प्रगतिशील कविता का संक्षिप्त परिचय - Brief Introduction to Progressive Poetry

सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि हिन्दी साहित्य के आधुनिककाल में छायावादी साहित्य आन्दोलन के बाद वस्तुपरक सामाजिक चेतना एवं यथार्थवादी दृष्टिकोण से सम्पृक्त जिस सशक्त साहित्य आन्दोलन की शुरुआत होती है, उसे प्रगतिवाद के नाम से जाना जाता है। साहित्य के क्षेत्र में प्रगतिवाद वस्तुतः एक विचारधारा का सूचक है, जिसका सीधा सम्बन्ध मार्क्सवादी विचारधारा से है। हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में इसे प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के साथ जोड़कर देखा जाता है, जिसका पहला अधिवेशन लखनऊ में सन् 1936 ई. में हुआ था। प्रगतिशील लेखक संघ के उस ऐतिहासिक मंच से अपने अध्यक्षीय भाषण में मुंशी प्रेमचंद ने भारतीय लेखकों से साहित्य की सौन्दर्य दृष्टि में आवश्यक रूप से बदलाव का आह्वान किया था। उनका आग्रह था कि "हमारी कसौटी पर केवल वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिन्तन हो,

स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।" प्रगतिशील कवियों की पंक्ति में सदैव अग्रणी रहने वाले बाबा नागार्जुन को 25 सितंबर 1949 ई. को आयोजित 'प्रलेस' के इलाहाबाद सम्मेलन में अध्यक्ष बनाया गया था और उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों से आये लेखकों को सम्बोधित करते हुए जनतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा और जनता के हित में जुटे रहने का आह्वान किया था "साथियो ! हम शासक- - शोषक वर्ग के पिछलगुआ, जी हुजूर, चाटुकार लेखक नहीं हैं। हम बिड़ला-टाटा-डालमिया के चाकर नहीं हैं। हम नेहरू और पटेल की थाप पर थिरकने ठमकने वाले आर्टिस्ट नहीं हैं।

सर्वसाधारण जनता को हम अपनी अधिस्वामिनी समझते हैं। हमारी सारी प्रेरणाओं और कल्पनाओं का मूल श्रोत वही है।" इन बारह-तेरह वर्षों में हिन्दी की प्रगतिशील कविता ने हिन्दी साहित्य को जनता के पक्ष में खड़े होने का अदम्य साहस से युक्त किया। तदनन्तर प्रगतिशील साहित्य और उसके स्वरूप पर गहन विचार-विमर्श प्रारम्भ होता है। उनमें से कुछ विद्वानों के विचार प्रस्तुत हैं -


प्रगतिशील आन्दोलन की शुरुआत के सन्दर्भ में डॉ. शिवकुमार मिश्र इसे न तो अचानक घटी घटना मानते हैं और न ही इसे विदेशी सिद्धान्तों का आयात या फिर प्रभाव मात्र स्वीकार करते हैं,

बल्कि वे इस साहित्य आन्दोलन की पृष्ठभूमि में विद्यमान युग-जीवन की सत्यता को ज्यादा महत्त्व देते हैं। उनके अनुसार " प्रगतिवाद - कोई आकस्मिक अथवा अनहोनी घटना न थी, उसके पीछे वह सच्चाई थी, जिसका युगजीवन से सीधा सम्बन्ध था। बहुधा ही मार्क्सवादी समाजवादी आधार को देखकर उसे विदेशी विचारधारा या आन्दोलन कहकर उससे छुट्टी पा लेने का उपक्रम किया जाता है, किन्तु तत्कालीन परिस्थितियों के सन्दर्भ में इस प्रकार के विचार की निस्सारता आप से आप स्पष्ट हो जाती है।"


प्रेमचंद भी इस प्रकार के आरोप मढ़ने वालों की भर्त्सना करते थे "यह सभ्यता अमुक देश की समाज- - रचना अथवा धर्म-मजहब से मेल नहीं खाती या उस वातावरण के अनुकूल नहीं है यह तर्क नितान्त असंगत है ।

- छोटी-छोटी बातों में अन्तर हो सकता है, पर मूल स्वरूप की दृष्टि से सम्पूर्ण मानव जाति में कोई भेद नहीं है। जो शासन विधान या समाज व्यवस्था एक देश के लिए कल्याणकारी है, वह दूसरे देश के लिए भी हितकर होगी।" वे साम्राज्यवादी ताकतों के साथ-साथ देशी सामन्तवादी, शोषक एवं महाजनी सभ्यता के चतुर चालों को भी भली- भाँति समझते थे और कड़े शब्दों में उसकी निन्दा भी करते थे।


