आचार्य चिन्तामणि के गुण-निरूपण - Characteristics of Acharya Chintamani

आचार्य चिन्तामणि के गुण-निरूपण का आधार-ग्रन्थ 'काव्यप्रकाश' है। हालांकि, सन्दर्भानुसार उन्होंने 'साहित्यदर्पण' का भी आश्रय लिया है। एक तरह से हिन्दी जगत को आचार्य मम्मट सम्मत गुण-स्वरूप से अवगत कराने का श्रेय भी आचार्य चिन्तामणि को दिया जा सकता है। आवश्यकतानुकूल स्थान-स्थान पर वे अपनी मौलिकता स्थापनाएँ भी करते हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने 'माधुर्य' को सबसे पहले कवित्त का तत्त्व कहा है। इतना ही नहीं, 'उदारता' में अर्थचारुता, और 'अर्थव्यक्ति' में अलंक्रियता के समावेश का निरूपण सर्वप्रथम उन्होंने ही किया है। अपनी कृति 'कविकुलकल्पतरु' के प्रथम प्रकरण में गुण निरूपण करते हुए उन्होंने उसे चार भागों में विभक्त किया गुण और अलंकार की वास्तविक स्थिति,

रस के धर्म: गुणों का स्वरूप, वर्णादि के धर्म गुणों का स्वरूप तथा वामन सम्मत शब्दगत और अर्थगत गुणों का स्वरूप और उसका खण्डन ।


गुण-विषयक अवधारणा


आचार्य चिन्तामणि का गुण विषयक दृष्टिकोण आचार्य आनन्दवर्द्धन और आचार्य मम्मट के विचारों से अभिप्रेरित प्रतीत होता है। अपने ग्रन्थ 'कविकुलकल्पतरु' में गुणविषयक उनकी अवधारणाएँ इस प्रकार हैं-


(i) जिस तरह शूरता आदि गुण आत्माके धर्म हैं, ठीक उसी प्रकार माधुर्य आदि गुण भी रस के अचल धर्म हैं-


जे रस आगे घरम ते गुन वरने जात ।


आतम के ज्यों सूरतादिक निश्चल अवपात ।।


(ii) जिस शूरता आदि गुण उपचार से शरीर के धर्म भी मान लिए जाते हैं, ठीक उसी तरह माधुर्यादि गुण शब्दार्थ के भी धर्म हैं-


शब्द अर्थ में लक्षना ते गुन की स्थिति जान ।


iii) उनकी व्यंजकता विशिष्ट वर्ण समुदाय, समास और रचना से होती है-


रचना वरन समास ये गुण के बिंजक जानि ।


(iv) भरत, दण्डी और वामन ने दस गुण स्वीकार किए जबकि आनन्दवर्द्धन, मम्मट आदि नव्य आचार्यों ने तीन गुण आचार्य चिन्तामणि नव्य आचार्यों के विचारों से सहमत हैं।


मम्मट सम्मत गुण


चिन्तामणिगुण-निरूपण में मम्मट आदि नव्याचार्यों से अभिप्रेरित हैं। मम्मट सम्मत गुण यानी रसगत गुण, वर्णादिगत गुण तथा ओज व प्रसाद गुण का विवेचन उन्होंने पूर्ण मनोयोग से किया है।


रसगत गुण


आचार्य मम्मट के विचार में माधुर्य गुण संयोग शृंगार, करुण, विप्रलम्भ शृंगार और शान्त रस के उत्तरोत्तर आधिक्य से 'दुति' नामक चित्तवृत्ति का उत्पादक है,

तथा ओज गुण वीर, वीभत्स और रौद्र रसों में उत्तरोत्तर अधिकता से दीप्ति यानी आत्मविस्मृति नामक चित्तवृत्ति का । चिन्तामणि आचार्य मम्मट सम्मत इस अवधारणा से पूरी तरह सहमत हैं। 'कविकुलकल्पतरु' की निम्नलिखित पंक्तियाँ देखिए-


जो संयोग शृंगार में सुखद द्रवावै चित्त ।


सो माधुर्य बखानिये यह ई तत्त्व कवित्त ॥


सो संयोग सिंगारते करुण मध्य अधिकाइ । विप्रलम्भ अरु सांत रस तामें अधिक बनाइ ॥ दीप्त चित्त विस्तार को हेतु वोज गुन जानि । सुतौ वीर वीभत्स अरु रौद्र क्रमाधिक मानि ॥


आचार्य चिन्तामणि माधुर्य गुण को कविता के तत्त्व के रूप में स्थापित करते हैं। ओजगुण के परिप्रेक्ष्य में उनकी प्रबल धारणा है कि किसी भी रचना में रस चाहे कोई भी क्यों न हो, चित्त की व्याप्ति हो जाने की दशा में वहाँ प्रसाद गुण की भी स्वीकृति होगी-


सूखे ईंधन आग ज्यों स्वच्छ नीर की रीति । झलके अक्षर अर्थ जो प्रसाद गुण नीति ॥



(ii) वर्णादिगत गुण


आचार्य मम्मट का अनुकरण करते हुए चिन्तामणि ने तीनों गुणों के उपचार से शब्द (वर्ण, रचना और समास) को भी धर्म स्वीकार किया है।

