता है -
(1) शब्ददोष के अन्तर्गत भिखारीदास ने 'भाषाहीन' दोष के अन्तर्गत व्याकरण की अशुद्धियों के अतिरिक्त अकारण मात्राओं और वर्णों को बदलना, घटाना अथवा बढ़ाना आदि जैसी अशुद्धियों को भी शामिल किया है। उदाहरणार्थ वैश्वानर को 'बेसंदर' अचानक को 'अचान', बचतो को 'बाँचतो' आदि ऐसे ही दोष हैं।
(ii) 'सीढ़ी सीढ़ी अर्थ गति क्लिष्ट कहावै ऐन' कहकर उन्होंने आचार्य मम्मट सम्मत क्लिष्टत्व दोष के
स्वरूप को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। (iii) अप्रतीतत्व दोष के सम्बन्ध में आचार्य भिखारीदास प्रस्तुत लक्षण 'एक हि ठौर जु कहि सुन्यो, अप्रतीत सो गाउ' आचार्य मम्मट सम्मत लक्षण 'यत्केवले शास्त्रे प्रसिद्धम्' की अपेक्षा अधिक व्यापक होते हुए भी सामान्य कोटि का है।
(iv) वाक्य दोष के अन्तर्गत 'अमतपरार्थ' दोष में उन्होंने आचार्य मम्मट की वृत्ति से प्रभावित होकर 'और
रस में राखिये, और रस की बात' कहकर रस का आधार अपेक्षाकृत सुनिश्चित कर दिया है।
वाक्य दोष निरूपण में अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय देते हुए उन्होंने प्रकमभंग दोष के तीन प्रकारों ('विधि समेत नहीं बात', 'यथसंख्य जह नहीं मिलें तथा 'नहीं एक सम बैन') का सरल व सुबोध विवेचन किया है। (v)
(vi) 'जो न नये अर्थहि धेरै अनवीकृत सु विसेखि । जानि लाटानुप्रास अरु आवृत्ति - दीपक देखि | M कहकर भिखारीदास ने लाटानुप्रास और आवृत्ति दीपक के विषय में एक स्वाभाविक व सहज शंका का समाधान प्रस्तुत करके इस दोष के स्वरूप को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।
(vii) वस्तुतः 'संदिग्ध' का आधार 'प्रश्न' नहीं होता और उसमें दो सबल पक्ष हमेशा विद्यमान रहते हैं,
लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में 'केहि कारन कामिनी लिख्यो, शिवमूरति निज गेह कहकर भिखारीदास ने संदिग्ध दोष का उदाहरण प्रस्तुत करने का अनूठा प्रयास किया है। हालाँकि, इस उदाहरण में दो सबल पक्षों से सम्बद्ध ऐसा कोई विकल्प प्रस्तुत नहीं किया गया है।
(viii) रस दोष के अन्तर्गत 'प्रकृति-विपर्यय' दोष निरूपण में भिखारीदास आचार्य मम्मट से सहमत न
होकर स्वाभाविक शंका का अपना मौलिक समाधान प्रस्तुत करते हैं-
सोक हास रति, अद्भुत हि, लीन अदिव्ये लोग । दिव्यादिव्यनि में सकति, नहीं दिव्य में योग ॥
- ( काव्यनिर्णय)
(ix) 'पुनः पुनः दीप्ति' के विषय में आचार्य मम्मट सम्मत लक्षण यानी 'अलंकारों की चकाचौंध में यह
दोष नहीं माना जाता' में अभाव की पूर्ति कवि आचार्य भिखारीदास इस प्रकार करते हैं-
पुनि पुनि दीपति ही उपमादिक कछु नाहि । ताहि ते सज्जन गर्ने, याहू दूषन मांहि ॥
दोष परिहार प्रकरण में आचार्य भिखारीदास का अवदान श्लाघनीय है। वे दस दोषों का परिहार- प्रकार इस प्रकार निरूपित करते हैं-
शब्द दोष :
अश्लीलत्व और ग्राम्यत्व
न्यून पदत्व, अधिक पदत्व और कथित पदत्व
वाक्य दोष:
अर्थ दोष :
रस दोष
प्रसिद्धिविरुद्ध और विद्याविरूद्ध
रसादि शब्दों की शब्दवाच्यता, विभाव की कष्टकल्पना, प्रतिकूलविभावादिग्रह
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