केदारनाथ अग्रवाल की कविता का शिल्प - Craft of Kedarnath Agarwal's poem
लय विधान
केदारनाथ अग्रवाल ने छन्दबद्ध और छन्दमुक्त दोनों तरह की कविताओं की रचना की है। उनकी बहुत सी कविताएँ गद्यात्मक भी हैं।
लेकिन उल्लेखनीय यह है कि उन्होंने आधुनिक युग में भी दोहा छन्द में कुछ कविताएँ लिखी हैं। उनके द्वारा रचित एक दोहे का उदाहरण देखें-
झूठ मूठ ऐसी चली साँच मरयो मुँह बाय । न्याय करि पावे नहीं, देहरी दीपक न्याय ॥
ऐसा लगता है मानों अपने दोहों के माध्यम से केदारनाथ अग्रवाल हिन्दी कविता के भूले-बिसरे छन्दों का पुनराविष्कार कर रहे हों।
केदारनाथ अग्रवाल की किसान संवेदना का प्रभाव उनकी कविता के लयाधार पर भी पड़ा है।
केदारनाथ अग्रवाल की अनेक कविताओं का लय लोकधुन या लोकगीतों के लय पर आधारित है। नागार्जुन की तरह लोकधुन पर आधारित इनकी कविताएँ भी खूब लोकप्रिय हुई हैं। उदाहरण के लिए उनकी एक प्रसिद्ध कविता को देखा जा सकता है-
माँझी ! न बजाओ वंशी मेरा मन डोलता मेरा मन डोलता है जैसे जल डोलता जल का जहाज जैसे पल-पल डोलता माँझी ! न बजाओ वंशी मेरा तृण टूटता तृण का निवास जैसे बन वन टूटता माँझी ! न बजाओ वंशी मेरा मन इझूमता मेरा मन इसता है तेरा तन एक बन झूमता ।
ऐसा नहीं है कि केदारनाथ अग्रवाल सिर्फ़ लोकधुन पर आधारित कविताओं तक ही सीमित हैं, काव्य- विषय और अन्तर्वस्तु के हिसाब से वे कविता की लय में परिवर्तन भी करते हैं। किसी भी समर्थ कवि की एक पहचान यह भी है कि वह कविता की अन्तर्वस्तु और उसके लय में सामंजस्य बिठा पता है अथवा नहीं। केदारजी की कविता इस कसौटी पर खरा उतरती है। 'बसंती हवा' शीर्षक कविता में उनके इस काव्य-व - कौशल को देखा जा सकता है। वसन्त ऋतु में चलने वाली हवा में त्वरा होती है, उसकी गति थोड़ी तेज होती है। उस गति से एक तरह की मस्ती और मादकता का बोध होता है। केदार उस मस्ती और मादकता को लय में पिरोने के लिए अपनी कविता के लय को भी त्वरा से भर देते हैं।
फिर कविता की लय उसके अन्तर्वस्तु का अनुसरण करते हुए चलती है -
हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ।
सुनो बात मेरी. -
अनोखी हवा हूँ । बड़ी बावली हूँ,
बड़ी मस्तमौला । नहीं कुछ फिकर है,
बड़ी ही निडर हूँ ।
जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ मुसाफिर अजय हूँ।
न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न आशा किसी की,
न इच्छा किसी की, न प्रेमी न दुश्मन, जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ । हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!