उनके मतानुसार माधुर्य गुण में अल्प समास अथवा मध्य समास अपेक्षित है और रचना मधुर लेकिन ओज गुण में दीर्घ समास होना चाहिए और रचना उद्धत यानी विकट -


मृदु समास माधुर्य की घटना में जु निसर्ग । संजोगी उद्धत वरन जो पुनि दिग्धसमास ॥


ऐसी रचना करत हैं, सुनतहिं वोज प्रकास ॥


आचार्य मम्मट के मतानुसार 'ट' वर्ग को छोड़कर शेष स्पर्श वर्णों से पूर्व पंचम वर्णों से संयुक्ताक्षर माधुर्य गुण के व्यंजक वर्ण हैं, लेकिन आचार्य चिन्तामणि ने इन्हें इस रूप में प्रस्तुत किया है-


अनुस्वार जुत वरन जिति सबै वर्ग अ टवर्ग ।


(iii) ओज व प्रसाद गुण


चिन्तामणि ने आचार्य मम्मट सम्मत ओज गुण के व्यंजक वर्णों की सूची को ज्यों का त्यों अपनाया है। ये वर्ण हैं- वर्गों के प्रथम द्वितीय तथा तृतीय चतुर्थ वर्णों के संयुक्ताक्षर यथा क्ख, ग्घ आदि रकार आदि का - अथवा अन्त में संयोग, यथा- र्क क्र आदि श, ष और टवर्ग । 'कविकुलकल्पतरु' की निम्नलिखित पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-


वरगन मै जो आदि अरु तीजो आखर कोई। तिन सों योग दुतीय अरु चौथे कौ जो होइ ॥ रेफ जोग सब ठौर जो तुल्य वरन जुग जोय । शव ट वरग दीरध करत जे समास कवि लोग |


प्रसाद गुण में भी वे आचार्य मम्मट का पूर्णतः अनुकरण करते प्रतीत होते हैं-


जामहि सुनतहिं पदन के अर्थ बोध मन हो । सो प्रसाद वरनादि रहि साधारन सब जोइ ॥


वामन सम्मत गुण


आचार्य चिन्तामणि ने वामन सम्मत गुणों के स्वरूप निर्धारण और उनके खण्डन में आचार्य मम्मट का अनुकरण किया है। हालाँकि, कतिपय उदाहरणों को छोड़कर शेष उदाहरण रीतिकालीन वातावरण से ओत-प्रोत उनके अपने प्रतीत होते हैं।

वामन सम्मत गुण के विवेचनार्थ कतिपय महत्त्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-


(1) वामन सम्मत गुणनिरूपित करते समय चिन्तामणि आचार्य दण्डी की बजाय आचार्य वामन का ही उद्धरण प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण प्रस्तुत है-


ए वैदर्भी रीति के प्रानद सो गुन मानि।


(ii) वामन सम्मत शब्द गुणों के स्वरूप निर्धारण में उन्होंने प्रायः आचार्य मम्मट का अनुकरण किया है। कतिपय उदाहरण प्रस्तुत हैं-


बहुत पदन को एक पद समझो है आभास । ताको कहत सलेष गुन सिथिल निबन्ध विलास ॥


- (श्लेष)


जहाँ नृत्य सो करत पद सो उदारता जानि । अर्थ चारुता सहित सो अति मंजुल पहिचानी ॥


- (उदारता


खोज विमिश्रित सिथिल पद यह प्रदास है कोई। अर्थव्यक्ति जहं उल्लसत वही प्रसादो होइ ॥


- (अर्थव्यक्ति)


अर्थ प्रौढ़ मै जहं कहत दोष बखन्यौ जात। कहुं प्रबद्धन मै जु मग एकै कहा सुहात ॥


- (समता)



जहाँ समता सो पदनि में बद्ध बद्ध-नुप्रास । शब्दअ अलंकारन विषे तिनुको प्रकट प्रकास ॥


- (समता)


(iii) वामन सम्मत दस अर्थ गुणों को भी आचार्य चिन्तामणि ने आचार्य मम्मट के अनुसार ही प्रस्तुत किया है। उदाहरण देखिए-


क्रम कोटिल्य जो अनुवण उपपति योग की जुक्ति । जो घटना यह अर्थ की तह स्लेष की उक्ति ॥


- (श्लेष)


या विधि के विचित्र्य में अलंकार कछु होइ। ए जो वरनत अर्थ गुन समुझौ सुनौ न कोई ॥


- (ओज)


(iv) चिन्तामणि ने आचार्य मम्मट के खण्डानुसार वामन सम्मत अर्थगत गुणों को भी अस्वीकृत किया है। तथा 'समता' गुण के प्रसंग में आचार्य विश्वनाथ से सहायता प्राप्तकी है। (v) चिन्तामणि की शैली पूर्ववर्ती काव्यशास्त्रियों के समान संक्षिप्त और सम्बद्ध न होकर विस्तृत है।