समकालीन हिन्दी कविता : लोक-संसक्ति - Contemporary Hindi Poetry: Folk Culture
लोक-संसक्ति कविता की आदिम ज़मीन है। हिन्दी का भक्ति आन्दोलन शास्त्रीय जड़तावादी चेतना के खिलाफ लोक-संस्कृति, लोकभाषा और जनपदीय चेतना के व्यापक प्रतिरोध का आन्दोलन था। आधुनिक कविता में प्रगतिशील काव्यधारा का मूल स्वर लोक संवेदना ही है। इस कविता में खेत है, खलिहान है, किसान- मजदूर है और कविता की लोकधर्मी चेतना है। आजादी के बाद प्रयोगवाद और नयी कविता में लोक संवेदना का स्वर बहुत मुखरित न हो सका। समकालीन कविता के दौर में उदारीकरण, बाज़ारवाद और भूमण्डलीय संवेदना के बरअक्स हिन्दी कविता में स्थानीय संवेदना और लोक चेतना की कविता प्रचुर मात्रा में खी गई।
हिन्दी कविता में लोक और स्थानीयता का यह रंग एक ओर वैश्वीकरण और नव साम्राज्यवादी निरंकुशता के खिलाफ है तो दूसरी ओर हिन्दी की जातीय जमीन से कविता जुड़ रही है। समकालीन कविता में लोक-संसक्ति का यह स्वर नागार्जुन, विजेन्द्र, केदारनाथ सिंह, त्रिलोचन, मानबहादुर, बद्रीनारायण, एकान्त श्रीवास्तव और रामकुमार कृषक की कविताओं में व्यक्त हुआ है। बाज़ारवादी इस मायावी और भयावह दौर में समकालीन कविता में लोक का स्वरूप भी बदला । यहाँ लोक के अवयवों का अर्थ कवि बदलता है। लोक पर खतरा अधिक बढ़ा सो प्रचलित मुहावरों से अलग समकालीन कवि नदी, पशु-पक्षियों के गुण-धर्म को बदलने का आग्रह करता है।
तभी तो वह इस बाजारू मायावी शक्तियों से अपने को बचा पाने में सक्षम होगा। बद्रीनारायण की इस कविता में भक्ति की अनुगूँज भी है और समकालीन दौर में लोक के बदलाव का पुनर्मृजन भी है -
हिरणें जिन्हें अपने हिरण होने के अर्थ में थोड़ी तब्दीली करते हुए शेर को रोकना चाहिए था, लामबंद हो उसे घेर लेना चाहिए था अपने चाँद को बचा लो -
वे खजुराहो में पत्थर चाट रही हैं
हिरणों अरज करूँ मैं तोसे
लोकचेतना की इस कविता में राजनैतिक-सामाजिक यथार्थ का रंग भी है। लोक के रंग, स्मृति और आत्मिक गन्ध से कवि पतनशील सभ्यता को बचा पाने की आशा-आकांक्षा रखता है। यह शक्ति कवि की लोक सम्पृक्ति से आती है। एकान्त श्रीवास्तव अपनी कविता में लोक की शक्ति और स्पन्दन का इस्तेमाल करते हैं। लोकजीवन और जैविक विविधता का प्रयोग करते हुए वह उम्मीद की कविता लिखते हैं। उन्हीं के शब्दों में,
पर कितनी चीजें यूँ ही छूट जाती हैं।
खेतों में
जीवन में
संसार में
जिनसे मुक्ति असंभव
असंभव मगर नामुमकिन नहीं
इनसे मुक्ति तभी
जब एक दूसरी व्यूह रचना तुम करो तैयार
जैसे तुम करगा घास से मुक्ति के लिए तुम करते व्यूह रचना नागकेसर की
लोकधर्मी कवि रामकुमार कृषक लोकजीवन के सुख-दुःख, भूख, बीमारी, संघर्ष और प्रतिरोध को रचते हैं। 'नीम की पत्तियाँ' संग्रह में दर्ज इस ग़ज़ल में रामकुमारजी पारम्परिक प्रतीकों से समकालीन लोकमन और प्रतिरोध को व्यक्त करते हैं-
भेद लंका का सभी जान लिया हम विभीषण ही सही मान लिया राज अपना है,
पराया राजा हमने नातों का इम्तिहान लिया सोन महलों में सच नहीं मिलता सोच की छलनी लगा छान लिया शीश दस-बीस बाहुओं वाले रावणी राज को पहचान लिया -
नये बदलते यथार्थ समकालीन कवियों की लोक-संसक्ति का रंग भी है। वह परम्परा से लोक-संस्कृति से चेतना ग्रहण करता है लेकिन अपने समय के अनुकूल वह विकल्प रचता है। लोक-संसक्ति की समताहीन कविता में नदी, तालाब, चिड़िया और प्रकृति के छोटे अवयव हैं जिनसे प्यार करना ही विकल्प नहीं है। इनको बचा लेने की नयी रणनीतियाँ और संघर्ष को कविता में ढालकर कवि लोक की नयी संस्कृति का सृजन करता है।
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