रचना और आलोचना - composition and criticism

साहित्यिक रचनाएँ आलोचना की विषयवस्तु, सन्दर्भ और आलोचकीय निष्पत्तियों का आधार होती हैं। आलोचना के उद्भव और विकास की वास्तविक जमीन रचना ही होती है।


रचनात्मक साहित्य के विवेचन और विश्लेषण की प्रक्रिया में ही साहित्यिक सिद्धान्त उपलब्ध होते हैं। साहित्यिक आलोचना साहित्य को पढ़ने और समझने के नये ढंग बताती है तथा यह भी बताती है कि आलोचनात्मक अध्ययन में किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

रचनाकार जीवन और जगत् के जिन तत्त्वों के संश्लेषण से साहित्य की रचना करता है, आलोचना उन्हीं तत्त्वों का विश्लेषण करती है। टी. एस. एलियट ने लिखा है कि कविता को अपने आप में उस कविता का आलोचनात्मक नक्शा भी होना चाहिए। इस कथन में रचनात्मक क्रिया के सजग आयामों का दिशा-निर्देश है। साथ ही रचनाकार के लिए अपनी रचना से उचित तटस्थता की आवश्यकता भी व्यक्त की गई है। रेने वेलेक के अनुसार "साहित्य के सिद्धान्त, नियम और निकष किसी शून्य में विकसित नहीं हो सकते, इतिहास को देखें तो ज्ञात होगा कि प्रत्येक आलोचना ने अपना सिद्धान्त ऐसी ठोस कलाकृतियों के सम्पर्क में रहकर विकसित किया है जिन्हें उसे चुनना पड़ा है, उनकी व्याख्या करनी पड़ी है, विश्लेषण करना पड़ा है और अन्ततः निर्णय देना पड़ा है।"


रचना और आलोचना के सम्बन्ध द्वन्द्वात्मक होते हैं। रचनाकार अपनी संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता से ज्ञान की रचना करता है और आलोचक रचना में निहित उस ज्ञान राशि को खोलता और परखता है। रचना और आलोचना के अन्तस्सम्बन्धों की व्याख्या करते हुए आलोचक कमला प्रसाद लिखते हैं- - "यथार्थ रूप में मनुष्य और लगातार नये मनुष्य का बिम्ब रचना में ही मिलता है। मनुष्य के इस बिम्ब को अधिक से अधिक मानवीय, सार्थक और गतिशील बनाए रखने तथा रचना को इससे बाहर नहीं जाने देने का दायित्व आलोचना का है। दोनों का यही प्रशस्त पथ है।"