डॉ. रामविलास शर्मा का विषयवस्तु और रूप - The content and form of Dr. Ram Vilas Sharma
साहित्य में रूप और विषयवस्तु के सम्बन्ध की समस्या एक प्रमुख विवेच्य विषय है। डॉ. शर्मा रूप और विषयवस्तु दोनों ही दृष्टियों से साहित्य को दर्शन और विज्ञान से भिन्न और विशिष्ट मानते हैं । वे कहते हैं कि विज्ञान और दर्शन की सहायता से हम यथार्थ को समझना चाहते हैं, जबकि साहित्य की सहायता से हम यथार्थ को समझना ही नहीं, देखना भी चाहते हैं। दर्शन और विज्ञान का काम यथार्थ की छानबीन करके कुछ विचार प्रस्तुत करना होता है। लेकिन साहित्य का सम्बन्ध विचारों की भूमि अर्थात् मनुष्य के कर्ममय जीवन से होता है। साहित्य में इन विचारों के प्रति मनुष्य की भावना और प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति भी होती हैं । दर्शन और विज्ञान द्वारा प्रस्तुत विचारों का भौतिक रूप बहुत सूक्ष्म होता है। साहित्य के रूप की विशेषता उसकी ऐन्द्रियता अर्थात् विचारों को इन्द्रिय सुखद मूर्त रूप देना है।
साहित्य की विषयवस्तु और रूप का वैशिष्ट्य स्पष्ट करने के बादडॉ. शर्मा ने इनके पारस्परिक सम्बन्धों को भी स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा है कि "रूप और विषयवस्तु का सम्बन्ध अभिन्न और अन्योन्याश्रित है।" (- 'मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य) डॉ. शर्मा साहित्य की विषयवस्तु और कलात्मक पक्ष दोनों को महत्त्वपूर्ण मानते हैं और दोनों की एकता पर जोर देते हैं। लेकिन उनका यह भी कहना है कि साहित्य रचना के लिए विषयवस्तु और कला दोनों का समान महत्त्व नहीं है, निर्णायक भूमिका हमेशा विषयवस्तु की होती है। केवल कला को निखारने का प्रयास करके उत्कृष्ट साहित्य की रचना नहीं की जा सकती, उसके लिए उच्चकोटि के विचार, भावबोध और यथार्थ का ज्ञान होना आवश्यक है। वहीं, जिसके पास ये चीजें हैं अर्थात् विषयवस्तु है, वह प्रयत्न करके उन्हें कलात्मक रूप दे देगा।
डॉ. शर्मा ने साहित्य के रूप और विषयवस्तु के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध माना है। दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। कविता की भाषा और शैली आदि तत्त्व विषयवस्तु को प्रभावशाली बनाते हैं।
साहित्य के विभिन्न रूप और विधाएँ सामाजिक विकास से उपजी हैं और उस पर निर्भर हैं। प्राचीन साहित्य में महाकाव्य और आधुनिक उद्योग-धन्धों की प्रगति के साथ उपन्यास के साहित्य का मुख्य रूप बनने का कारण इन दोनों के सामाजिक विकास के रूपों की भिन्नता ही है। अतः साहित्य में वस्तु का निर्णायक महत्त्व है। लेकिन रूप भी निष्क्रिय होकर प्रभाव ग्रहण नहीं करता, वह वस्तुतत्त्व को प्रभावित भी करता है और कभी-कभी उसे बदल भी देता है।
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