समकालीन कविता : काव्य-भाषा और काव्य-शिल्प - Contemporary Poetry: Poetry-Language and Poetry-Craft

समकालीन कविता में काव्यभाषा यथार्थ को रूपायित करने में अधिक कारगर साबित हुई है। भाषा में गद्यात्मकता बढ़ी है। विचारों की सघनता का काव्यभाषा में नये बिम्ब और प्रतीक में ढालकर समकालीन कवियों ने काव्यभाषा को अधिक सृजनात्मक बनाया है। समकालीन कविता में एक ओर मुक्तिबोध के काव्य-शिल्प को अपनाया गया जिसमें व्यंग्य नाटकीयता और फैंटेसी की ओर भाषा का झुकाव है दूसरी ओर भाषा में धूमिल की काव्यभाषा का प्रभाव हैं। धूमिल की कविता काव्य- अभिजात्य से भाषा को मुक्त करने का अभियान है। यहाँ व्यंग्य है सपाटबयानी है और संवादी स्वर है। समकालीन कविता में भाषा की जनधर्मी चेतना के प्रभाव से आक्रोश,

पीड़ा, घृणा, अन्याय और प्रतिरोध से काव्य-भाषा अधिक सामर्थ्यवान् और समृद्ध हुई है। भाषा में जनवादी क्रान्ति को रूपायित करने वाले कवि मुक्तिबोध 'जमाने के पैगम्बर' कविता में लिखते हैं-


मानो या मत मानो


इस नाजुक घड़ी में


चन्द्र है सविता है


पोस्टर की कविता है


चाख में लगी हुई


कारतूस गोली के धड़ाके से टकरा


प्रतिरोधी कविता बनती है पोस्टर


सहज-सरल आक्रामक भाषा समकालीन कविता की जान है। धूमिल, अरुण कमल, राजेश जोशी, आलोक धन्वा और लीलाधर जगूड़ी की कविता सहज भाषा में तीखा वार करती है। धूमिल अपनी कविता में


ऐसी ही बात लिख रहे हैं-


उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे


कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं-


आदत बन चुकी है।


व्यंग्य की धार समकालीन कविता का केन्द्रीय स्वर है। शासन, लोकतन्त्र और बौद्धिक समाज की कमजोरियों पर समकालीन कविता मे गजब का व्यंग्य किया गया है। रघुवीर सहाय की यह काव्य पंक्तियाँ लोकतन्त्र पर गहरा व्यंग्य है-


राष्ट्रगति में भला कौन वह, भारत भाग्य विधाता है। फटा सुथन्ना पहिने जिसका गुन हरचरना गाता है।


बिम्ब और प्रतीक का प्रयोग समकालीन कविता में रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर किया गया है सो वह बेहद सम्प्रेषणीय लगती है। केदारनाथ सिंह की कविता में बिम्ब और प्रतीक का सार्थक प्रयोग किया गया है। 'बैल' शीर्षक कविता में केदारजी बैल को मजबूर और कमजोर आदमी के प्रतीक की तरह प्रयोग करते हैं-


वह चल रहा है और सिर्फ़ एक पगडंडी


उसे याद है जो उसकी पूँछ की तरह


उसे हाँक लिये जा रही है।


भाषाई चमत्कार से समकालीन कवि चौंकाता है, जीवन की वास्तविकता को व्यक्त करता है। यहाँ कविता में यथार्थ को नाटकीयता की शैली में रचा जाता है। वर्णन में कल्पना और कौतुक लगता है लेकिन अन्दर एक गहरा मर्म छिपा रहता है। अनुभव का साधारणीकरण भाषा का सुन्दर विधान राजेश जोशी की कविता 'चाँद की वर्तनी' में इस भाषाई चमत्कार को देखा जा सकता है-


चाँद के ऊपर चाँद धर कर इस तरह


चाँद लिखने के लिए चा पर चन्द्रबिन्दु लगाता हूँ चाँद को दो बार लिखता हूँ चाँद की एवज में सिर्फ़ चन्द्रबिन्दु रख दूँ तो काम नहीं चलता भाषा का आधा शब्द में और आधा चित्र में लिखना पड़ता है

उसे हर बार शब्द में लिखकर जिसे अमूर्त करता हूँ चन्द्रबिन्दु बनाकर उसी का चित्र बनाता हूँ


समकालीन कविता में छन्द को पारम्परिक बन्ध से मुक्ति के साथ गद्य की लय में रूपायित किया गया है। । बोलचाल की शैली में कविता की आन्तरिक लय कभी टूटती नहीं यों कभी-कभी लगता है कि गद्य और कविता का अन्तर लगभग समाप्त हो चुका है। नयी सदी में बाज़ार, तकनीक, विज्ञान और बौद्धिक वैचारिक दबाव में कविता का नया मुहावरा कवियों ने गढ़ा है। इस टूट-फूट में कविता की भाषा के पुराने संस्कार बदले हैं तो नयी सर्जनात्मक भाषा का विधान सुखकारी है। यह भाषा बदलते समय के यथार्थ को व्यक्त करने में समर्थ है।