आलोचना और इतिहास - Criticism and History


साहित्यिक इतिहास साहित्य के उद्भव और विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। इसके अन्तर्गत किसी देश, जाति, व्यक्ति या युग की सामाजिक, राजनैतिक, नैतिक और बौद्धिक परिस्थितियों तथा घटनाओं से साहित्य के सम्बन्ध को व्यक्त किया जाता है। साहित्य का इतिहास साहित्य को पुरातत्त्व की वस्तु बनाने का कार्य नहीं करता, बल्कि साहित्य के मूल्यांकन के उपयुक्त विमर्शो की रचना करते हुए हमें बताता है कि क्यों कुछ रचनाएँ तो कालजयी होती हैं और कुछ थोड़े समय बाद ही अपना प्रभाव खो देती हैं और कुछ तो कोई प्रभाव ही नहीं छोड़ पाती।


डॉ. निर्मला जैन ने लिखा है कि "साहित्य किसी-न-किसी अर्थ में एक सीमा तक ऐतिहासिक कला होती है, इसलिए उसकी सही पहचान भी इतिहास-बोध के बिना सम्भव नहीं होती।" हम जानते हैं कि कृति की 'व्याख्या' और 'मूल्यांकन आलोचना के प्रधान प्रयोजन होते हैं। इतिहास हमें रचना के सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषिक सन्दर्भ बताता है जिससे उसकी व्याख्या में प्रामाणिकता आती है । और, मूल्यांकन के लिए आलोचक जिन मानदण्डों को आधार बनाता है वे रचना के सामाजिक, राजनैतिक और बौद्धिक परिवेश से ही उपलब्ध होते हैं। अतः किसी रचना की आलोचना में इतिहास-बोध या ऐतिहासिक चेतना का होना अनिवार्य है।