भारतेन्दु युग का अवदान - contribution of bhartendu era
भारतेन्दु-युग का साहित्य आधुनिक चेतना और नये पाठक-समुदाय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिखा गया साहित्य है । भारतेन्दु-युग के लेखकों ने नाटकों और निबन्धों के द्वारा समाज की विसंगतियों को उजागर करते हुए जनता में सामाजिक परिवर्तन की चेतना का प्रसार किया। आधुनिक युग में साहित्य का पाठक वर्ग बदला, उसकी रुचियों और आवश्यकताओं के अनुसार साहित्य-सृजन होने लगा । हिन्दी आलोचना अपनी रीतिकालीन विरासत को छोड़कर एक नये पथ पर आगे बढ़ने लगी। यद्यपि इस युग में एक पूर्ण साहित्यिक विधा के रूप में आलोचना का स्वरूप सामने नहीं आता है,
परन्तु साहित्य को सामाजिक और राष्ट्रीय सन्दर्भों से जोड़कर देखने के साथ-साथ साहित्यिक मानदण्डों के विकास के प्रयास इस युग में आरम्भ हो चुके थे। जनता इस युग में आन्दोलनों के रूप में उपनिवेशवाद और सामन्तवाद के प्रति अपने विरोध को प्रकट कर रही थी, साहित्य और पत्रकारिता में इसकी प्रतिध्वनियाँ स्पष्ट सुनाई दे रही थीं। हिन्दी पत्रकारिता के साथ आगे बढ़ते हुए हिन्दी आलोचना भी युगीन आवश्यकताओं और नये पाठक वर्ग से जुड़ कर अपनी राह पकड़ रही थी । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पण्डित बालकृष्ण भट्ट और उपाध्याय पण्डित बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' के साहित्य-चिन्तन का विकास हमें द्विवेदी युग के लेखकों, विशेष रूप से आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के लेखन में देखने को मिलता है।
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