समकालीन हिन्दी कविता - contemporary hindi poetry
समकालीन कविता नयी कविता के बाद कविता की वह संश्लेषी धारा है जिसमें आम आदमी की पीड़ा, संत्रास और परिवेश की सहज अभिव्यक्ति का स्वर है। यों हर समय की कविता अपने परिवेश और समय की पुकार है लेकिन समकालीन कविता में परिवेश का रूपायन सर्वाधिक हुआ है। युगीन यथार्थ की टकराहट से पैदा हुई इस कविता में आम आदमी का दुःख-दर्द है, आत्म-मंथन है, निराशा है, आक्रोश है, विद्रोह है, विरोध है लेकिन यह कविता अनास्थावाद की प्रतिष्ठा नहीं करती। समकालीन कविता में राजनैतिक सन्दर्भों को अधिक अर्थवान और प्रतिबद्धता के साथ व्यक्त किया गया है।
समकालीन हिन्दी कविता की पृष्ठभूमि
समकालीन कविता का प्रस्थान वर्ष 1964 सर्वाधिक महत्त्व का है। साहित्य और राजनीति दोनों में यह विशिष्ट वर्ष है। आजाद देश के पहले प्रधानमंत्री और स्वप्नदर्शी राजनेता, चिन्तक, विचारक जवाहरलाल नेहरू के देहान्त का वर्ष 1964 हैं तो यही वह वर्ष है जिसमें साहित्य को नयी चेतना प्रदान करने वाले गजानन माधव मुक्तिबोध का देहावसान भी हुआ। स्वतन्त्र भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था और लोकतान्त्रिक मूल्यों को विकसित करने वाली संस्थाओं की नींव नेहरू के वैज्ञानिक चिन्तन का परिणाम था। अपने समय समाज और साहित्य को नये द्वन्द्वात्मक नजरिए से देखने वाले मुक्तिबोध के काव्य को स्वतन्त्र भारत का इस्पाती दस्तावेज कहा गया ।
मुक्तिबोध कई जगह नेहरू की नीतियों के प्रशंसक थे। लेकिन उस दौर की खामियों का उनसे बड़ा आलोचक भी कोई और न था । नेहरूयुगीन सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों की मुखर आलोचना मुक्तिबोध की 'अँधेरे में' कविता में देखा जा सकता है। साठोत्तरी समय में मोहभंग का स्वर प्रमुख है। मुक्तिबोध के साथ नागार्जुन - त्रिलोचन और शमशेर के यहाँ यह देखा जा सकता है। साठोत्तरी कविता की एक काव्यधारा वह है जिसके प्रतिनिधि कवि धूमिल हैं। इनके साथ ही और गंगाप्रसाद विमल का नाम लिया जाता है। यह 'अ' कविता की काव्यधारा है। वैसे मोहभंग का स्वर इन सभी काव्यधाराओं में है। लेकिन काव्य-दृष्टि में भेद है। 'मुक्तिबोध' के मोहभंग में अनुशासन और गहन इतिहास बोध है। वहीं 'धूमिल के यहाँ मोहभंग का अराजक रूप है और तत्कालिकता का प्रभाव अधिक है।
यों साठोत्तरी काव्यान्दोलन में कविता की कई काव्यधाराओं की उपस्थिति होने के कारण कवि सम्पादक जगदीश गुप्त ने उसे 'किसिम-किसिम की कविता' कहा, तो ठीक ही है।
समकालीन कविता की पृष्ठभूमि में राजनैतिक मुखरता का स्वर प्रधान है। राजनीति से मोहभंग ने 'नक्सलवादी आन्दोलन' को जन्म दिया जिसमें व्यवस्था के प्रति प्रतिरोध है। आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में असांस्कृतिककरण उपभोक्तावादी और नव साम्राज्यवादी नीतियों का विकास हुआ। महँगाई, बेरोजगारी और निरंकुश राजनीति ने आमजन में असंतोष पैदा किया। असंतोष की यह संवेदना हिन्दी कविता को समकालीन स्वर के रूप में उभरा। समकालीन कविता के प्रतिनिधि कवि 'धूमिल' की यह प्रश्नाकुल काव्य पंक्तियाँ लोकतन्त्र के मोहभंग को ही व्यक्त करती हैं-
क्या आजादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई खास मतलब होता है।
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