तुलनात्मक आलोचना - comparative criticism
पण्डित पद्मसिंह शर्मा हिन्दी में तुलनात्मक आलोचना के वास्तविक प्रणेता हैं। उन्होंने 1907 ई. में बिहारी और सादी की तुलना द्वारा इसका आरम्भ किया था। तुलनात्मक अध्ययन को वे आलोचक का मुख्य कार्य मानते थे। सन् 1908-09 में उन्होंने 'सरस्वती' पत्रिका में विभिन्न भाषाओं की कविताओं का बिम्ब- प्रतिबिम्ब-भाव दिखाने के लिए निबन्ध लिखे थे। 'सरस्वती' में ही सन् 1910 में उनका निबन्ध 'सतसई-संहार' धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ था। उनकी इस आलोचना पद्धति का सबसे बड़ा प्रमाण उनकी पुस्तक 'बिहारी सतसई : तुलनात्मक अध्ययन' (1918 ई.) है।
मिश्र बन्धुओं ने अपने ग्रन्थ 'हिन्दी नवरत्न' में नौ कवियों को श्रेणियों में बाँट कर उनका तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया था। इसमें देव को बिहारी से बड़ा कवि बताने के कारण आलोचकों के बीच विवाद पैदा हो गया और प्रतिक्रियास्वरूप तुलनात्मक आलोचना में उबाल आ गया। पण्डित पद्मसिंह शर्मा ने 'बिहारी सतसई : तुलनात्मक अध्ययन' पुस्तक लिखी, जिसमें बिहारी को देव से बड़ा कवि प्रमाणित किया गया। पण्डित कृष्णबिहारी मिश्र ने इसके उत्तर में 'देव और बिहारी' पुस्तक लिखकर बिहारी की तुलना देव से की और देव को बड़ा कवि दिखलाने का प्रयत्न किया। यहाँ उन्होंने मिश्र बन्धुओं के तर्कों का समर्थन ही किया,
परन्तु उनकी शैली संयत है और दोनों कवियों के काव्योत्कर्ष को अपेक्षाकृत सन्तुलित ढंग से प्रस्तुत करने के बाद देव को बिहारी से बड़ा कवि माना ।
देव-बिहारी के विवाद में लाला भगवानदीन भी उतर पड़े। लाला जी रीतिकालीन साहित्य के मर्मज्ञ थे। पण्डित कृष्णबिहारी मिश्र द्वारा की गई बिहारी की प्रतिकूल आलोचना से वे क्षुब्ध हो गए और 'बिहारी और देव' पुस्तिका लिख कर पण्डित कृष्णबिहारी मिश्र को उनकी आलोचना का उत्तर दिया। पुस्तक में बिहारी पर लगाए गए आक्षेपों का उत्तर देते हुए बड़े कवि के पद पर बिहारी को ही बिठाने का आग्रह है इसलिए कवियों के काव्य का निष्पक्ष विवेचन नहीं हो पाया। अपने सतहीपन के कारण हिन्दी साहित्य के इतिहास में यह विवाद तुलनात्मक आलोचना का अनुकरणीय रूप तो नहीं बन सका, परन्तु इसमें रीतिकालीन काव्य की विशद् व्याख्या सामने आई जो उस साहित्य की शक्ति और सीमाओं को समझने में बहुत सहायक हुई।
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