रामविलास शर्मा प्रगतिवादी साहित्य की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते थे कि यह साहित्य इसलिए भी ज़रूरी था क्योंकि "हम अपने साहित्य को ऐसी विचारधारा के असर से बचाएँ, जो साम्राज्यवाद और सामन्तवाद से समझौता करना सिखाती है।"


प्रगतिशील साहित्य के फ़लक को अपेक्षाकृत विस्तृत करते हुए उन्हीं के समकालीन शिवदानसिंह चौहान यह मानते थे कि "प्रगतिशील साहित्य से मतलब उस साहित्य से है जो समाज को आगे बढ़ाता है, मनुष्य के विकास में सहायक होता है। प्रगतिशील साहित्य भारतीय जनता की सांस्कृतिक विरासत का ऐतिहासिक विकास है। यह स्वाधीनता, शान्ति और जनतन्त्र का साहित्य है। "


उपर्युक्त परिभाषाओं के आलोक में देखा जाए तो प्रगतिशील साहित्य मार्क्सवादी सिद्धान्तों से प्रेरित होते हुए भी मानवतावाद, समाजवाद और सामान्य जनों की पीड़ा को व्यक्त करने वाला साहित्य है,

जिसका फ़लक इतना व्यापक है कि उसमें वैश्विक परिवर्तनों के साथ-साथ देश के प्रत्येक समाज, वर्ग, जाति और जन-जन को समाहित करने की क्षमता विद्यमान है। राष्ट्रीय स्तर पर हर प्रदेश, वर्ग, जाति जब गुलामी से मुक्ति के लिए संघर्षरत था, तब उस समय साहित्य के सन्दर्भ में सफाई देने की ज़रूरत इसलिए भी थी, क्योंकि आलोचना के क्षेत्र में सबसे जोर-शोर से उठने वाला निर्णयात्मक प्रश्न था "साहित्य किसके लिए !" अर्थात् मानव जीवन में उसकी क्या भूमिका है? प्रगतिशील साहित्य का समर्थन करते हुए कथासम्राट् प्रेमचंद ने स्पष्ट शब्दों में यह कहा था कि "वह मानवता, दिव्यता और भद्रता का बाना बाँधे होता है। जो दलित है, पीड़ित है, वंचित है चाहे वह व्यक्ति हो या समूह उसकी हिमायत और वकालत करना उसका फर्ज है।

उसकी अदालत समाज है और इसी अदालत के सामने वह अपना इस्तगाशा पेश करता है।" प्रगतिशील दृष्टि से किसी भी साहित्य की श्रेष्ठता का महत्त्वपूर्ण आधार यह है कि वह अपने समय की वास्तविकता को, उसकी सम्पूर्णता के साथ चित्रित कर पाया है या नहीं ? उसने समाज में संघर्षरत प्रगतिवादी और प्रतिक्रियावादी शक्तियों को पहचाना है या नहीं ? उसकी यथार्थ दृष्टि वर्तमान तक ही सीमित है या वह इतनी व्यापक है कि वर्तमान को अतीत और भविष्य के साथ किसी तर्कसंगत पद्धत्ति से जोड़कर देख सकती है ? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर में प्रगतिवादी साहित्यकारों ने 'साहित्य समाज के लिए', 'साहित्य जनता के लिए' जैसा लोक-कल्याणकारी नारा दिया।


कई बार प्रगतिवाद और प्रगतिशील साहित्य के बीच अन्तर का प्रश्न भी उठाया जाता है। प्रसिद्ध आलोचक शिवदानसिंह चौहान 'प्रगतिवाद' शब्द को 'मार्क्सवादी सौन्दर्य-सिद्धान्त' का पर्याय मानते हैं, जबकि प्रगतिशील कविता के पीछे वे किसी दार्शनिक विचारधारा की प्रबल आग्रह को स्वीकार नहीं करते। उनकी दृष्टि में "प्रगतिशील कवि गाँधीवादी भी हो सकता है, मार्क्सवादी भी और द्वैत-अद्वैतवादी भी। जो साहित्य पाठक (समाज) को स्वस्थ प्रेरणा देता है, व्यक्ति को असामाजिक और मानव द्रोही नहीं बनाता, जीवन-संग्राम में आगे बढ़ने का बल और साहस देता है और मनुष्य की चेतना को गहरा, व्यापक और मानवीय बनाता है, हिंसा और द्वेष को नहीं बढ़ाता ... जिसमें कला-सौष्ठव और गहराई है,

