रचनाकर का व्यक्तित्व और आलोचकीय प्रतिक्रिया - Composer's personality and critical response

जॉन हेनरी न्यूमैन के अनुसार सभी साहित्य पारिभाषिक रूप से व्यक्तिगत होते हैं, अर्थात् साहित्य अनिवार्य रूप से एक व्यक्तिगत कार्य है। यह उसके रचयिता व्यक्ति के विचारों और भावों की अभिव्यक्ति है, ये विचार और भाव उसके अपने होते हैं। अन्य शब्दों में, साहित्य व्यक्तिगत चिन्तन को ही अभिव्यक्त करता है, वस्तुगत सत्य को नहीं । व्यक्तिवादी आलोचना के अनुसार रचनाकार के व्यक्तित्व की पहचान उसकी रचनाओं के आधार पर की जा सकती है तथा लेखक के व्यक्तित्व को रचना के मूल्यांकनका आधार बनाया जा सकता है। इसमें माना जाता है कि कृतिकार अपने व्यक्तित्व का प्रसार करने हेतु ही रचना में प्रवृत्त हुआ है।

कृति को लेखक के व्यक्तित्व का ही अंश माना जाता है और उसके माध्यम से उसके व्यक्तित्व की विशेषताओं के उद्घाटन का प्रयास भी किया जाता है। इसमें जीवनीमूलक या जीवन-वृत्तान्तीय आलोचना भी समाहित है।


रचना के प्रति आलोचक की अपनी प्रतिक्रिया और सम्मति व्यक्तिवादी आलोचना का मुख्य आधार है। रचना के विवेचन और मूल्यांकन में आलोचक के व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। उसकी प्रतिभा, ज्ञान और संवेदना का रचना के विश्लेषण पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

रचना के मूल्य का निर्धारण करते हुए उसकी उत्कृष्टता या निम्नता पर निर्णय देने में आलोचक की अनुभूति का आधारभूत योगदान है। सहृदय आलोचक एक ओर रचना में निबद्ध रचनाकार की अनुभूति का विश्लेषण-विवेचन करता है और दूसरी ओर रचना के सम्बन्ध में अपनी अनुभूति को प्रकट कर दूसरे पाठकों में वही अनुभूति जगाने का प्रयास करता है । निश्चित ही किसी भी भावुक और सहज प्रतिक्रिया को आलोचना नहीं कहा जा सकता। आलोचकीय प्रतिक्रिया में रचनागत अनुभूति को ग्राह्य बनाते हुए अपनी अनुभूति के औचित्य अनौचित्य पर भी विचार किया जाता है।

आलोचक के साहित्यिक संस्कारों और अभिरुचि के निर्माण में उसके उसके व्यक्तित्व और चरित्र का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। व्यक्तिवादी आलोचना में आलोचक अपनी व्यक्तिगत रुचि और पसंद को निरपेक्ष रूप से रचना की विशेषताओं को परखने का आधार नहीं बना सकता। वस्तुतः उसकी विकसित साहित्यिक रुचि ही उसके विवेचन का आधार हो सकती है। इसलिए व्यक्तिवादी आलोचना पर उचित ही यह आक्षेप किया जाता है कि उसमें व्यक्तिगत अनुभूति और अभिरुचि की प्रमुखता होने से जहाँ एक ही रचना के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न और विरोधी मत सामने आते हैं वहीं उनकी प्रामाणिकता भी संदिग्ध हो जाती है।