लय में गति और त्वरा के अतिरिक्त इस कविता की ध्वन्यात्मकता भी प्रभावित करती है।
समान ध्वनि वाले वर्णों की आवृति से इस कविता के नाद सौन्दर्य में वृद्धि हो रही है। कहते हैं कि नाद के प्रभाव से कविता की उम्र बढ़ जाती है। अनायास नहीं है कि आज भी यह कविता काव्य-प्रेमियों का कण्ठहार बनी हुई है। इस कविता की लोकप्रियता का राज इसके लय और नाद के सौन्दर्य में छुपा हुआ है।
बिम्ब-विधान
केदारनाथ अग्रवाल की कविता के शिल्प की दूसरी विशेषता उसकी बिम्बात्मकता है। केदारजी की कविता अनेक बिम्बों से सजी हुई है।
छायावादियों की तरह इन्हें भी प्राकृतिक बिम्बों की रचना में विशेष रुचि है। लेकिन छायावादी बिम्बों से केदारजी के प्राकृतिक बिम्ब इस मायने में अलग हैं कि वे मानवीय परिवेश के अंग हैं। जबकि छायावादी प्राकृतिक बिम्ब मानवीय परिवेश से स्वायत। केदारजी की रचनाओं में खेती-किसानी और गाँव-ज्वार से सम्बन्धित बिम्बों की बहुलता है। ये बिम्ब छायावादियों के बिम्ब की तरह भव्य न होकर छोटे-छोटे और लोक-परिचित हैं। खेत में पकी हुई लहलहाती फसल का बिम्ब खींचते हुए वे अपनी एक कविता में कहते
आसमान की ओढ़नी ओढ़े
धानी पहने राधा बनकर धरती नाची,
फसल घघरिया
नाचा हँसमुख कृषक साँवरिया ।
यह तो हुआ दृश्य बिम्ब का उदाहरण जो एक चित्र रूप में हमारे सामने आता है। लेकिन केदारजी की कविता में बिम्बों के अनेक प्रयोग हुए हैं। उनकी ऊपर उद्धृत 'बसंती हवा' कविता में से गत्वर बिम्ब का एक उदाहरण देखें-
हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ चढ़ी पेड़ महुवा थपाथप मचाया चढ़ी आम ऊपर किया कान में कू ।
गिरी धम्म से फिर,
उसे भी झकोरा,
कहना उचित होगा कि केदारनाथ अग्रवाल के बिम्ब मानवीय परिवेश से निर्मित होने और लोक-परिचित होने के कारण सौन्दर्य के साथ-साथ सार्थकता की सृष्टि भी करते हैं। ग्राम्यजीवन से सम्बन्धित होने के कारण वे किसान जीवन की संवेदना को सम्प्रेषित करने में भी सफल होते हैं।
स्थापत्य कला और कविता
ऊपर हमने चर्चा की है कि उनकी कविता पर बुंदेलखंडकी प्रकृति और संस्कृति का बहुत गहरा प्रभाव रहा है। उनकी कविता का शिल्प भी इस प्रभाव से अछूता नहीं है।
खजुराहो के मन्दिर बुंदेली संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। केदारजी उस मन्दिर और उसके स्थापत्य से इतने प्रभावित होते हैं कि उस पर एक कविता ही लिख देते हैं। किसी कवि के लिए कविता लिखना महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। महत्त्व की बात है उस कविता के शिल्प का मन्दिर और उसकी मूर्तियों के शिल्प के अनुरूप होना। एक उदाहरण देखें -
नर हैं तो आजानुबाहु उन्नत ललाट- रागानुराग-रंजित शरीर हैं, अधर-पान, कुच ग्रहण, और आलिंगन में आसक्त लीन हैं।
तिय हैं तो आकुलित केश पट-नदी-वेश, कामातुर-मद विह्वल अधीर हैं, सदियों से पुरुषों की जाँघों पर बैठी करती बिहार हैं।
इन्हें नहीं संकोच शील है:
यह मनोज के मन लोक के नर-नारी हैं, आदिकाल से इसी मोद के अधिकारी हैं;
चाहे हम तुम कहें इन्हें, ये व्याभिचारी हैं !
'खजुराहो के मन्दिर' शीर्षक कविता के इस अंश के विशेषणों और क्रियाओं पर ध्यान दीजिए। आपको खजुराहो के मन्दिर और उसकी मूर्तियों के शिल्प और संरचना की स्मृति कौंध जाएगी। शब्दों पर ध्यान दीजिए। तत्सम पद और उनका समासीकरण करना केदारजी की प्रवृति नहीं है। लेकिन इस कविता में खजुराहो के मूर्तियों के आलिंगन और परस्पर संश्लिष्टता को दिखाने के लिए, उनकी शारीरिक बलिष्ठता और कामातुरता को कविता में दिखाने के लिए ऐसी संश्लिष्ट भाषा की आवश्यकता थी। इसीलिए केदारजी तत्सम शब्दों का प्रयोग करते हैं और उनसे सामासिक पद निर्मित करते हैं।
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