वह सब प्रगतिशील है।" लेकिन दूसरे आलोचक यह मानते हैं कि इनमें कोई बुनियादी अन्तर नहीं है। इस तथ्य को डॉ. नामवर सिंह ने बहुत अच्छी तरह रेखांकित किया है- "जिस तरह छायावादी कविता और छायावाद भिन्न नहीं है, उसी तरह प्रगतिवाद और प्रगतिशील साहित्य भी भिन्न नहीं हैं। 'वाद' की अपेक्षा 'शील' को अधिक अच्छा और उदार समझकर इन दो में भेद करना कोरा बुद्धिविलास है।" इस पाठ सामग्री के शीर्षक निर्धारण के क्रम में भी इस बात का ध्यान रखा गया है कि इनमें कोई भेद नहीं है। यहाँ हिन्दी की प्रगतिशील कविता उस रचनात्मक दायित्व बोध से सम्बद्ध हैं, जो वर्गीय विषमता से ग्रस्त समाज में शोषित उत्पीड़ित,

मजबू किसान और अभावग्रस्त वर्गों को समाजिक, राजनैतिक, आर्थिक मुक्ति से लेकर अज्ञानता के अन्धकार से छुटकारा दिलाने का निरन्तर प्रयास करता है। इस दृष्टि से हिन्दी प्रगतिशील साहित्य एक ऐसा आन्दोलन है, जो समाज को सभी दृष्टियों से गतिशील, परिवर्तनशील और जीवन्त बनाए रखता है। मोटे तौर पर हिन्दी साहित्य में 1930-35 ई. से लेकर अब तक इस प्रगतिशील कविता की अविरल धारा निरन्तर प्रवाहित हो रही है एवं निसन्देह आगे भी जारी रहेगी।


यह बिल्कुल सच है कि आजादी के विगत छह दशकों में जागरूकता के तमाम हवा-हवाई घोषणाओं के बावजूद जनसामान्य के मूल जीवन में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है।

दम घोटू बेरोजगारी के समानान्तर निरन्तर बढ़ती महँगाई ने आम लोगों की कमर तोड़ डाली है। गुलामी के समय जितनी बेचैनी और दुराशा लोगों में थी, उससे कहीं अधिक ये भावनाएँ आजादी के बाद प्रबल हुई हैं। गाँव-देहात से लेकर मेट्रो शहरों तक के लोग सिर्फ़ सरकार और प्रशासन से अधिक अपेक्षाएँ रखते हैं और बाज़ार के कुचक्र एवं भ्रष्टाचार के दलदल में आकण्ठ फँसे प्रशासन से जब उन्हें राहत की उम्मीद नहीं दिखाई देती तब उनकी बेचैनी और भी उग्र हो उठती है। पूरे देश में असंतुलन और अघोषित शोषण का कहर जारी है, किन्तु अज्ञानता के कारण क्या करें, क्या न करें वाली स्थिति पैदा हो गई है। इस अज्ञानता का मूल कारण है लोगों में शिक्षा का अभाव।

वस्तुतः अज्ञानता से गरीबी बढ़ती है और गरीबी से अशिक्षा निरन्तर बनी रहती है। भारतीय समाज का यह विषमचक्र टूट नहीं पा रहा है। अपने पूर्ववर्ती प्रगतिशील कवियों की तरह बाद के प्रगतिशील विचारधारा से अनुप्राणित रचनाकारों ने भी भारतीय समाज के इसी नितान्त जटिल एवं कड़वे सच को अपनी रचनाओं का उपजीव्य बनाया। उनकी रचनाओं में पिछड़े भारतीय सामन्ती समाज का सड़ांध और घुटन के समानान्तर निरन्तर बदलते घोर संघर्ष और धारदार होती नयी चेतना का संश्लिष्ट रूप तो व्यक्त हुआ ही है, साथ ही उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से अनपढ़ और नासमझ आम जनता को जड़ एवं अमानवीय व्यवस्थाओं पर जोरदार हमला करने का नया तेवर भी प्रदान किया।

आज हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहाँ मानवीय संवेदनाएँ विरल होती जा रही हैं और आभासी दुनिया में ही सारे परिवर्तनों को सफल बना देने का कोरा ढोंग किया जा रहा है। सत्ता, बाज़ार और मीडिया को अपने अधीन करके फासीवादी शक्तियाँ अपेक्षाकृत ज्यादा प्रचण्ड रूप धारण कर चुकी हैं। जाहिर है चुनौती ज्यादा विकट है किन्तु ऐसे में प्रगतिशील विचारों की ज्यादा आवश्यकता महसूस की जा रही है।