भिखारीदास रस-निरूपण - Bhikharidas Rasa-nirupana
हिन्दी की काव्यशास्त्रीय परम्परा संस्कृत काव्यशास्त्र पर आधारित है। यही कारण है कि कवि आचार्य शिक्षण- परम्परा के प्रत्येक महामना किसी-न-किसी संस्कृत आचार्य की विचार-भूमि से प्रभावित दिखाई देते हैं। भिखारीदास भी इस प्रभाव से अछूते नहीं हैं। उन पर 'साहित्यदर्पण' का प्रभाव स्पष्टतया परिलक्षित होता है। रस विषयक विवेचन में आचार्य भिखारीदास के दो ग्रन्थ 'रस-सारांश' और 'शृंगार निर्णय' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वैसे तो उनकी महत्त्वपूर्ण कृति 'काव्यनिर्णय' के चतुर्थ उल्लास में भी रस का विवेचन हुआ है। रस सम्बन्धित सम्पूर्ण विवेचन 'रस-सारांश' में उपलब्ध है, जबकि 'शृंगार निर्णय' में उन्होंने केवल शृंगार रस का ही निरूपण किया है।
स्थायीभाव, सहृदय और रस की अभिव्यक्ति
स्थायीभाव प्रत्येक सहृदय के हृदय में स्थायी रूप से विद्यमान होते हैं। आचार्य धनंजय का अनुकरण करते हुए भिखारीदास ने नाटक में प्रयोज्य शृंगारादि आठ रसों को स्वीकार किया है। हालाँकि, वे काव्य में मात्र शान्त रस की ही स्वीकृति प्रदान करते हैं। उनका मानना है कि रस की अभिव्यक्ति तभी सम्भव है, जब स्थायीभावों को विभाव, अनुभाव और संचारी भावों का संयोग प्राप्त हो जाता है। 'काव्यनिर्णय' और 'रससारांश' में उन्होंने लिखा है-
लखि विभाव अनुभाव ही, चिर थिर भावै नेकु ।
रस सामग्री जो रमै, रसै गर्ने धरि टेकु ॥
- ( काव्यनिर्णय)
जहं विभाव अनुभाव थिर चर भावन का ज्ञान। एक ठौर ही पाइये, सो रस रूप प्रमान ॥
- (रससारांश)
आचार्य भिखारीदास द्वारा प्रस्तुत स्थायीभाव, सहृदय और रस की अभिव्यक्ति निरूपण पर 'काव्यप्रकाश' तथा 'साहित्यदर्पण' का स्पष्ट प्रभाव विद्यमान है। रसाभिव्यक्ति तथा उसके विभावादि साधनों के परस्पर सम्बन्धों की व्याख्या हेतु उन्होंने एक अत्यन्त ही रोचक रूपक प्रस्तुत किया है -
जाए नृप मन के बयालीस विचारि देखो, याई विभिचारी सबै तैंतिस बखानिये ।
थाई बढि निर्जर जवानी कियौ मानस में रस कहवायो बिभिचारी संगी जानिये ।
रजधानी आलम्बन सम्पत्ति उद्यीपता को, चीन्हबै को लच्छिन को अनुभाव मानिये ।
कोउ रचै भूषन या सौं को बिना भूषन हि, कविन को तिन्हय के चितेरे पहिचानिये ॥
- (रससारांश)
भिखारीदास के अनुसार लोक में जो कारण, कार्य और सहकारी कारण हैं, वे काव्या नाटकादि में वर्णित होने पर क्रमशः विभाव, अनुभाव और संचारी भाव की संज्ञा प्राप्त करते हैं-
कारन जानि विभाव अरु, कारज है अनुभाव । व्यभिचारी तैंतीस ये, जहं तह होत सहाय ॥
- ( काव्यनिर्णय)
विभाव, अनुभाव और संचारी भाव कोस्पष्ट करते हुए उन्होंने यह विचार व्यक्त किया है कि जिसके हृदय में रस की उत्पत्ति होती है, उसे विभाव कहते हैं। आलम्बन और उद्दीपन विभाव के दो भेद हैं-
जाको रस उत्पन्न है सो विभाव उर जानि ।
