बौद्ध साधना पद्धत्ति - buddhist practice

आधुनिक कला से इस कविता के अलग होने का सबसे बड़ा प्रमाण तब मिलता है जब अन्त में अज्ञेय इस कविता का समाहार करते हैं। कविता को समेटते हुए वे इसके आध्यात्मिक आधार और वीणा की वादन- प्रक्रिया का सारांश प्रस्तुत कर देते हैं। प्रियंवद केशकम्बली राजा के पुरस्कार को अस्वीकार करता है और उसका यह अस्वीकार कोरी विनम्रता नहीं है बल्कि वह जानता है कि ध्यान-साधना में रहते हुए वीणा का वादन उसने नहीं किया है। इसीलिए वह कहता है-


श्रेय नहीं कुछ मेरा :


मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में-


सब कुछ को सौंप दिया था-


वीणा के माध्यम से अपने को मैंने सुना आपने जो वह मेरा नहीं, वह तो सब कुछ की तथता थी


न वीणा का था:


महाशून्य


वह महामौन


अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय


जो शब्दहीन


सबमें गाता है।


असाध्य वीणा के कुछ टीकाकारों ने इन पंक्तियों को अर्थहीन माना है जबकि इस पाठ के हिसाब से ये पंक्तियाँ इस कविता में वीणावादन की समूची प्रक्रिया का सारांश हैं।

इन पंक्तियों के माध्यम से प्रियंवद केशकम्बली अपनी ध्यान और साधना की पद्धत्ति का खुलासा करता है जिसकी वजह से वीणा का बजना सम्भव हुआ है। वह कहता है कि मेरा तो कोई श्रेय है ही नहीं क्योंकि में कर्त्ता नहीं हूँ अर्थात् वीणा का वादक नहीं हूँ। कर्त्ता होने के भाव का लोप होना दरअसल अहम् का विलयन है जिसका संकेत शुरू में किया जा चुका है। केशकम्बली यह मानता है कि वह वीणा का वादक नहीं है सिर्फ़ माध्यम है। ऐसा मानते हुए वह अपनी इयत्ता या अस्मिता को जगत् के जीवन प्रवाह में विलीन कर देता है।

इसी बात को कविता में रूपायित करने के लिए अज्ञेय किरीटी तरु के सहारे सृष्टि के समूचे जीवन प्रवाह का स्मरण केशकम्बली को कराते हैं। दरअसल किरीटी तरु के माध्यम से जीवन प्रवाह का स्मरण करना ही अपने अहम् का विलयन करना और ध्यान में उतरने का प्रारम्भिक चरण है। तभी तो प्रियंवद कहता है कि "वीणा के माध्यम से अपने को मैंने सब कुछ को सौंप दिया था।" वह राजा से कहता है कि आपने जो अलौकिक संगीत सुना वह मेरा या वीणा का नहीं था वह तो सब कुछ की तथता थी अर्थात् इस सृष्टि के जीवन प्रवाह का था ।

तथता (सचनेस) अर्थात् सृष्टि का प्रवाह जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार करना । अर्थात् जीवन प्रवाह को स्वीकार करना। कर्त्ता होने के भाव से उस जीवन प्रवाह में हस्तक्षेप करने की कोशिश न करना अपितु साक्षी भाव से उस जीवन प्रवाह को बस देखना साक्षी भाव से देखना अर्थात् 1 तटस्थ होकर देखना। उस जीवन प्रवाह में रहते हुए भी फल के व्यापार में शामिल न होना, बस एक बिन्दु से सब कुछ को घटते हुए देखना। यह साधना और ध्यान की चरमावस्था होती है जब व्यक्ति को लगता है कि वह शरीर से अलग है और वह इस जीवन प्रवाह का हिस्सा है।

उसके भीतर और कुछ नहीं है सिर्फ़ शून्य है। इस जीवन- प्रवाह के अतिरिक्त कहीं कुछ नहीं है। जीवन प्रवाह ही महत्त्वपूर्ण है जो सतत परिवर्तनशील है। अतः हम जिस क्षण से उस जीवन प्रवाह को देखते हैं बस वही अस्तित्व में है और सिर्फ़ वही सत्य है और बाकी सिर्फ़ शून्य है । अतः ध्यान में होना हर क्षण वर्तमान में होना है। इसी से उस अलौकिक आनन्द की सृष्टि होती है। कहना न होगा कि साधना और ध्यान की यह पद्धत्ति बौद्ध साधना की पद्धत्ति है। 'असाध्य वीणा' शीर्षक यह पूरी कविता इसी बौद्ध साधना पद्धत्ति पर आधारित है। यह महाशून्य और महामौन भी और कुछ नहीं प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन का शून्यवाद है। लेकिन आधुनिक युग में इस ध्यान-साधना वाली कला परम्परा को भुला दिया गया है। कला के आध्यात्मिक आयाम से सर्जकों और आलोचकों का ध्यान हट गया।

इस युग में ध्यानी और साधक बनने वाले लोग नहीं रहे। इसीलिए अन्तिम पंक्तियों में कवि कहता है कि युग पलट गया यानी आधुनिक समय आ गया। और इस युग की इहलौकिकता के सामने ध्यानियों और साधकों और उनकी साधना का कोई महत्त्व नहीं रहा । इसीलिए अज्ञेय कहते हैं इस बदले हुए युग में कला और ध्यान-साधना के बीच सम्बन्ध की खोज करने वाली उनकी वाणी भी मौन हुई। इस तरह असाध्य वीणा के कवि अज्ञेय हमारे सामने एक ऐसे कवि के रूप में आते हैं जो आधुनिकता को अपनी परम्परा में उपलब्ध करता है। वह इतना सयाना है कि पश्चिम प्रेरित आधुनिकता की आँधी में उड़ने के बजाय देशज आधुनिकता का मार्ग प्रशस्त करता है वह आधुनिकता जो मानवीय चेतना के विस्तार को सिर्फ़ इहलौकिकता और भौतिकता तक ही सीमित नहीं है।