आचार्य देव का गुण-निरूपण - characterization of Acharya Dev
संस्कृत काव्यशास्त्र में गुण निरूपण में पर्याप्त वैविध्य है। यथा कभी गुण और अलंकार में सर्वथा अभेद स्वीकार किया गया तो कभी दोनों में नाम मात्र का अन्तर स्वीकार किया गया। हिन्दी काव्य शिक्षण-परम्परा में आचार्य कुलपति से आचार्य सोमनाथ तक के कालखण्ड में आचार्य देव का गुण-निरूपण रेखांकनीय है। उन्होंने अपने रीतिनिरूपक ग्रन्थ 'शब्द रसायन' में गुण विषयक महत्त्वपूर्ण विवेचन किया है।
देव ने नव्य आचार्यों द्वारा निरूपित केवल माधुर्यादि गुणों को न अपनाकर आचार्य दण्डी सम्मत माधुर्यादि दस गुणों को अपनाया है। साथ ही उन्होंने लगभग सभी गुणों का स्वरूप भी उन्हीं के अनुरूप निर्धारित किया है।
देव विवेचित गुण-निरूपण को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत सूचीबद्ध किया जा सकता है-
(1) आचार्य देव ने गुण को काव्य का एक अनिवार्य अंग स्वीकार किया है। उनकी प्रबल धारणा है कि गुणरहित काव्य आनन्ददायक नहीं हो सकता है।
(ii) उन्होंने आचार्य वामन और आचार्य मम्मट सम्मत गुण- प्रकरण का निरूपण करने की बजाय आचार्य
दण्डी सम्मत गुणों का विवेचन किया है। (ii) देव ने 'गुण' को 'रीति' नाम से अभिहित किया है।
'विशिष्टपदरचना रीतिः विशेषो गुणात्मा' के अनुसार गुण और रीति में आधार - आधेय सम्बन्ध होने के कारण ये दोनों प्रकारान्तर से पर्याय
स्वीकार किए जा सकते हैं। देव ने बारह गुणों को सम्मति प्रदान की है।
(iv) अपने गुण- प्रकरण के अन्तर्गत आचार्य दण्डी माधुर्य के गुण प्रसंग में अनुप्रास और यमक अलंकारों की भी विवेचना करते हैं। लेकिन देव ने यमक और अनुप्रास जैसे शब्दालंकारों को भी गुण मान लिया है।
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