समकालीन हिन्दी कविता : काल-संसक्ति - Contemporary Hindi Poetry: Kaal-Sansakti
काल-चेतना और काल-संसक्ति के प्रति सजग आलोचक समकालीन कविता को 'साठोत्तरी कविता' कहना अधिक उचित मानते हैं। समकालीन कविता की काल-संसक्ति का दायरा इतना व्यापक है कि यह एक ओर अपनी पुरानी पीढ़ी से काव्य-संस्कार ग्रहण करती है तो इसने बदलते समय के यथार्थ के साथ अपना कलेवर भी बदला है। समकालीन कविता का गहरा सम्बन्ध आजादी से है। आजादी के (1947) के छह महीने बाद गाँधीजी की हत्या हो गई। विभाजन और त्रासद साम्प्रदायिक दो हुए। लोकतन्त्र की नींव खून से सनी थी। कविता में आजादी के स्वागत के साथ मोहभंग की कविता अधिक लिखी गई। एक तरफ टूटे सपने से उपजी कुण्ठा और निराशा का स्वर तो दूसरी ओर आस्था और आशा का स्वर भी गूँजा प्रयोगवादी कवियों के प्रभाव से विकसित कविता में कुण्ठा,
निराशा, मोहभंग, अतिवैयक्तिकता, आस्था अनास्था की संवेदना विन्यस्त हुई तो प्रगतिशील कविता की धारा से जुड़े कवि मोहभंग के साथ जनसंघर्ष, आशा, प्रतिरोध और जनता के श्रम-संवेदना को वाणी दे रहे थे। प्रगति प्रयोग-नयी कविता समकालीन कविता की काव्य-संवेदना का विकास इन मिली-जुली संवेदनाओं से हुआ। अन्तर्विरोधों और द्वन्द्वों से विकसित होते हुए समकालीन कविता रूपायित हुई। इस बीच कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ। प्रगतिशील काव्यधारा अलग-अलग धाराओं में बँटकर काव्य-सृजन की यात्रा कर रही थी। 1975 में 'आपातकाल' के दौर में बहुत से कवियों कलाकारों पर सत्ता की ओर से तानाशाही रवैया अपनाया गया। कविता में इसकी छाया को साफ देखा जा सकता है।
सन् 1980 के बाद उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रभाव ने जन-जीवन के सामने नयी चुनौतियाँ पेश की सो कविता में सृजन और प्रतिरोध का रूप भी बदला।
1992 में बाबरी ध्वंस और 2002 में हुए गोधरा कांड ने भारतीय राजनीति का चेहरा ही नहीं बदला, हिन्दी कविता में इस नये बनते सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की शिनाख्त की गई। यह काबिलेगौर बात है कि वैश्वीकरण और साम्प्रदायिकता प्रवृत्तियाँ साथ-साथ बढ़ीं। उत्तर समय में उत्तर औपनिवेशिक अमरीकी साम्राज्यवाद, उत्तर पूँजीवाद की साजिशों को हिन्दी कविता ने बेनकाब किया। प्रतिशोध और संघर्ष की यह संवेदना साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में कविता में अधिक सृजनात्मकता के साथ रची गई।
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