नागार्जुन के काव्य का रचना-विधान -Composition of Nagarjuna's poetry

यथार्थ की ग्रहणशीलता व काव्य में वस्तु का महत्त्व

नागार्जुन के काव्य का रचना- विधान यथार्थ की ग्रहणशीलता में प्राप्त होता है। काव्य-कला के साहित्यिक सामाजिक सन्दर्भ से आशय है काव्य-सृजन के क्रम में काव्य की वस्तु पर उसकी सामाजिकता पर ध्यान देने का सन्दर्भ और वस्तु की अपेक्षा रूप, शिल्प की उपेक्षा करने का सन्दर्भ । नागार्जुन के लिए काव्य में वस्तु ही महत्त्वपूर्ण है, शिल्प भाषा और अभिव्यंजना उसके सामने निस्सार हैं। वस्तु में काल्पनिकता व्यर्थ और त्याज्य है तथा यथार्थता वरेण्य है, आकाश उपेक्षणीय है और धरती ग्राह्य है।


'मनुष्य हूँ" 12 नागार्जुन की ऐसी ही कविता है, जिसमें उनकी काव्य-कला का साहित्यिक-सामाजिक सन्दर्भ कल्पना की अपेक्षा यथार्थ की और आदर्श की अपेक्षा यथार्थ की ग्रहणशीलता में प्राप्त होता है।


इस कविता में कवि कहता है कि मुझे सात घोड़ों का आकाशगामी रथ नहीं चाहिए। मेरे लिए पृथ्वी ही मेरी माता है। इस धरती पर नाना प्रकार के जीव-जन्तु और लता-गुल्म-तरु हैं । चन्द्र, सूर्य तथा धरती अमृत विष की खान है। उनके शब्दों में 'नीली ग्रीवा वाले मृत्युंजय का बाप' भी यही है। और


"विवशता' शीर्षक कविता में नागार्जुन ने सामाजिक सन्दर्भ को रूपायन देने वाले कवि कलाकार के वैसे विवश लेखन को स्पष्ट किया है, जिसमें उसके निजी प्रतिबद्ध समाज ने एक कवि को उपेक्षित कर दिया है।


कवि कहता है कि उसकी स्थिति 'परभृत पिकशावक' की तरह है, कौवे के घोंसले में पलने वाले पिक- शिशु की तरह है। अपने समाज द्वारा कवि के नहीं अपनाये जाने की स्थिति को उद्घाटित करता वह लिखता है -


तृषित क्षुधित हो रुदित क्षुधित हो


इधर उधर वह आये जाये


तुम्हीं न उसको अपना पाये।


नागार्जुन की 'रवि ठाकुर""" शीर्षक कविता में भी साहित्य के सामाजिक सन्दर्भ को महत्त्व प्राप्त हुआ है। कवि रवि ठाकुर के प्रति इसलिए अवनत है कि उन्होंने पीड़ित मनुष्यता के लिए निम्न स्तर को भी वाणी प्रदान की है। उच्च वर्ग में उत्पन्न होने पर भी उन्होंने अपवादस्वरूप यह महान् संवेदन प्राप्त किया पर सामान्य स्थितियों में ऐसा नहीं हुआ करता है। दूसरी ओर इस कविता में कवि कहता है कि उसका क्षुद्र व्यक्तित्व यद्यपि आटा-दाल, नमक, लकड़ी के जुगाड़ में, पत्नी-पुत्र सेठ के हुकुम में रुद्ध और सीमित है, प्रति पल संघर्ष में गुजरता है फिर भी वह अपना रुख प्रलोभन में पड़कर बदलना नहीं चाहता है। वह अपनी जीविका को ही अपना हल और कुदाल मानता है। वह कवि-गुरु से आशीष चाहता है कि प्रलोभनों में भी उसका मन नहीं डोले और वह सबके साथ सामान्य सामाजिक जीवन का सुख-दुःख भोगता रहे।


व्यंग्य


'माँजो और माँजो 15 इस सन्दर्भ को निरूपित करने वाली नागार्जुन की श्रेष्ठ कविता है। इसमें काव्य-कला के सामाजिक सन्दर्भ को नागार्जुन ने कथ्य के आग्रह और रूप में तिरस्कार के बतौर उपस्थित किया है।


कवि कहता है कि काव्य माँजने से ऊँचा नहीं उठता, बल्कि कथ्य की सही तलाश से ऊँचा उठता है, सामाजिक सन्दर्भ में उपयुक्त तथ्य चयन से ऊँचा बनता है। कवि कथ्य रूप की तुलना करते हुए कहता है-


माँजो और माँजो, माँजते जाओ लय करो ठीक, फिर-फिर गुनगुनाओ मत करो पर्वाह क्या है कहना कैसे कहोगे इसी पर ध्यान रहे चुस्त हो सेंटेंस, दुरुस्त हो कड़ियाँ पके इत्मीनान से गीत की बड़ियाँ


इस प्रकार कवि सम्बोधन शैली की बेबाकी के सहारे यहाँ अनायास ही व्यंग्य की सृष्टि कर उठता है। वस्तुतः यह काव्य-रचना में रूप का विशद्गान करने वालों के प्रति बड़ा ही करारा व्यंग्य है। तभी यह कहते हैं 16-


वस्तु है भूसी, रूप है चमत्कार


ध्वनि और व्यंग्य पर मरता है संसार


वाच्य या आशय पर कौन देता ध्यान ।


वास्तव में यहाँ नागार्जुन भारतीय काव्य शास्त्र की ध्वनिवाद और अलंकारवादी पीठिका पर भी व्यंग्यकर जाते हैं। उन्हें महिमभट्ट की तरह अभिधा ही पसंद है, क्योंकि वह सामान्य जन की है।