आलम्बन उद्दीपनो सो द्वै विधि पहचान ॥
जिन क्रिया, वचन, चेष्टा आदि के द्वारा मानसिक विचारों का ज्ञान होता है, उन्हें अनुभाव कहते हैं। स्तम्भ, स्वेदादि आठ सात्त्विक भावों का भी अन्तः भाव अनुभाव में किया जाता है।
शृंगार रसीय नायिका के भाव, हाव, हेला आदि बीस सत्वज अलंकारों को भी उन्होंने अनुभाव की संज्ञा प्रदान की है। इस आलोक में 'रससारांश' की निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं-
उपजत जे अनुभाव ते कहूं चेष्टा ते देखि तासो सात्त्विक कहत है जिन मति अति स्वच्छ ॥
तदपि हाव हेला सकल, अनुभावहि की रीति ॥
रसिक के हृदय में जो भाव अनियमित रूप से उत्पन्न होते हैं, वे संचारी भाव कहलाते हैं। चूँकि ये सभी रसों में संचारित होते रहते हैं, अतः इन्हें व्यभिचारी भाव भी कहते हैं-
अब संचारी कहत हौ, जो सब में संचार ।
बिना नियम सब रसिक मै, उपजै न थाइ ठाइ । चर बिभचारि कहत है, अरु संचारी नाउ ॥
- (रससारांश)
रस, भाव आदि और रस वृत्तियों का निरूपण
शृंगार रस का निरूपण करते हुए आचार्य भिखारीदास ने 'प्रीति' का विशेषण 'उचित' देकर तथा शृंगार
रस के आलम्बन विभावों में राधा और कृष्ण का रूप नायक-नायिका को सर्वोत्कृष्ट मानकर प्रकारान्तर से शृंगार रस को अश्लीलता से दूर रखने का उल्लेखनीय प्रयास किया है। 'चित्त द्रवै' शब्दों द्वारा उन्होंने शृंगार रस को चित्त-दुतिकारक माधुर्य गुण से भी सम्बद्ध किया है। इस आलोक में 'काव्यनिर्णय' और 'रससारांश' में उल्लिखित निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं-
उचित प्रीत रचना वचन, सो सिंगार रस जान। सुनत प्रीति धय चित द्रवै, तब पूरन परिनाम ॥
- ( काव्यनिर्णय)
राधा राधा रमण को रस शृंगार में अंग वन्ह पर वारो कोटि रति, उन पर कोटि अनंग ॥
- (रससारांश)
शृंगार रस का भेद-निरूपण करते हुए कवि आचार्य भिखारीदास पहले तो शृंगार रस के दोनों भेदों (संयोग और वियोग ) की चर्चा करते हैं, फिर उसके दो और भेदों (सम और मिश्रित) का उल्लेख करते हैं-
शुभ संयोग वियोग मिलि है शृंगार है भाई।
काहू सम मिश्रित मिलै दीन्हों चारि गनाइ ॥
- (रससारांश)
सम और मिश्रित शृंगार को परिभाषित करते हुए उन्होंने यह मत प्रकट किया है कि जहाँ नायक अथवा नायिका का केवल संयोगात्मक अथवा केवल वियोगात्मक वर्णन किया जाए, वहाँ सम शृंगार होता है। और जहाँ संयोग में वियोग का और वियोग में संयोग का वर्णन निहित होता है वहाँ मिश्रित शृंगार की प्रतीति होती है -
संयोग ही वियोग है, वियोग ही संयोग।
करि मिश्रित शृंगार को, बरनत है सब लोग ॥
- (रससारांश)
भिखारीदास ने संयोग शृंगार के दो अन्य रूपों (सामान्य शृंगार और संयोग शृंगार) का भी उल्लेख किया है। उनके मतानुसार सामान्य शृंगार में हाव, हेला आदि सत्वज अलंकारों की सहायता से नायक-नायिका का केवल रूप चित्रण किया जाता है, जबकि संयोग शृंगार में विहारवर्णन महत्त्वपूर्ण है-
