केदारनाथ सिंह की कविता का शिल्प-सौन्दर्य - Craft-beauty of Kedarnath Singh's poem
केदारनाथ सिंह बिम्बों में सोचने वाले कवि हैं। इसीलिए दृश्यात्मकता उनकी कविता की खास विशेषता है । हिन्दी कविता में प्रमुख रूप से दो तरह के बिम्ब प्रचलित रहे हैं एक प्रकृति से सम्बन्धित और दूसरे मनोवैज्ञानिक । केदारनाथ सिंह इसका विस्तार करते हुए कविता को लोक बिम्ब से जोड़ने की कोशिश करते हैं। 'बोझे' शीर्षक कविता में एक लोक बिम्ब का उदाहरण देखा जा सकता है-
कुछ हाथ हैं
जो झूल रहे हैं बगल में
कुछ हाथ हैं जो ताबड़तोड़
बाँध रहे हैं बोझे सूरज की टाल से
जैसे बोझे चुराए गए हों
केदारनाथ सिंह के बिम्ब सिर्फ दृश्यात्मक ही नहीं हैं बल्कि उनकी कविता में बिम्बों के दूसरे प्रकार भी भरे पड़े हैं। ध्वनि बिम्ब का एक उदाहरण देखिए-
यह उसके चलने की आवाज़ है
जो पत्तों में
पीतल की तरह बज रही है।
यहाँ बाघ के चलने की बात हो रही है। कवि का ध्यान सिर्फ़ चलने के दृश्य पर ही नहीं है बल्कि वह उस आवाज़ को भी सुन रहा है जो पत्तों पर बाघ के चलने से निकल रही है।
वह अपनी कविता के पाठक को भी यह आवाज़ सुनाना चाहता है और इसीलिए पीतल के बजने के बिम्ब को निर्मित कर रहा है।
उनकी कविता के शिल्प की दूसरी विशेषता है उसका आख्यानपरक होना। वे अपनी कविता को आख्यान के झीने ढाँचे के सहारे बुनते हैं। इसके लिए वे घटनाओं की कल्पना करते हैं और अपनी कविता में बिम्बों के माध्यम से उन घटनाओं के दृश्य दिखलाते हैं। आख्यान की एक विशेषता संवाद भी होती है। केदारनाथ सिंह की कविता में भी इस संवाद को सहज रूप से ही पहचाना जा सकता है। इस संवाद की लय पर भोजपुरी बोली का गहरा प्रभाव है।
ये आदमी लोग इतने चुप क्यों रहते हैं आजकल एक दिन बाघ ने लोमड़ी से पूछा ...
कोई दुःख होगा उन्हें
वही दुःख
मैंने कहा न
'आदमी' के साथ 'लोग' और 'कहा' के साथ 'न' की जुगलबंदी ठेठ भोजपुरी में बातचीत के कारण है, इसके साथ ही प्रश्न पूछने की मुद्रा भी इस बातचीत की लय को विशिष्ट बनाने (लोक चेतना से एकाकार करने) में अपनी भूमिका निभाती है। लोक बिम्ब, आख्यान, प्रश्नवाचकता और ठेठ भोजपुरी की लय पर आधारित संवाद आदि विशेषताएँ केदारनाथ सिंह की कविता के शिल्प को भी लोकभूमि के धरातल पर प्रतिष्ठित करते हैं। उनका काव्य-शिल्प लोक से उनकी कविता के जुड़ाव को प्रामाणिकता प्रदान करता है।
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