छायावादी कवियों का आलोचनात्मक योगदान - Critical contribution of Chhayavadi poets

शुक्लयुगीन हिन्दी आलोचना के विकास में छायावादी कवियों का योगदान भी महत्त्वपूर्ण है। इन कवियों ने अपने काव्य-संग्रहों की भूमिकाओं और स्वतन्त्र लेखन के द्वारा प्राचीन साहित्यिक मूल्यों का विरोध किया और नये मान-मूल्य प्रस्तावित किए। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काल छायावाद के उत्कर्ष का काल था । सुमित्रानन्दन पंत, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' आचार्य शुक्ल के समकालीन कवि थे। आचार्य शुक्ल छायावाद को एक काव्य-शैली और बांग्ला के माध्यम से आने वाला एक विदेशी प्रभाव मानते थे। छायावादी कवियों ने छायावाद पर लगे सभी आक्षेपों का बहुत विद्वतापूर्वक उत्तर दिया। यद्यपि वे आलोचक नहीं थे, लेकिन अपने काव्य को समझने-समझाने की प्रक्रिया में उन्होंने गम्भीरता के साथ आलोचना भी लिखी।


सुमित्रानन्दन पंत


पंत ने अपने काव्य संकलन 'पल्लव' के 'प्रवेश' में गम्भीर कला-विवेचन प्रस्तुत किया और कविता की एक नयी परिभाषा प्रस्तुत की कि "कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।" 'प्रवेश' में पंत ने ब्रजभाषा और खड़ीबोली के शब्द सौकुमार्य पर विचार किया है और प्राचीन एवं नवीन छन्दों की विशेषताओं की चर्चा करते हुए उनके औचित्य का विवेचन किया है। पंत ने अपने अन्य काव्य संकलनों की भी विस्तृत भूमिकाएँ लिखकर साहित्य के विभिन्न पक्षों पर चिन्तन किया।


सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'


निराला ने 'पंत और पल्लव' शीर्षक निबन्धमाला में पंत की कविताओं का सूक्ष्म विवेचन किया और उनके दोष दिखाते हुए यथास्थान उनकी विशेषताओं को भी सामने रखा है।

उन्होंने कविता की भाषा, छन्द आदि के साथ-साथ स्थानीयता, समसामयिकता और सार्वदेशिकता आदि साहित्येतर विषयों पर भी बहुत गम्भीरता से विचार किया है। अपने काव्य-संकलन 'परिमल' की भूमिका में भी निराला का आलोचकीय रूप प्रकट हुआ है। इसमें उन्होंने छन्द की मुक्ति को जीवन-मुक्ति से जोड़कर मुक्तछन्द के पक्ष में नये छन्दशास्त्र की नींव रखी। निराला ने अपने निबन्धों में अपनी कविताओं की व्याख्या करते हुए व्यावहारिक आलोचना का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है।


जयशंकर प्रसाद


छायावाद के सबसे प्रभावशाली सिद्धान्तकार जयशंकर प्रसाद थे।

प्रसाद ने अपने काव्य-चिन्तन को 'काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध' शीर्षक पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इन निबन्धों का मुख्य विषय छायावाद पर लगाए गए आक्षेपों का उत्तर देना और छायावाद की मनोभूमि और प्रेरणा को स्पष्ट करना था। इन निबन्धों में प्रसाद ने छायावाद को भारतीय चिन्तन परम्परा से जोड़कर उसे एक भारतीय काव्यान्दोलन के रूप में प्रतिष्ठित किया। अपने निबन्ध 'यथार्थवाद और छायावाद' में प्रसाद ने वेदना को काव्य का केन्द्र एवं यथार्थवाद का मूलभाव बताकर यथार्थवाद और छायावाद का सम्बन्ध स्थापित कर दिया। उन्होंने 'लघुता की ओर साहित्यिक दृष्टिपात' को यथार्थवाद की मुख्य प्रेरणा माना है। यह विवेचन प्रसाद की सूक्ष्म आलोचकीय दृष्टि का परिचायक है ।