भिन्न भिन्न छवि वरनिये, सो सामान्य विचारु । मिलि बिहरै दम्पत्ति जहाँ, सो संयोग शृंगारु ॥ तदपि हाव हेला सकल, अनुभावहि की रीति । साधारण अनुभाव जहं प्रगटि चेष्टनि प्रीति ॥
- (रससारांश)
कहना गलत न होगा कि भिखारीदास ने 'रूपचित्रण' को सामान्य शृंगार की संज्ञा प्रदान कर उसे संयोग शृंगार से पृथक करने का उल्लेखनीय प्रयास किया है। साथ ही उन्होंने जन्य-जनकता के आधार पर नायक- नायिका के विहार वर्णन यानी संयोग शृंगार के दो रूपों को भी स्वीकार किया है-
उपजावै शृंगार रस निज आलम्बन दोउ । जन्य जनकता सौ कहै उदाहरण सुनि सोउ ॥
- (रससारांश)
आचार्य भिखारीदास के अनुसार वियोग शृंगार का विषय दम्पती का विरह वर्णन है। उनके मतानुसार विरह में नायक-नायिका के हृदय में अनेक प्रकार के व्यथाजन्य भाव उत्पन्न होते रहते हैं। 'रससारांश' में जहाँ उन्होंने आचार्य विश्वनाथ-सम्मत वियोग शृंगार के चार भेद (मान, पूर्वानुराग, प्रवास और करुणा हेतुक) स्वीकार किए है, वहीं दूसरी ओर 'काव्यनिर्णय' में वे आचार्य मम्मट सम्मत वियोग शृंगार के पाँच भेदों (अभिलाष, प्रवास, विरह, असूया और शाप हेतुक) का निरूपण करते हैं। हालाँकि, 'काव्यनिर्णय' में 'अभिलाष' के अतिरिक्त उन्होंने बाकी दो भेदों की व्याख्या प्रस्तुत नहीं की है। 'अभिलाष' को पूर्वानुमान का समानार्थक मानते हुए वे श्रवण अथवा दर्शन से उत्पन्न संलग्नता, मिलनोत्कण्ठा, अनुराग अथवा प्रतीति को पूर्वानुराग कहते हैं-
लगन लगै सुनही, उत्कण्ठा अधिकार । पूरब राग अनुराग घन होत हिये दुख आइ ॥
- (रससारांश)
सुनै लखे जहं दंपतिहि उपजै प्रीति सुभाव । अभिलाष कोउ कहै, कोड पूरब अनुराग ॥
- ( काव्यनिर्णय)
पूर्वानुराग के दोनों माध्यमों 'श्रवण' और 'दर्शन' में से भिखारीदास ने 'दर्शन' नामक माध्यम के पाँच साधनों (प्रत्यक्ष, स्वप्न, छाया, माया और चित्र ) का उल्लेख किया है जिसमें माया के अतिरिक्त शेष चारों साधन आचार्य विश्वनाथ सम्मत हैं-
दृष्टि श्रुती द्वै भाँति के दरशन जानो मित्र । दृष्टि दरश पूरतछ सपन, छाया माया चित्र ॥
- (शृंगारनिर्णय)
विदेश गमनजनित विरह को आचार्य भिखारीदास ने प्रवास विप्रलम्भ की संज्ञा प्रदान की है। हालांकि, अभिलाष आदि दश दशाओं को उन्होंने 'पूर्वानुराग' और 'प्रवास' दोनों से सम्बद्ध कर दिया है। आगे इसी सन्दर्भ में करुण विप्रलम्भ व करुण रस में विभेद करते हुए वे कहते हैं कि करुण विप्रलम्भ का परिणाम निराशाजन्य ग्लानि से उद्भूत मरने की इच्छा है। वैसे तो करुण रस में भी मुख्यतः मरने की इच्छा बनी रहती है, लेकिन इसे करुण रस का विषय नहीं मान सकते। इस प्रसंग में आचार्य विश्वनाथ का अनुसरण करते हुए भिखारीदास ने व्यक्त किया है। कि करुण-विप्रलम्भ में नायक-नायिका में से एक का देहावसान होने पर भी किसी कारणवश इसी जन्म में पुनर्मिलन की आशा बनी रहती है, जबकि करुण रस में ऐसा नहीं है।
