समकालीन हिन्दी कविता : काव्य-दृष्टि - Contemporary Hindi Poetry: Kavya-Drishti
समकालीन कवियों में यथार्थ की अनेक छवियाँ और काव्य प्रवृत्तियाँ आपस में जुड़ते टकराते कविता का विकास करती हैं। इस दौर में कविता की कई पीढ़ियाँ एक साथ रचनारत हैं। समकालीन कविता में कवियों ने जीवन की बहुआयामी और बहुस्तरीय छवियों को रचा है ।
कविता में लोकतन्त्र और राजनैतिक सन्दर्भों की बहुलता
साठोत्तरी कविता अथवा समकालीन कविता में संसद चुनाव, लोकतन्त्र, समाजवाद और अनेक राजनैतिक सन्दर्भों को कविता में रूपायित किया गया । रघुवीर सहाय के काव्य-संग्रह 'आत्महत्या के विरुद्ध', मुक्तिबोध का संग्रह 'चाँद का मुँह टेढ़ा है'
और धूमिल काव्य के संग्रह 'संसद से सड़क तक' में भारतीय जनतन्त्र और राजनीति की विद्रूपता की सजग समीक्षा है। इन कवियों में धूमिल प्रखर राजनैतिक चेतना के कवि हैं। 'कल सुनना मुझे' संग्रह में 'रोटी और संसद' कविता में वह संसद के यथार्थ को कुछ इस रूप में व्यक्त करते हैं -
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है।
मैं पूछता हूँ
यह तीसरा आदमी कौन है ?
मेरे देश की संसद मौन है।
समकालीन कविता में धूमिल, नागार्जुन के साथ, उदय प्रकाश, लीलाधर जगूड़ी की कविताओं में राजनीति और जनतन्त्र के यथार्थ को व्यक्त किया गया है। लीलाधर जगूड़ी की कविता 'इस व्यवस्था में' जनतन्त्र पर गहरा व्यंग्य करती है।
नौकरी के लिए पढ़कर सिफ़ारिश से कुर्सी पर चढ़कर
इस दरमियान
मैंने जाना है
जनतन्त्र में
बिल्कुल नया जमाना है।
नागरिकता पर
सबसे बड़ा रंदा थाना है
राजनीति और जनतन्त्र ने आजादी के बाद आमजन के साथ छल किया। राजनीति में पाखण्ड और झूठ बढ़ा। राजनैतिक भ्रष्टाचार का कद बढ़ता गया और लोकतन्त्र का कद घटता गया। हाल यह है जनता जनतन्त्र के इस फरेब और छलावे का लगातार शिकार होती है। जनतन्त्र के बारे में 'धूमिल का यह कहना बिल्कुल सही हैं।
कि,
अपने यहाँ जनतन्त्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान मदारी की भाषा है।
'संसद' के खोखलेपन को उकेरती 'उदय प्रकाश' की 'महापुरुष' कविता में संसदीय व्यवस्था के यथार्थ
को बयां किया गया है-
महापुरुष की धोती का
एक छोर
नगर सेठ की तिजोरी में है
दूसरा संसद की मूर्ति में
समकालीन कविता में राजनीति और लोकतन्त्र की विद्रूपता को बेनकाब किया गया है। लोकतन्त्रीय व्यवस्था के प्रति मुखर विद्रोह करती इन कविताओं में आजादी के बाद के भारतीय जनतन्त्र की सजग समीक्षा है।
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