आलोचना और साहित्यिक सिद्धान्त - Criticism and Literary Theory
साहित्यिक सिद्धान्तों का विकास लोगों द्वारा किसी साहित्यिक रचना को पढ़े जाने वाले विभिन्न तरीकों को समझने के साधनों के रूप में हुआ है। एक विशेष सिद्धान्त के प्रतिपादक मानते हैं कि उन्हीं का सिद्धान्त श्रेष्ठ हैं, लेकिन हम कई अलग-अलग सिद्धान्तों के नियमों के अनुसार रचना की व्याख्या करते हैं। साहित्यिक सिद्धान्त ऐसे लेंस हैं जिनके माध्यम से हम रचनाओं को देख सकते हैं। जब हम किसी रचना की व्याख्या करते हैं तब हम साहित्यिक आलोचना करते हैं और जब हम अपनी व्याख्या के आधारों की परीक्षा करते हैं तब हम उस रचना पर किसी साहित्यिक सिद्धान्त को लागू करते हैं। अन्य शब्दों में, साहित्यिक आलोचना रचना के सन्दर्भ में साहित्यिक सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप से लागू करना है।
इस प्रक्रिया में यह आवश्यक नहीं कि आलोचक अपनी आलोचना की सैद्धान्तिक मान्यताओं के बारे में एकदम सजग हो, परन्तु आलोचना का आधार कोई मान्यता या धारणा अवश्य होती है, जिसका स्रोत कोई सिद्धान्त होता है। यही कारण है कि आलोचना शब्द में सिद्धान्त समाहित माना जाता है। रेने वेलेक ने लिखा है कि 'साहित्यिक सिद्धान्त' जहाँ साहित्य के सिद्धान्तों, उसके वर्गीकरणों, प्रतिमानों इत्यादि का अनुशीलन है, वहीं 'साहित्यिक आलोचना' ठोस कलाकृतियों का अनुशीलन है। 'साहित्यिक आलोचना' शब्द का प्रयोग इस तरह होता है कि उसमें साहित्यिक सिद्धान्त समाहित हो जाता है। उसने स्पष्ट किया है कि साहित्य सिद्धान्त के बिना साहित्यिक आलोचना की कल्पना नहीं की जा सकती और ठोस साहित्यिक कृतियों के अध्ययन को आधार बनाए बिना साहित्य-सिद्धान्त गढ़ पाना असम्भव है ।
यह एक द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया है जिसमें सिद्धान्त और व्यवहार दोनों का अर्थ परस्पर खुलता जाता है।
कोई भी सिद्धान्त हमारे ज्ञान और अनुभव को व्यवस्थित करने और उसे सार्थक बनाने की एक प्रणाली होता है। वह हमारे ज्ञान और अनुभव को बोधगम्य बनाता है। वस्तुतः सभी सिद्धान्तों का उद्भव अव्यवस्था के विरोध स्वरूप हुआ है, ताकि गोचर- अगोचर जगत् के अपने अनुभवों को हम समझ सकें, उनका कोई अर्थ ग्रहण कर सकें। भले ही यह समझ अस्थायी या अधूरी हो, सिद्धान्त से उसमें कुछ न कुछ नियमबद्धता तो आती ही है।
जो बात जीवन के सम्बन्ध में सही है, कलात्मक अनुभव के बारे में भी वही बात लागू होती हैं ।
एक रचना हमारे लिए अनेक प्रश्न उपस्थित करती है। हम जानना चाहते हैं कि एक कलाकृति या रचना का वही अर्थ क्यों होता है जो हमें लगता है? किसी रचना को हम साहित्यिक या असाहित्यिक कैसे मान लेते हैं? किसी रचना में एक विशेष अर्थ की व्याप्ति कैसे हुई ? रचना का वास्तविक अर्थ स्वयं रचना में है या पाठक के मन में ? रचना के रूप का उसके कथ्य से कोई अनिवार्य सम्बन्ध है या नहीं ? लेखक द्वारा किसी विशेष विधा और विशेष रूप में साहित्य-सृजन का कोई प्रयोजन है या यह संयोग मात्र है ? क्या पाठक के व्यक्तित्व, परिवेश, रुचि और मानसिक स्थिति आदि तत्त्वों का रचना के अर्थ पर कोई प्रभाव पड़ता है?
क्या कोई रचना एक व्यक्ति पाठक से ऊपर उठकर व्यापक सामाजिक स्तर पर भी अपना कोई प्रभाव छोड़ती है ? क्या साहित्य समाज को बदलने का औज़ार बन सकता है ? ऐसे कितने ही प्रश्न हैं जो एक रचना को पढ़ने से पहले, पढ़ते समय और पढ़ने बाद हमारे मन में उठते हैं। साहित्यिक सिद्धान्तों का उद्भव और विकास ऐसे ही अनेक प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने की प्रक्रिया के अन्तर्गत होता है।
साहित्यिक सिद्धान्त भिन्न-भिन्न दृष्टियों और विधियों से ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर खोजने का कार्य करते हैं और रचना के पठन-पाठन और अर्थ प्रतिपादन के कुछ नियमों का प्रतिपादन करते हैं।
'साहित्यिक सिद्धान्त' साहित्य के व्यावहारिक अध्ययन के लिए उपयोग में लिए जाने वाले विचारों और पद्धतियों का समूह है । यह उन औज़ारों और विधियों का विवरण है जिनके माध्यम से हम साहित्य को उसके सही अर्थ और सन्दर्भ में समझ सकते हैं। साहित्यिक सिद्धान्त हमें बताते हैं कि आलोच्य रचना का क्या अर्थ हो सकता है।
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