शृंगारेतर रस निरूपण में भिखारीदास ने अपने ग्रन्थ 'रससारांश' में करुण रस, वीर रस, अद्भुत रस, रौद्र रस वीभत्स रस, भयानक रस और शान्त रस का उल्लेख किया है। कतिपय उदाहरण प्रस्तुत हैं-
व्यंग बचन भ्रम आदि है, बहु विभाव है जासु। ख्याल स्वांग अनुभव तरक, हंसि तो थाई हासु ॥
- (हास्य रस)
हित दुःख विपति विभाव, करुना बरनै लोक । भूमि-पतन विलपन स्वसन, अनुभाव थाई शोक ॥
- (करुण रस)
जानो वीर विभाव पै, सत्य, दया, रन दानु । अनुभव टेक और सूरता, उत्सह थाई जानु ॥
- (वीर रा
नयी बात को पाइयो, अति बिभाव छवि चित्र । अद्भुत अनुभव थाकियो, बिस्मै थाइ मित्र ॥
- (रस)
अहसन बैर विभाव जह, थाइ कोप समुद्र । अरुन अधरन दरन, अनुभव ये रस रुद्र ॥
- ( रौद्र रस)
थाइ घिनै विभाव जहं, घिन मै वस्तु अस्वच्छ । बिरचि निंद मुख मंदिबो अनुभव रस बिभत्स ।
- ( वीभत्स रस)
बात विभाव भयावनी, भौ है थाइ भाव । सुखि जैबो अनुभाव तै, सुरस भयानक ठाव ॥
- (भयानक रस)
देव कृपा सज्जन मिलन तत्त्व ज्ञान उपदेश तीरथ विभाव सम ..... 1 थाई सांत सुदेश ॥
क्षमा सत्य वैराग्य स्थिति धर्म कथा में चाउ । देव प्रणति स्तुति विनय, गुनो सांत अनुभाव ॥
- ( शान्त रस )
भाव, रसाभास आदि की गणना में भिखारीदास आचार्य विश्वनाथ का अनुगमन करते हैं । उन्होंने 'रससारांश' में भाव प्रकरण के अन्तर्गत स्वकीया तथा परकीया नायिकाओं और अनुकूलन नायक सम्बन्धी उदाहरण प्रस्तुत करके प्रकारान्तर से प्रधानतः व्यंजित विभाव को भी 'भाव' नाम से अभिहित किया है। रसाभास और भावाभास का जो स्वरूप उन्होंने प्रस्तुत किया है, वह भी आचार्य मम्मट, विश्वनाथ आदि सम्मत है-
रस सों भासत होतु है, जहाँ न रस की बात । रसाभास ताको कहै, जैहै मति अवदात ॥
- (रससारांश)
भाव जु अनुचित ठौर है, सोई भावाभास |
(काव्यनिर्णय)
भिखारीदास के मतानुसार प्रत्येक रचना में रसों और भावादिकों के पारस्परिक अथवा एक दूसरे के प्रति मिश्रणों में से कोई-न-कोई मिश्रण अवश्य पाया जाता है। अतः यद्यपि यह निश्चय कर पाना अथवा समझ सकना कि अमुक रचना में कौन-सा रस अथवा भावादि प्रधान है, और अमुक रचना में कौन-सा अत्यन्त कठिन है, लेकिन फिर भी साहित्य के पारखी यह विवेक कर ही लेते हैं-
भाव भाव रस रस मिले, त्यों-त्यों धरिये नाम ।
बुद्धि बल जान्यो परत नहि समुझेये को काम ॥
जिहि लक्षण को पाइये, जहाँ कछू अधिकार ।
वाही को वह कबित है, वरणत बुद्धि उदार ॥
- (रधारांश)
हिन्दी रीतिकालीन आचार्यों में सबसे पहले आचार्य केशवदास ने रसवृत्तियों का उल्लेख किया है। रस प्रकरण में रस-वृत्तियों की चर्चा भिखारीदास ने निम्नलिखित ढंग से की है-
कौसिकी
करुण, हास्य और शृंगार
सात्विकी
वीर, हास्य शृंगार, अदभुत और शान्त
आरभटी
भय, वीभत्स और रौद्र
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