काव्य का वर्गीय आधार - class basis of poetry
कविता के वर्गीय आधार पर मुक्तिबोध ने पर्याप्त विस्तार से अपने विचार अभिव्यक्त किये हैं। उनका मानना है कि एक ही समाज के अन्तर्गत विभिन्न वर्गों और उस वर्ग के व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों का आधार उनकी आर्थिक स्थिति होती है। एक ही समाज में विभिन्न वर्गों की रुचियों, दृष्टियों तथा सामाजिक एवं नैतिक संस्कारों में भेद होता है। व्यक्ति पर्याप्त सीमा तक चेतन अथवा अवचेतन संस्कारों से बँधा होता है और उसका साहित्य इस वर्गीय संस्कारों अथवा दृष्टियों से मुक्त नहीं हो पाता। उदाहरण के तौर पर मुक्तिबोध ने प्रसाद की 'कामायनी' का अध्ययन करते हुए उसके वर्गीय आधारों को भी पहचानने का प्रयास किया है।
उनके निष्कर्षो से कोई भले ही सहमत न हो लेकिन उनका अध्ययन इस निष्कर्ष को अवश्य प्रतिपादित करते हैं कि वर्गबद्ध समाज में रचनाकार तथा रचना के वर्गीय आधार को समझे बिना रचना का मूल्यांकन नहीं हो सकता।
कविता तथा कला के वर्गीय आधारों की समझ अन्तर्वस्तु के उन पक्षों तक ले जाती है जिन्हें विशुद्ध साहित्यिक मानदण्डों के आधार पर साहित्य तथा कला की परीक्षा करने वाले आलोचक देख नहीं पाते ।
छायावादी कविता में जिस दुःख, पीड़ा, असन्तोष अथवा पलायन की स्थितियों का चित्रण हुआ है या छायावादोत्तर कविता के बच्चन और अंचल जैसे कवियों के काव्य में तथा मध्यम वर्ग के द्वारा रचे गए अधिकांश साहित्य में कम प्रयोगवादी काव्य में जिस मोहभंग की स्थिति दिखाई देती है और उसके फलस्वरूप निराशा, पराजय और अनास्था के जो स्वर सुनाई पड़ते हैं, इन सबका तात्विक ज्ञान हम कविता तथा कला के वर्गीय आधारों का विवेचन करके प्राप्त कर सकते हैं। काव्य के वर्गीय आधार का विवेचन करते हुए मुक्तिबोध कहते हैं। कि "वर्गीय चेतना बाहर की स्थूल सीमाओं का अतिक्रमण कर मनुष्य के मनोयोग तक फैली हुई है।
उसके बाह्य पक्ष के साथ-साथ एक आन्तरिक पक्ष भी है जिसे एक ही व्यक्ति में होने वाले दो विपरीत संस्कारों के द्वन्द्व रूप में देख सकते हैं। वर्गों में विभाजन केवल व्यक्ति समूहों का ही नहीं, प्रवृत्ति समुदायों का भी हो सकता है। इसको समझना अपेक्षाकृत कठिन कार्य है।" मुक्तिबोध इस महत्त्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित करते हैं कि वर्गीय संस्कार रचनाकार में सदा-सदा के लिए बद्ध-मूल नहीं हो जाते, रचनाकार अपनी सीमाओं से उठने में मदद देता है। आशय यह है कि कविता तथा कला के वर्गीय आधार की बात मुक्तिबोध के काव्य-चिन्तन में सतही नहीं है, बल्कि इसके विभिन्न पहलुओं का उन्होंने गम्भीर विवेचन किया है। इतना सुनिश्चित है कि वर्गबद्ध समाज में रचनाकार कतिपय अपवादों को छोड़कर वर्ग संस्कारों से मुक्त नहीं हो पाता। उसकी रचना पर उनका प्रतिबिम्ब अवश्य पड़ता है। रचनाकार की वर्गीय दृष्टि उसकी रचनाओं की दिशाओं को निर्धारित करती है। बिना रचना के वर्गीय आधार को परखे उसका सम्यक् मूल्यांकन नहीं हो सकता है।
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